Highlights
- भारत 200 से अधिक देशों को करता है दवाओं का निर्यात
- वित्त वर्ष 2025-26 में फार्मा एक्सपोर्ट 31.1 अरब डॉलर (करीब ₹2.9 लाख करोड़) पहुंचा
- APIs और केमिकल इंटरमीडिएट्स के लिए चीन पर भारी निर्भरता
- सरकार PLI स्कीम और Bulk Drug Parks के जरिए आत्मनिर्भरता बढ़ाने में जुटी
नई दिल्ली
भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी जेनेरिक दवा निर्माण ताकतों में शामिल है। कम कीमत में गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने के कारण भारत को ‘Pharmacy of the World’ यानी दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है। भारत से बनी दवाएं अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका समेत 200 से अधिक देशों में पहुंचती हैं।
लेकिन इस सफलता के पीछे एक ऐसी कमजोरी छिपी है, जो भविष्य में भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। दवा बनाने के लिए जरूरी Active Pharmaceutical Ingredients (API) और Chemical Intermediates के मामले में भारत अब भी चीन पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में अगर सप्लाई चेन प्रभावित होती है तो देश के करीब ₹2.9 लाख करोड़ के फार्मा निर्यात पर असर पड़ सकता है।
₹2.9 लाख करोड़ तक पहुंचा भारत का फार्मा निर्यात
भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का फार्मा निर्यात बढ़कर 31.1 अरब डॉलर (करीब ₹2.9 लाख करोड़) पहुंच गया।
यदि पिछले दो दशकों की बात करें तो वर्ष 2000-01 में यह निर्यात केवल 1.9 अरब डॉलर था। यानी भारत ने फार्मा सेक्टर में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है।
आज भारतीय दवाएं दुनिया के लगभग हर प्रमुख बाजार में उपलब्ध हैं और भारत वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुका है।
चीन पर क्यों टिकी है भारतीय फार्मा इंडस्ट्री?
दवा बनाने की पूरी प्रक्रिया केवल टैबलेट या इंजेक्शन तैयार करने तक सीमित नहीं होती। इसके लिए पहले API (एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट) और कई तरह के केमिकल इंटरमीडिएट्स तैयार किए जाते हैं।
यहीं भारत की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है।
फार्मास्युटिकल एक्सपोर्ट्स प्रमोशन काउंसिल (Pharmexcil) के अनुसार, 2023-24 में भारत के कुल फार्मा आयात का 43.45 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया, जिसकी कीमत करीब 3.6 अरब डॉलर थी।
कुछ जरूरी दवा सामग्री में यह निर्भरता और भी ज्यादा है।
- Penicillin G के लिए करीब 77%
- 6-APA के लिए लगभग 94.1%
यानी भारत दवाएं तो दुनिया को बेचता है, लेकिन उनकी बुनियादी सामग्री का बड़ा हिस्सा चीन से खरीदता है।
तीन दशक पहले शुरू हुई थी यह निर्भरता
1990 के दशक के बाद वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। भारतीय कंपनियों पर लागत कम रखने का दबाव था।
उधर चीन ने बड़े स्तर पर API निर्माण शुरू किया। वहां कंपनियों को सस्ती बिजली, बड़े औद्योगिक क्लस्टर, आसान फाइनेंस और कम लागत पर उत्पादन जैसी सुविधाएं मिलीं।
इसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय कंपनियों के लिए स्थानीय स्तर पर API बनाना महंगा पड़ने लगा और उन्होंने चीन से आयात बढ़ाना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे पूरी सप्लाई चेन चीन पर निर्भर होती चली गई।
कोरोना महामारी ने खोल दी थी पोल
कोविड-19 महामारी के दौरान जब चीन से सप्लाई बाधित हुई तो पूरी दुनिया को सप्लाई चेन का महत्व समझ आया।
भारत में भी कई दवाओं के कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित हुई। इससे सरकार और उद्योग दोनों को यह महसूस हुआ कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर रहना भविष्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
भारत के सामने बड़ा मौका भी मौजूद है
अमेरिका और यूरोप अब चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति अपना रहे हैं।
इसी के तहत कई वैश्विक कंपनियां China+1 Strategy अपना रही हैं। इसका मतलब है कि चीन के अलावा किसी दूसरे भरोसेमंद देश से भी सप्लाई सुनिश्चित करना।
भारत इस रणनीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बन सकता है क्योंकि—
- भारत के पास US FDA से मंजूर बड़ी संख्या में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं।
- दुनिया की वैक्सीन जरूरतों का लगभग 65-70 प्रतिशत भारत पूरा करता है।
- अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली लगभग 60 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं भारतीय प्लांट्स में बनती हैं।
- दुनिया की शीर्ष 25 जेनेरिक दवा कंपनियों में 10 भारतीय मूल की हैं।
विशेषज्ञ क्या मानते हैं?
फार्मा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तैयार दवाएं बनाना पर्याप्त नहीं है।
यदि API और इंटरमीडिएट्स के लिए चीन पर निर्भरता बनी रहती है तो वैश्विक खरीदार भारत को पूरी तरह आत्मनिर्भर सप्लायर नहीं मानेंगे।
GSK के पूर्व एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट सलिल कालियानपुर का कहना है कि भारत को बेसिक केमिकल से लेकर बल्क ड्रग्स तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करनी होगी। तभी चीन की लागत आधारित बढ़त को चुनौती दी जा सकेगी।
सरकार क्या कर रही है?
भारत सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं।
PLI स्कीम
सरकार ने वर्ष 2020 में Bulk Drugs के लिए Production Linked Incentive (PLI) योजना शुरू की।
- कुल बजट: ₹6,940 करोड़
- लक्ष्य: 41 महत्वपूर्ण API और इंटरमीडिएट्स का घरेलू उत्पादन बढ़ाना
Bulk Drug Parks
सरकार तीन बड़े बल्क ड्रग पार्क विकसित कर रही है—
- आंध्र प्रदेश
- गुजरात
- हिमाचल प्रदेश
इन पार्कों का उद्देश्य API निर्माण की लागत कम करना और घरेलू उत्पादन बढ़ाना है।
26 उत्पादों में शुरू हो चुका है उत्पादन
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, PLI योजना के तहत लक्षित 41 उत्पादों में से 26 के लिए उत्पादन क्षमता विकसित हो चुकी है।
दो दशक बाद भारत में फिर से—
- Penicillin G
- Clavulanic Acid
जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों का निर्माण शुरू हुआ है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
केवल फार्मा नहीं, केमिकल सेक्टर भी चुनौती में
फार्मा उद्योग की रीढ़ केमिकल उद्योग है।
भारत का घरेलू केमिकल बाजार लगभग 250 अरब डॉलर का माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद देश ने वित्त वर्ष 2024-25 में 54 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के केमिकल आयात किए।
कई फार्मास्युटिकल इंटरमीडिएट्स में आयात पर निर्भरता अभी भी 50 से 80 प्रतिशत तक बनी हुई है।
अगले पांच साल होंगे बेहद अहम
भारत का फार्मा बाजार फिलहाल लगभग 60 अरब डॉलर का है।
सरकार और उद्योग का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में इसे दोगुना करना है।
आयुष्मान भारत, जन औषधि योजना और छोटे शहरों में तेजी से बढ़ते हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण दवाओं की मांग लगातार बढ़ने वाली है।
ऐसे में API और केमिकल इंटरमीडिएट्स की जरूरत भी पहले से कहीं ज्यादा होगी।
क्या भारत बन पाएगा ग्लोबल सप्लाई चेन का नया लीडर?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास अवसर भी है और चुनौती भी।
यदि भारत केवल तैयार दवाओं के बजाय API, केमिकल इंटरमीडिएट्स, स्पेशलिटी केमिकल्स और लॉजिस्टिक्स सहित पूरी वैल्यू चेन को मजबूत कर लेता है तो वह चीन का वास्तविक विकल्प बन सकता है।
लेकिन यदि आयात पर निर्भरता इसी तरह बनी रही तो दुनिया की फार्मेसी कहलाने के बावजूद भारत की सप्लाई चेन सुरक्षित नहीं मानी जाएगी।
निष्कर्ष
भारत ने जेनेरिक दवाओं और वैक्सीन निर्माण में पूरी दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। लेकिन इस सफलता की असली परीक्षा अब सप्लाई चेन में आत्मनिर्भर बनने की है। चीन पर कच्चे माल की निर्भरता कम करना केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरत भी बन चुका है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि भारत केवल दुनिया की फार्मेसी बना रहेगा या फिर वैश्विक फार्मा सप्लाई चेन का नया नेतृत्व भी करेगा।


