भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापनों में “100%” और “100% शुद्ध” जैसे दावों के इस्तेमाल पर रोक लगाने का फैसला किया है। इस कदम का उद्देश्य उपभोक्ताओं को भ्रामक दावों से बचाना और खाद्य उत्पादों के बारे में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। हालांकि, पहली नजर में यह बदलाव मामूली लग सकता है, लेकिन फूड इंडस्ट्री के लिए इसका असर काफी बड़ा और महंगा साबित हो सकता है।
उपभोक्ताओं के लिए राहत, कंपनियों के लिए चुनौती
भारत में कई खाद्य कंपनियां अपने उत्पादों को “100% शुद्ध”, “100% नैचुरल” या “100% क्वालिटी” जैसे शब्दों के साथ बाजार में बेचती रही हैं। FSSAI का मानना है कि ऐसे दावे कई बार वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं होते और ग्राहकों को भ्रमित कर सकते हैं। इसलिए नियामक ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में ऐसे दावों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।
यह कदम उपभोक्ताओं के हित में जरूर माना जा रहा है, लेकिन कंपनियों को अपने हजारों उत्पादों की पैकेजिंग दोबारा डिजाइन करनी पड़ेगी। यही वजह है कि उद्योग जगत इसे एक महंगा बदलाव मान रहा है।
सिर्फ एक शब्द हटाने की लागत करोड़ों में
TeamLease Regtech के CEO और को-फाउंडर ऋषि अग्रवाल के अनुसार, यह केवल पैकेट पर लिखा हुआ एक शब्द हटाने का मामला नहीं है। इसके पीछे पूरी सप्लाई चेन, डिजाइन सिस्टम और रेगुलेटरी प्रक्रिया जुड़ी हुई है।
एक मध्यम आकार की खाद्य कंपनी के पास 200 से 500 तक अलग-अलग उत्पाद (SKU) हो सकते हैं। प्रत्येक उत्पाद के लिए अलग-अलग पैकेट साइज, भाषाएं और क्षेत्रीय संस्करण होते हैं। ऐसे में पैकेजिंग बदलने के लिए:
- नए डिजाइन तैयार करने पड़ते हैं।
- कानूनी और नियामकीय मंजूरी लेनी होती है।
- नई प्रिंटिंग प्लेट्स बनानी पड़ती हैं।
- पैकेजिंग सामग्री का नया स्टॉक तैयार करना पड़ता है।
- वितरण नेटवर्क में बदलाव करना पड़ता है।
इन सभी प्रक्रियाओं पर करोड़ों रुपये का खर्च आ सकता है।
पुराने स्टॉक का क्या होगा?
सबसे बड़ी समस्या पहले से छपे हुए पैकेजिंग मटेरियल की होती है। कंपनियों के वेयरहाउस और बाजार में लाखों पैकेट पहले से मौजूद रहते हैं। नियम लागू होने के बाद इन पैकेजों को:
- जल्द बेचने की कोशिश करनी पड़ सकती है,
- वापस मंगाना पड़ सकता है,
- या फिर नष्ट करना पड़ सकता है।
इन विकल्पों में से कोई भी सस्ता नहीं है। कई मामलों में कंपनियों को पुराने स्टॉक को निकालने के लिए भारी छूट देनी पड़ती है, जिससे मुनाफे पर सीधा असर पड़ता है।
तीन तरह की लागत बढ़ेगी
विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के नियामकीय बदलाव से कंपनियों पर तीन प्रमुख प्रकार की लागत आती है।
1. डायरेक्ट कॉस्ट (Direct Cost)
यह सबसे स्पष्ट खर्च होता है। इसमें शामिल हैं:
- पैकेजिंग डिजाइन में बदलाव
- नई प्रिंटिंग प्लेट्स
- नए पैकेजिंग मटेरियल की खरीद
- पुराने स्टॉक का नुकसान
2. अपॉर्चुनिटी कॉस्ट (Opportunity Cost)
जब किसी कंपनी की मार्केटिंग, लीगल और प्रोडक्ट टीम महीनों तक सिर्फ लेबल बदलने में व्यस्त रहती है, तब नए उत्पादों की लॉन्चिंग और मार्केटिंग गतिविधियां प्रभावित होती हैं। इसका असर भविष्य की कमाई पर पड़ सकता है।
3. सिस्टमिक कॉस्ट (Systemic Cost)
इसमें सप्लाई चेन और बिजनेस ऑपरेशन से जुड़ी लागत शामिल होती है। जैसे:
- पुराने स्टॉक पर डिस्काउंट
- फंसी हुई वर्किंग कैपिटल
- इन्वेंट्री मैनेजमेंट की अतिरिक्त लागत
- वितरण नेटवर्क में बदलाव
छोटे कारोबारियों पर ज्यादा दबाव
भारत का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग बेहद बड़ा है। अनुमान के अनुसार देश में लगभग 25 लाख फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स हैं, जिनमें करीब 98% छोटे और सूक्ष्म उद्यम (Micro Enterprises) हैं।
बड़ी कंपनियां तो किसी तरह इन बदलावों को संभाल सकती हैं, लेकिन छोटे कारोबारियों के लिए पैकेजिंग बदलने का खर्च और नई मंजूरियां लेना मुश्किल हो सकता है। कई छोटे उद्यम सीमित पूंजी के साथ काम करते हैं और ऐसे बदलाव उनके नकदी प्रवाह पर असर डाल सकते हैं।
FSSAI ने दी राहत भी
उद्योग जगत के लिए राहत की बात यह है कि FSSAI ने नियमों को लागू करने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया बनाई है। नियामक हर साल 1 जुलाई को ऐसे बदलाव लागू करता है और कंपनियों को 180 दिनों का ट्रांजिशन पीरियड भी देता है।
इससे कंपनियों को:
- पुराने स्टॉक को खत्म करने,
- नई पैकेजिंग तैयार करने,
- और सप्लाई चेन को व्यवस्थित करने
के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।
पारदर्शिता बढ़ेगी, लेकिन संतुलन जरूरी
एपिस इंडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक अमित आनंद का मानना है कि ग्राहकों को सही और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित जानकारी मिलनी चाहिए। इसलिए भ्रामक दावों पर रोक लगाना जरूरी है। हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे नियम लागू करने से पहले उनके आर्थिक प्रभाव का भी आकलन किया जाना चाहिए।
यदि नियामकीय बदलावों की लागत बहुत अधिक हो जाती है तो इसका असर अंततः उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है, जिसका बोझ उपभोक्ताओं को उठाना पड़ सकता है।
निष्कर्ष
FSSAI का “100%” और “100% शुद्ध” जैसे दावों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला उपभोक्ताओं के हित में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे खाद्य उत्पादों के बारे में अधिक पारदर्शिता आएगी और भ्रामक मार्केटिंग पर रोक लगेगी। लेकिन दूसरी तरफ, कंपनियों को पैकेजिंग बदलने, पुराने स्टॉक को हटाने और नई अनुपालन प्रक्रियाओं को लागू करने में करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए यह बदलाव एक बड़ी वित्तीय चुनौती बन सकता है। इसलिए पारदर्शिता और कारोबारी व्यवहार्यता के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय में सबसे बड़ी जरूरत होगी।


