नई दिल्ली: अगर आपके पास कन्फर्म ट्रेन टिकट है, तो स्वाभाविक रूप से आप उम्मीद करते हैं कि यात्रा आराम से होगी। लेकिन केरल के एक यात्री के साथ ऐसा नहीं हुआ। कन्फर्म तत्काल टिकट होने के बावजूद उसे पूरी रात ट्रेन में खड़े-खड़े सफर करना पड़ा। अब उपभोक्ता आयोग ने इस मामले में भारतीय रेलवे को सेवा में लापरवाही का दोषी मानते हुए 50,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
कन्फर्म टिकट के बावजूद नहीं मिली सीट
मामला बेंगलुरु से केरल के कोचुवेली तक की यात्रा का है। यात्री ने तत्काल कोटे से कन्फर्म रिजर्वेशन कराया था, लेकिन ट्रेन में चढ़ने पर पाया कि उसका आरक्षित कोच अनारक्षित यात्रियों से पूरी तरह भरा हुआ था। हालत यह थी कि कोच में चलने तक की जगह नहीं थी और वह पूरी रात अपनी सीट तक नहीं पहुंच सका।
यात्री ने रेलवे कस्टमर केयर से संपर्क किया, लेकिन अधिकारियों ने त्योहारों की भीड़ का हवाला देते हुए सहयोग करने की सलाह दी। इसके बाद उसने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर भी शिकायत दर्ज कराई और कोच की तस्वीरें साझा कीं, लेकिन तत्काल कोई कार्रवाई नहीं हुई।
उपभोक्ता आयोग ने रेलवे को ठहराया जिम्मेदार
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, केरल के उपभोक्ता आयोग ने भारतीय रेलवे की सेवा को दोषपूर्ण माना। आयोग के अध्यक्ष पी. वी. जयराजन और अन्य सदस्यों की पीठ ने दक्षिणी रेलवे, दक्षिण पश्चिमी रेलवे तथा तिरुवनंतपुरम के अतिरिक्त मंडल रेल प्रबंधक (ADRM) को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया।
आयोग ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह पीड़ित यात्री को मानसिक पीड़ा और असुविधा के लिए 50,000 रुपये का मुआवजा तथा 3,000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में अदा करे।
रेलवे की सफाई क्यों नहीं मानी गई?
रेलवे ने अपने बचाव में कहा कि पूजा और नवरात्रि की छुट्टियों के कारण ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ थी। रेलवे का दावा था कि शिकायत मिलने के बाद टीटीई ने रेलवे सुरक्षा बल (RPF) की मदद से अगले स्टेशन पर अनारक्षित यात्रियों को कोच से हटाकर यात्री की सीट खाली करा दी थी।
हालांकि, आयोग ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने कहा कि रेलवे अपने दावे के समर्थन में कोई दस्तावेजी या ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। केवल मौखिक दलीलों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि समस्या का समाधान कर दिया गया था।
सोशल मीडिया और तस्वीरें बनीं अहम सबूत
यात्री द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीरों और शिकायतों की जांच के बाद आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रेलवे अपने यात्रियों को आरक्षित सीट उपलब्ध कराने में विफल रहा। आयोग ने इसे सेवा में गंभीर कमी माना और रेलवे को एक महीने के भीतर मुआवजे की राशि का भुगतान करने का आदेश दिया।
यात्रियों के लिए क्या है संदेश?
यह फैसला उन यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्हें कन्फर्म टिकट होने के बावजूद सीट नहीं मिलती या रेलवे की लापरवाही का सामना करना पड़ता है। उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट किया कि रेलवे की जिम्मेदारी केवल टिकट जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि आरक्षित यात्री को उसकी सीट उपलब्ध कराना भी उसकी कानूनी जिम्मेदारी है।


