नई दिल्ली: कभी-कभी जिंदगी की दिशा एक ऐसे फैसले से बदल जाती है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारतीय उद्योग जगत के महान उद्योगपति और समाजसेवी जमनालाल बजाज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। राजस्थान के एक गरीब परिवार में जन्मे जमनालाल को बचपन में उद्योगपति सेठ बच्छराज बजाज ने गोद लिया और यही घटना आगे चलकर भारतीय उद्योग, स्वतंत्रता आंदोलन और समाज सेवा के इतिहास का अहम अध्याय बन गई।
महात्मा गांधी के सबसे करीबी सहयोगियों में शामिल रहे जमनालाल बजाज को गांधीजी अपना “पांचवां पुत्र” कहा करते थे। उन्होंने न सिर्फ बजाज समूह की मजबूत नींव रखी, बल्कि देश की आजादी और स्वदेशी आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई।
गरीब परिवार में हुआ जन्म
जमनालाल बजाज का जन्म 4 नवंबर 1889 को राजस्थान के सीकर जिले के काशी का बास गांव में हुआ था। उनके पिता कनीराम और माता बिरदीबाई साधारण आर्थिक स्थिति में जीवनयापन करते थे। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यही बालक आगे चलकर भारत के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी परिवारों में से एक की नींव रखेगा।
एक मुलाकात जिसने बदल दी पूरी जिंदगी
कहा जाता है कि बचपन में जब जमनालाल अपने घर के बाहर खेल रहे थे, तभी परिवार के दूर के रिश्तेदार और उद्योगपति सेठ बच्छराज बजाज वहां पहुंचे। उन्होंने बच्चे को देखा और उसे गोद लेने की इच्छा जताई।
जब उन्होंने जमनालाल की मां से पूछा कि यह बच्चा किसका है, तो उन्होंने मारवाड़ी में मुस्कुराते हुए कहा, “थारो ही ए”, यानी “आपका ही है।”
इसके बाद परिवार की सहमति से जमनालाल को गोद लिया गया। बदले में सेठ बच्छराज ने पूछा कि वे परिवार के लिए क्या कर सकते हैं। तब जमनालाल के पिता ने गांव में पानी की समस्या का जिक्र किया। सेठ बच्छराज ने गांव में कुआं खुदवाकर अपनी बात निभाई।
राजीव बजाज ने सुनाया किस्मत का किस्सा
बजाज समूह के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने एक बार इस घटना का जिक्र करते हुए बताया कि जब वे अपने परदादा जमनालाल बजाज पर डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए उनके पैतृक गांव गए, तो वहां उनकी मुलाकात अपनी कंपनी के एक सिक्योरिटी गार्ड से हुई, जो उसी घर के पास रहता था जहां जमनालाल का जन्म हुआ था।
राजीव ने कहा कि तब उनके मन में विचार आया कि अगर उस दिन सेठ बच्छराज की नजर उनके परदादा की बजाय उस सिक्योरिटी गार्ड के पूर्वज पर पड़ जाती, तो शायद आज भूमिकाएं पूरी तरह बदल चुकी होतीं।
17 साल की उम्र में छोड़ दिया घर
गोद लिए जाने के बाद भी जमनालाल ने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। 17 वर्ष की उम्र में एक पारिवारिक समारोह में महंगे गहने पहनने से इनकार करने पर उनकी अपने दत्तक दादा सेठ बच्छराज से तीखी बहस हो गई।
नाराज होकर उन्होंने परिवार की संपत्ति पर अपना अधिकार छोड़ने का पत्र लिखा और घर छोड़ दिया। बाद में सेठ बच्छराज स्वयं रेलवे स्टेशन पहुंचे, उन्हें वापस लाए और अपनी गलती स्वीकार की।
गांधीजी के बने सबसे भरोसेमंद सहयोगी
जमनालाल बजाज ने कारोबार के साथ-साथ देश सेवा को भी अपना उद्देश्य बनाया। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों को अपनाया और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, खादी के प्रचार और स्वदेशी अभियान को मजबूत करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। गांधीजी उनके समर्पण से इतने प्रभावित थे कि उन्हें अपना “पांचवां पुत्र” कहा करते थे।
जमनालाल का मानना था कि उद्योग केवल मुनाफा कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण साधन होना चाहिए।
आज भी कायम है उनकी विरासत
जमनालाल बजाज द्वारा रखी गई मजबूत नींव पर आगे की पीढ़ियों ने बजाज समूह को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आज बजाज समूह ऑटोमोबाइल, वित्तीय सेवाओं, विद्युत उपकरणों और कई अन्य क्षेत्रों में देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल है।
बताया जाता है कि आज बजाज समूह का संयुक्त बाजार मूल्य (Market Value) करीब 14 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है। व्यापार के साथ सामाजिक जिम्मेदारी, परोपकार और राष्ट्र निर्माण की भावना आज भी इस समूह की पहचान बनी हुई है।
किस्मत और कर्म की मिसाल
जमनालाल बजाज का जीवन इस बात का उदाहरण है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, सही अवसर, मजबूत सिद्धांत और समाज के प्रति समर्पण किसी भी व्यक्ति को इतिहास में अमर बना सकते हैं। एक गरीब परिवार में जन्मा बालक आगे चलकर भारतीय उद्योग, स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधारों का ऐसा प्रतीक बना, जिसकी विरासत आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है।


