Highlights
- नोटबंदी के दौरान व्यापारी ने रिश्तेदारों के ₹12.26 लाख अपने खाते में जमा किए थे।
- आयकर विभाग ने पूरी राशि को अघोषित आय मानकर नोटिस जारी किया।
- व्यापारी ने रिश्तेदारों के एफिडेविट, बैंक स्टेटमेंट और वैट रिटर्न पेश किए।
- ITAT ने सभी दस्तावेजों को वैध मानते हुए टैक्स डिमांड रद्द कर दी।
- फैसला बताता है कि दूसरे की रकम जमा करने पर मजबूत दस्तावेज होना कितना जरूरी है।
Income Tax Notice: दूसरे की रकम बैंक अकाउंट में जमा करने से पहले रखें पुख्ता सबूत
नई दिल्ली: कई बार परिवार या रिश्तेदारी में ऐसी परिस्थितियां बन जाती हैं, जब किसी दूसरे व्यक्ति की रकम अस्थायी रूप से हमारे बैंक अकाउंट में जमा करनी पड़ती है। लेकिन अगर इस लेनदेन के पीछे पर्याप्त दस्तावेज और स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं हो, तो आयकर विभाग इसे आपकी आय मान सकता है। कर्नाटक के एक छोटे व्यापारी के मामले में ऐसा ही हुआ, जहां नोटबंदी के दौरान रिश्तेदारों के ₹12 लाख से अधिक अपने खाते में जमा करने पर उन्हें इनकम टैक्स नोटिस का सामना करना पड़ा। हालांकि, आखिरकार आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने व्यापारी को राहत दे दी।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला कर्नाटक के छोटे बिजली व्यापारी रमजान मुल्ला से जुड़ा है। वर्ष 2016 में नोटबंदी के दौरान उन्होंने अपने बैंक खाते में कुल ₹20.99 लाख जमा किए।
व्यापारी के अनुसार इस राशि में:
- ₹8.73 लाख उनकी दुकान की नकद बिक्री (बिजनेस इनकम) थी।
- ₹12.26 लाख उनके पांच बुजुर्ग रिश्तेदारों के पुराने नोट थे, जिन्हें बदलवाने के लिए उनके खाते में जमा कराया गया था क्योंकि रिश्तेदार या तो बैंक नहीं जा सकते थे या उनके पास बैंक खाता नहीं था।
आयकर विभाग ने क्यों भेजा नोटिस?
रमजान मुल्ला आयकर अधिनियम की धारा 44AD के तहत प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन स्कीम का लाभ लेते थे। इस योजना के तहत छोटे कारोबारियों को विस्तृत बही-खाता रखना अनिवार्य नहीं होता।
इसके बावजूद उन्होंने अपनी बात साबित करने के लिए कई दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनमें शामिल थे:
- सेल्स रजिस्टर
- वैट रिटर्न
- बैंक स्टेटमेंट
- पांचों रिश्तेदारों के शपथ पत्र (एफिडेविट)
इसके बावजूद आयकर अधिकारी (AO) ने इन दस्तावेजों को पर्याप्त नहीं माना। विभाग का तर्क था कि किसी व्यक्ति द्वारा रिश्तेदारों के पुराने नोट अपने बैंक खाते में जमा करना स्वीकार्य नहीं है। इसके आधार पर पूरे ₹20.99 लाख को अघोषित आय मानते हुए टैक्स नोटिस जारी कर दिया गया।
पहली अपील में मिली आंशिक राहत
व्यापारी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की। अपीलीय प्राधिकारी (CIT-A) ने व्यवसाय से संबंधित राशि को आंशिक रूप से स्वीकार किया, लेकिन रिश्तेदारों के ₹12.26 लाख को लेकर आयकर विभाग का निर्णय बरकरार रखा।
ITAT ने व्यापारी के पक्ष में सुनाया फैसला
इसके बाद मामला आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) पहुंचा। न्यायाधिकरण ने व्यापारी द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों, वैट रिटर्न और रिश्तेदारों के एफिडेविट का परीक्षण किया और पाया कि रिकॉर्ड विश्वसनीय हैं।
ITAT ने माना कि केवल संदेह के आधार पर रकम को अघोषित आय नहीं माना जा सकता। पर्याप्त दस्तावेज उपलब्ध होने के कारण न्यायाधिकरण ने व्यापारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आयकर विभाग द्वारा लगाई गई पूरी टैक्स डिमांड रद्द कर दी।
इस फैसले से क्या सीख मिलती है?
यदि किसी कारणवश आपको किसी रिश्तेदार या अन्य व्यक्ति की रकम अपने बैंक खाते में जमा करनी पड़े, तो केवल मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं होती। भविष्य में किसी भी आयकर जांच से बचने के लिए निम्नलिखित दस्तावेज सुरक्षित रखना बेहतर है।
- रकम के वास्तविक मालिक का लिखित घोषणा पत्र या एफिडेविट।
- बैंक लेनदेन से जुड़े सभी रिकॉर्ड।
- धन के स्रोत से संबंधित दस्तावेज।
- जरूरत पड़ने पर पहचान और संबंध साबित करने वाले प्रमाण।
ऐसे दस्तावेज यह साबित करने में मदद करते हैं कि जमा की गई राशि आपकी व्यक्तिगत आय नहीं थी, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति की थी। यदि पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों, तो आयकर विभाग के सामने अपना पक्ष मजबूत तरीके से रखा जा सकता है।


