भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस एक बार फिर सबसे भरोसेमंद साझेदार बनकर उभरा है। जून 2026 में रूस से भारत के कच्चे तेल (Crude Oil) आयात में जोरदार उछाल देखने को मिला है। ऐसे समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को लेकर वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी हुई थी, रूस ने रिकॉर्ड मात्रा में तेल भेजकर भारतीय रिफाइनरियों की चिंता काफी हद तक कम कर दी।
जून में रूस से तेल आयात में बड़ी छलांग
मैरीटाइम इंटेलिजेंस फर्म केप्लर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 19 जून के बीच भारत ने रूस से औसतन 26.6 लाख बैरल प्रतिदिन (BPD) कच्चा तेल आयात किया। मई में यह आंकड़ा 19.1 लाख बैरल प्रतिदिन था। यानी एक महीने के भीतर रूसी तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इस बढ़ोतरी के साथ रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना हुआ है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से आयात भी 6.36 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर मजबूत बना रहा, जो मई के रिकॉर्ड 6.44 लाख बैरल प्रतिदिन से थोड़ा ही कम है।
जून में प्रमुख देशों से भारत का तेल आयात
| देश | आयात (BPD) |
|---|---|
| रूस | 26.6 लाख |
| UAE | 6.36 लाख |
| सऊदी अरब | 3.84 लाख |
| वेनेजुएला | 2.09 लाख |
| अमेरिका | 91 हजार |
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका से तेल आयात मई के 2.52 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर जून में केवल 91 हजार बैरल प्रतिदिन रह गया।
होर्मुज संकट ने बदला आयात का समीकरण
हाल के महीनों में अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच बढ़े तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई थीं। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल खपत का लगभग 20% हिस्सा गुजरता है।
यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित होता, तो भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता था। इसी जोखिम को देखते हुए भारतीय रिफाइनरियों ने रूस, UAE, वेनेजुएला और अन्य देशों से अतिरिक्त खरीद बढ़ा दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस रणनीति ने भारत को संभावित ऊर्जा संकट से बचाने में बड़ी भूमिका निभाई।
रूस क्यों बना भारत का सबसे अहम तेल साझेदार?
रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी ताकत उसकी प्रतिस्पर्धी कीमत है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस लगातार डिस्काउंट पर तेल बेच रहा है, जिसका फायदा भारतीय कंपनियां उठा रही हैं।
इसके अलावा रूस ने संकट के समय भी सप्लाई में कोई बड़ी रुकावट नहीं आने दी। यही वजह है कि भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल पर लगातार भरोसा जता रही हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि जून में रूस से भारत का औसत आयात 23.5 लाख बैरल प्रतिदिन से भी ऊपर जा सकता है, जो एक नया रिकॉर्ड होगा।
वेनेजुएला और ब्राजील की बढ़ी अहमियत
भारत अब केवल खाड़ी देशों या रूस पर निर्भर नहीं रहना चाहता। सप्लाई जोखिम कम करने के लिए भारतीय कंपनियां वेनेजुएला, ब्राजील और अटलांटिक बेसिन के अन्य देशों से भी तेल खरीद बढ़ा रही हैं।
जून में वेनेजुएला से आयात 3 लाख से 4 लाख बैरल प्रतिदिन के बीच रहने का अनुमान है। इससे भारी ग्रेड वाले कच्चे तेल को प्रोसेस करने वाली भारतीय रिफाइनरियों को अतिरिक्त विकल्प मिल रहा है।
हालांकि वेनेजुएला पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और उत्पादन संबंधी चुनौतियां भविष्य में अनिश्चितता पैदा कर सकती हैं।
LPG सप्लाई पर पड़ा सबसे ज्यादा असर
ऊर्जा बाजार के जानकारों के अनुसार, होर्मुज संकट का सबसे ज्यादा असर एलपीजी (LPG) बाजार पर पड़ा। कच्चे तेल और LNG की तुलना में LPG की सप्लाई अधिक प्रभावित हुई।
इस दौरान अमेरिका भारत के लिए एक महत्वपूर्ण LPG सप्लायर बनकर उभरा। पिछले वर्ष हुए दीर्घकालिक सप्लाई समझौतों का फायदा भारत को मिला और घरेलू बाजार में बड़ी किल्लत नहीं हुई।
हालांकि अमेरिका से आने वाले कार्गो का रास्ता लंबा होने के कारण शिपिंग लागत बढ़ गई।
भारत की ऊर्जा जरूरतें कितनी बड़ी हैं?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक देश है। देश अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है।
- कच्चे तेल की लगभग 88% जरूरत आयात से पूरी होती है।
- प्राकृतिक गैस की करीब 50% मांग आयात पर निर्भर है।
- LPG खपत का लगभग 65% हिस्सा विदेशों से आता है।
होर्मुज संकट से पहले खाड़ी देश भारत के कुल तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा, LNG जरूरतों का दो-तिहाई और LPG आयात का करीब 90% हिस्सा पूरा कर रहे थे।
आगे क्या रहेगा ट्रेंड?
विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति सामान्य होने के बाद भी रूस भारत के ऊर्जा आयात बास्केट में अहम भूमिका निभाता रहेगा। सस्ती कीमत, भरोसेमंद सप्लाई और मजबूत व्यापारिक संबंध रूस को भारतीय बाजार में मजबूत बनाए रखेंगे।
वहीं भारत भी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सप्लाई स्रोतों में विविधता बढ़ाने की रणनीति जारी रखेगा, ताकि भविष्य में किसी भी भू-राजनीतिक संकट का असर सीमित रहे।


