भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। केंद्र सरकार देश के लगभग 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा तेल और प्राकृतिक गैस अन्वेषण (Exploration) अभियान शुरू करने की तैयारी कर रही है। इस महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य घरेलू स्तर पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन बढ़ाना है ताकि रूस, सऊदी अरब, इराक और अन्य देशों से होने वाले महंगे आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया जा सके।
सरकार इस अभियान के तहत करीब 10 अरब डॉलर (लगभग 95 हजार करोड़ रुपये) का निवेश करेगी। खास बात यह है कि जिन क्षेत्रों में अब तक बड़े पैमाने पर तेल और गैस की खोज नहीं हुई, वहां आधुनिक तकनीक के जरिए व्यापक सर्वे और ड्रिलिंग की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अभियान सफल रहता है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और लंबे समय में पेट्रोलियम क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
भारत क्यों शुरू कर रहा है इतना बड़ा तेल खोज अभियान?
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े भू-राजनीतिक संकट देखे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, लाल सागर में समुद्री मार्गों पर खतरा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में रुकावटों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल आयातित ऊर्जा पर निर्भर रहना किसी भी देश के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक और उपभोक्ता है। देश अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और व्यापार घाटे पर पड़ता है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। नया अन्वेषण अभियान इसी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
2.5 लाख वर्ग किलोमीटर में होगी खोज
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने जानकारी दी कि सरकार लगभग 2,50,000 वर्ग किलोमीटर ऐसे क्षेत्रों की नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर रही है, जहां अभी तक व्यवस्थित रूप से तेल और गैस की खोज नहीं की गई है।
इन क्षेत्रों में भूवैज्ञानिक सर्वे, सिस्मिक अध्ययन और आधुनिक तकनीकों की मदद से संभावित हाइड्रोकार्बन भंडार तलाशे जाएंगे। इसके बाद जहां संभावनाएं अधिक मिलेंगी, वहां ड्रिलिंग और उत्पादन की प्रक्रिया शुरू होगी।
यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा एक्सप्लोरेशन अभियान माना जा रहा है।
95 हजार करोड़ रुपये का होगा निवेश
सरकार इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम में करीब 95 हजार करोड़ रुपये निवेश करेगी। यह राशि केवल सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि निजी और विदेशी ऊर्जा कंपनियों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी।
इस निवेश का उपयोग कई प्रमुख कार्यों में किया जाएगा, जैसे—
- अत्याधुनिक सिस्मिक सर्वे
- गहरे समुद्री अन्वेषण
- नई ड्रिलिंग तकनीक
- डेटा विश्लेषण
- अपतटीय (Offshore) इंफ्रास्ट्रक्चर
- उत्पादन सुविधाओं का विकास
सरकार का मानना है कि शुरुआती निवेश भविष्य में ऊर्जा उत्पादन और आर्थिक लाभ के रूप में कई गुना वापस मिल सकता है।
भारत का मौजूदा उत्पादन कितना है?
पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कच्चे तेल का उत्पादन लगभग 25.98 मिलियन मीट्रिक टन रहा।
यह उत्पादन देश की कुल जरूरत का केवल लगभग 10 प्रतिशत ही पूरा कर पाता है। दैनिक उत्पादन करीब 5.22 लाख बैरल प्रति दिन (BPD) के आसपास है, जबकि वर्ष 2011 में यह उत्पादन लगभग 9 लाख बैरल प्रतिदिन के उच्च स्तर तक पहुंच गया था।
पिछले एक दशक में घरेलू उत्पादन में लगातार गिरावट आई है। यही कारण है कि सरकार अब नए क्षेत्रों में खोज बढ़ाकर उत्पादन को फिर से ऊंचाई पर ले जाना चाहती है।
रूस, सऊदी अरब और इराक पर निर्भरता होगी कम
भारत वर्तमान में अपने अधिकांश कच्चे तेल का आयात रूस, सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों से करता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल की खरीद बढ़ाई थी। हालांकि सरकार का स्पष्ट लक्ष्य किसी एक या कुछ देशों पर अत्यधिक निर्भरता से बचना है।
यदि घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो—
- आयात बिल में कमी आएगी।
- विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- वैश्विक संकटों का असर कम पड़ेगा।
- ऊर्जा आपूर्ति अधिक स्थिर बनेगी।
- देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
27 से बढ़कर 41 देशों तक पहुंचा आयात नेटवर्क
ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या भी बढ़ाई है।
पहले भारत लगभग 27 देशों से कच्चा तेल खरीदता था, जबकि अब यह संख्या बढ़कर 41 देशों तक पहुंच चुकी है। इसमें अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य क्षेत्रों के कई नए देश शामिल हुए हैं।
इस रणनीति से भारत ने किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर वैकल्पिक आपूर्ति सुनिश्चित करने की क्षमता विकसित की है।
समुद्र में छिपा हो सकता है ऊर्जा का बड़ा खजाना
सरकार की सबसे अधिक उम्मीदें समुद्री क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के आसपास का गहरा समुद्री इलाका तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार समेटे हुए हो सकता है।
भूवैज्ञानिक संरचना के आधार पर इन क्षेत्रों की तुलना दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हाइड्रोकार्बन समृद्ध क्षेत्रों से की जाती है।
यदि यहां बड़े भंडार मिलते हैं तो भारत की ऊर्जा तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
गहरे समुद्र में खोज आसान नहीं
ऑफशोर और डीप-वॉटर एक्सप्लोरेशन दुनिया के सबसे जटिल औद्योगिक अभियानों में गिना जाता है।
इसमें कई चुनौतियां होती हैं—
- हजारों मीटर गहराई तक ड्रिलिंग
- अत्यधिक दबाव और तापमान
- आधुनिक ड्रिलिंग प्लेटफॉर्म
- उच्च तकनीक वाले उपकरण
- पर्यावरणीय सुरक्षा
- लंबी परियोजना अवधि
इसी कारण सरकार अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और तकनीकी विशेषज्ञों की भागीदारी भी बढ़ा रही है।
निजी और विदेशी कंपनियों को मिलेगा अवसर
सरकार नए ब्लॉकों की नीलामी के जरिए निजी और विदेशी निवेशकों को भी आकर्षित करना चाहती है।
ओपन एकरेज लाइसेंसिंग नीति (OALP) और अन्य सुधारों के माध्यम से कंपनियों को अधिक पारदर्शी और आसान प्रक्रिया उपलब्ध कराई जा रही है।
इससे—
- प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
- नई तकनीक आएगी।
- निवेश में तेजी आएगी।
- खोज की सफलता की संभावना बढ़ेगी।
‘समुद्र मंथन मिशन’ से मिलेगी नई दिशा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2025 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘समुद्र मंथन मिशन’ की घोषणा की थी।
इस मिशन का उद्देश्य समुद्र के भीतर मौजूद तेल, गैस और अन्य खनिज संसाधनों की खोज को मिशन मोड में आगे बढ़ाना है।
प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत नेशनल डीप वॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन के माध्यम से समुद्र के नीचे छिपे ऊर्जा संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से दोहन करेगा।
सरकार का मानना है कि भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में समुद्री संसाधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
भारत को क्या होंगे बड़े फायदे?
यदि यह अभियान सफल रहता है तो इसके दूरगामी लाभ मिल सकते हैं।
1. आयात बिल में कमी
भारत हर वर्ष कच्चे तेल के आयात पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करता है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से यह खर्च कम हो सकता है।
2. विदेशी मुद्रा की बचत
कम आयात का मतलब विदेशी मुद्रा भंडार पर कम दबाव होगा।
3. रोजगार के अवसर
तेल और गैस परियोजनाओं से इंजीनियरिंग, निर्माण, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी क्षेत्रों में हजारों नए रोजगार पैदा होंगे।
4. ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी
वैश्विक संकटों के दौरान भी भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर सकेगा।
5. आर्थिक विकास को मिलेगा समर्थन
सस्ती और स्थिर ऊर्जा उपलब्ध होने से उद्योगों की लागत घट सकती है, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलेगी।
क्या तुरंत मिलेगा फायदा?
हालांकि यह अभियान बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके परिणाम तुरंत नहीं आएंगे।
तेल और गैस की खोज से लेकर उत्पादन शुरू होने तक कई वर्षों का समय लग सकता है। पहले सर्वे, फिर ड्रिलिंग, उसके बाद परीक्षण और अंत में व्यावसायिक उत्पादन शुरू होता है।
इसलिए यह एक दीर्घकालिक रणनीति है, जिसका वास्तविक लाभ आने वाले वर्षों में देखने को मिलेगा।
विशेषज्ञ क्या मानते हैं?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा के लिए तीन मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा—
- घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन बढ़ाना।
- नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन, हरित हाइड्रोजन) का विस्तार।
- ऊर्जा आयात स्रोतों में विविधता बनाए रखना।
यदि ये तीनों रणनीतियां समानांतर रूप से आगे बढ़ती हैं तो भारत आने वाले दशक में दुनिया की सबसे मजबूत ऊर्जा अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है।
निष्कर्ष
भारत का 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर में शुरू होने वाला तेल और गैस खोज अभियान केवल एक अन्वेषण परियोजना नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा रणनीतिक कदम है। लगभग 95 हजार करोड़ रुपये के निवेश के साथ सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को देश के भीतर से पूरा करने का प्रयास कर रही है।
यदि अंडमान-निकोबार सहित अन्य संभावित क्षेत्रों में बड़े हाइड्रोकार्बन भंडार मिलते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपने आयात बिल को कम कर सकेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर देश के रूप में उभर सकता है। यही कारण है कि इस अभियान को भारत के ऊर्जा इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण मिशन माना जा रहा है।


