पश्चिम एशिया में फिर बढ़ा तनाव, अमेरिका ने 80 से अधिक ठिकानों पर किए हमले, युद्ध का खर्च बना बड़ी चुनौती.
पश्चिम एशिया में एक बार फिर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिका ने ईरान के 80 से अधिक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी सहयोगी देशों पर हमले किए हैं। इसी बीच ईरान ने अमेरिका के एक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराने का दावा भी किया है। दोनों देशों के बीच हालिया संघर्ष ने न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित किया है, बल्कि अमेरिका के लिए आर्थिक और सैन्य स्तर पर भी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
प्रमुख हाइलाइट्स
- पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच फिर बढ़ा सैन्य तनाव
- अमेरिका ने ईरान के 80 से अधिक ठिकानों पर किए हमले
- ईरान ने अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन गिराने का किया दावा
- 108 दिनों के संघर्ष में अमेरिका को भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान
- $35 हजार के शाहेद ड्रोन को मारने के लिए $40 लाख की पैट्रियट मिसाइल का इस्तेमाल
108 दिनों तक चला संघर्ष
अमेरिका ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच करीब 108 दिनों तक संघर्ष जारी रहा। अंततः 17 जून को अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, लेकिन हालिया घटनाओं ने संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
इस संघर्ष के दौरान अमेरिका को अपने कई आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म गंवाने पड़े। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अमेरिका ने कम से कम 42 सैन्य विमान और ड्रोन खोए। इनमें चार F-15E स्ट्राइक ईगल, एक F-35A लाइटनिंग II, एक A-10 थंडरबोल्ट II, सात KC-135 स्ट्रैटोटैंकर, एक E-3 सेंट्री AWACS, दो MC-130J कमांडो II, एक HH-60W जॉली ग्रीन II हेलीकॉप्टर, 24 MQ-9 रीपर ड्रोन और एक MQ-4C ट्राइटन ड्रोन शामिल बताए गए हैं।
युद्ध का खर्च बना बड़ी चिंता
इस युद्ध का आर्थिक बोझ भी अमेरिका के लिए बेहद भारी साबित हुआ। अनुमान है कि 108 दिनों तक चले सैन्य अभियान पर अमेरिका ने करीब 113 अरब डॉलर खर्च किए। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार, युद्ध के शुरुआती छह दिनों में ही लगभग 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके थे, यानी प्रतिदिन करीब 1.88 अरब डॉलर।
इसके बाद अभियान के दौरान औसत दैनिक खर्च करीब 1 अरब डॉलर रहा। यह अनुमान 28 फरवरी से 16 जून तक के सैन्य अभियानों पर आधारित है। हालांकि कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक हो सकती है। उनका तर्क है कि यदि सैन्य अभियान के साथ दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव, हथियारों की भरपाई, सैनिकों की तैनाती और अन्य अप्रत्यक्ष खर्चों को भी शामिल किया जाए तो कुल लागत 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है।
$35 हजार के ड्रोन पर $40 लाख की मिसाइल
युद्ध के दौरान सबसे अधिक चर्चा उस स्थिति की हुई जब अमेरिका ने ईरान के शाहेद ड्रोन को गिराने के लिए महंगी पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल किया।
- शाहेद ड्रोन की अनुमानित कीमत: 35,000 डॉलर
- पैट्रियट मिसाइल की अनुमानित कीमत: 40 लाख डॉलर
यानी एक अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन को नष्ट करने के लिए अमेरिका को उससे कई गुना महंगी मिसाइल दागनी पड़ी। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक इस तरह की रणनीति अपनाना आर्थिक रूप से बेहद महंगा साबित हो सकता है।
हथियारों पर ही अरबों डॉलर का खर्च
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के अनुसार, युद्ध के शुरुआती चरण में ही मिसाइलों और अन्य गोला-बारूद पर करीब 25 अरब डॉलर खर्च हो गए थे। विभिन्न रक्षा विश्लेषणों के मुताबिक, पूरे अभियान के दौरान अमेरिका को औसतन प्रतिदिन लगभग 1 अरब डॉलर का खर्च उठाना पड़ा।
भारत ने भी खरीदे हैं MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन
गौरतलब है कि भारत ने अक्टूबर 2024 में अमेरिका से 31 MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन खरीदने के लिए करीब 4 अरब डॉलर का समझौता किया था। इस हिसाब से प्रत्येक ड्रोन की कीमत लगभग 100 मिलियन डॉलर बैठती है। ऐसे में युद्ध के दौरान इन अत्याधुनिक ड्रोन के नुकसान ने भी सैन्य विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है।
निष्कर्ष
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि आधुनिक युद्ध की बढ़ती लागत का भी बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। सस्ते ड्रोन और अपेक्षाकृत कम लागत वाले हथियारों के खिलाफ महंगे रक्षा सिस्टम का इस्तेमाल यह दिखाता है कि भविष्य के युद्ध केवल हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि आर्थिक क्षमता से भी तय होंगे।


