नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें एक बार फिर नरम पड़ गई हैं। अमेरिका-ईरान के बीच तनाव कम होने, होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही सामान्य होने और सप्लाई बढ़ने की उम्मीद ने तेल के दाम को युद्ध से पहले के स्तर के करीब पहुंचा दिया है। ऐसे में भारत में भी पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की उम्मीदें बढ़ी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ सप्लाई बढ़ने से तेल सस्ता रहेगा? ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में कच्चे तेल की दिशा काफी हद तक चीन तय करेगा।
आज चीन केवल दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक ही नहीं है, बल्कि उसकी खरीद, खपत और भंडारण की रणनीति पूरे वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित करने लगी है। यही वजह है कि कई विश्लेषक अब चीन को ग्लोबल ऑयल मार्केट का “अदृश्य कंट्रोलर” मान रहे हैं।
युद्ध के दौरान क्यों नहीं पहुंचा तेल 200 डॉलर तक?
28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने के बाद कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने आशंका जताई थी कि यदि होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बाधित रहा तो ब्रेंट क्रूड 200 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। इसकी वजह साफ थी क्योंकि दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल की सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है।
युद्ध से पहले ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे था, जबकि युद्ध के दौरान यह मई की शुरुआत में करीब 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। हालांकि इसके बाद कीमतों में लगातार गिरावट शुरू हो गई और अनुमानित स्तर तक तेजी नहीं आई।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह चीन की रणनीति रही।
चीन ने कैसे संभाला पूरा खेल?

युद्ध के दौरान चीन ने तेल की ऊंची कीमतों का असर कम करने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम किया।
- कच्चे तेल का आयात सीमित किया।
- अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) का इस्तेमाल किया।
- इलेक्ट्रिक वाहनों और क्लीन एनर्जी के उपयोग को तेजी से बढ़ाया।
- जरूरत के अनुसार रिफाइनरियों की खरीद घटाई।
- पहले से खरीदे गए सस्ते तेल का उपयोग किया।
इन कदमों से चीन की तेल मांग नियंत्रित रही और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक मांग नहीं बढ़ी। इसका सीधा असर यह हुआ कि कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षा से कहीं अधिक स्थिर रहीं।
भारत समेत एशिया को भी मिला फायदा
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चीन ने युद्ध के दौरान सामान्य स्तर पर तेल खरीद जारी रखी होती तो अंतरराष्ट्रीय कीमतें काफी ऊपर जा सकती थीं।
इसका फायदा भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य एशियाई देशों को मिला क्योंकि उन्हें अपेक्षाकृत नियंत्रित कीमतों पर कच्चा तेल मिलता रहा। भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करते हैं, उनके लिए यह राहत की बात रही।
चीन का विशाल तेल भंडार बना सबसे बड़ा हथियार
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने कम कीमतों पर रूस और ईरान से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद चीन ने रियायती दरों पर तेल खरीदकर अपना रणनीतिक और व्यावसायिक भंडार लगातार बढ़ाया।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि चीन के पास अब 1 अरब बैरल से अधिक का संयुक्त तेल भंडार मौजूद है। यही वजह है कि जरूरत पड़ने पर वह कई महीनों तक आयात कम करके भी अपनी घरेलू मांग पूरी कर सकता है।
यह क्षमता किसी भी दूसरे बड़े आयातक देश के मुकाबले कहीं ज्यादा है।
इलेक्ट्रिक कारों ने बदल दिया पूरा समीकरण
चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है।
आज वहां बिकने वाली हर दो नई कारों में से एक इलेक्ट्रिक वाहन (EV) है। इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल की मांग पर पड़ा है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते उपयोग की वजह से चीन में प्रतिदिन लगभग 10 लाख बैरल तेल की मांग कम हो चुकी है।
यानी यदि भविष्य में चीन की ईवी बिक्री और बढ़ती है तो वैश्विक तेल मांग पर भी दबाव बना रहेगा।
होर्मुज खुलने से बढ़ सकता है ओवरसप्लाई का खतरा
अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।
होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही सामान्य होने लगी है। इससे पहले जो करोड़ों बैरल कच्चा तेल समुद्र में फंसा हुआ था, वह धीरे-धीरे बाजार में पहुंचना शुरू होगा।
यदि अमेरिका और ईरान के बीच प्रतिबंधों में और ढील मिलती है तो ईरान भी अपना उत्पादन बढ़ा सकता है। दूसरी ओर ओपेक+ देशों की सप्लाई भी सामान्य स्तर पर लौट रही है।
ऐसे में बाजार में ओवरसप्लाई की स्थिति बन सकती है।
फिर क्यों जरूरी रहेगा चीन?

अगर बाजार में जरूरत से ज्यादा तेल आ जाता है तो कीमतों पर भारी दबाव बन सकता है। ऐसे समय में सबसे बड़ा सवाल होगा कि अतिरिक्त तेल खरीदेगा कौन?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल केवल चीन ऐसा देश है जिसके पास अतिरिक्त तेल को अपने विशाल भंडार में समाहित करने की क्षमता है।
यदि चीन बड़ी खरीद करता है तो कीमतों को सहारा मिल सकता है। लेकिन अगर चीन खरीद धीमी रखता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और सस्ता हो सकता है।
यानी आने वाले महीनों में ब्रेंट क्रूड की दिशा काफी हद तक चीन की खरीदारी पर निर्भर करेगी।
भारत में पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल से तय नहीं होतीं। इनके साथ कई अन्य कारक भी जुड़े होते हैं, जिनमें शामिल हैं—
- केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स
- रुपये और डॉलर की विनिमय दर
- रिफाइनिंग लागत
- परिवहन खर्च
- तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक सस्ता बना रहता है और सरकार टैक्स ढांचे में बदलाव करती है, तभी उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिल सकती है।
आगे क्या रहेगा सबसे बड़ा ट्रिगर?
ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसार अगले कुछ महीनों में इन पांच कारकों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी—
- चीन की तेल खरीद और आयात नीति
- होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री यातायात
- ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थिति
- ओपेक+ देशों का उत्पादन
- वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहनों और क्लीन एनर्जी की मांग
यदि इन सभी कारकों का संतुलन सप्लाई के पक्ष में बना रहा तो कच्चे तेल की कीमतों में और गिरावट संभव है, जिसका फायदा भारत जैसे आयातक देशों को मिल सकता है।


