नई दिल्ली। करीब चार महीने तक चले तनाव और संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता लागू होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में राहत की उम्मीद बढ़ गई है। इस समझौते का असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों को भी इसका सीधा फायदा मिल सकता है। अगर समझौते के तहत ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो भारत एक बार फिर ईरानी कच्चे तेल का आयात शुरू कर सकता है। साथ ही, भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट परियोजना को भी नई गति मिलने की संभावना है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह समझौता?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है और अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था, महंगाई और व्यापार घाटे पर पड़ता है।
ईरान लंबे समय तक भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। वर्ष 2019 तक भारत अपने कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा ईरान से खरीदता था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारतीय रिफाइनरियों को ईरानी तेल खरीदना बंद करना पड़ा। इसके बाद भारत को सऊदी अरब, इराक, रूस और अमेरिका जैसे अन्य देशों पर अधिक निर्भर होना पड़ा।
अब यदि प्रतिबंध हटते हैं, तो भारत को फिर से एक सस्ता और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता मिल सकता है।
ईरानी तेल से भारत को क्या मिलेगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान से तेल आयात दोबारा शुरू होने पर भारत को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है।
सबसे पहला फायदा आपूर्ति के विविधीकरण का होगा। भारत किसी एक या दो देशों पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय अपने आयात स्रोतों को संतुलित कर सकेगा।
दूसरा बड़ा फायदा कीमतों का होगा। ईरान ऐतिहासिक रूप से भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धी दरों पर तेल उपलब्ध कराता रहा है। इसके अलावा भौगोलिक रूप से ईरान भारत के अपेक्षाकृत करीब है, जिससे परिवहन लागत भी कम रहती है।
ICRA के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और कॉर्पोरेट रेटिंग्स को-ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ के अनुसार, ईरान भारत को पहले 60 से 90 दिनों तक की क्रेडिट सुविधा देता था, जबकि अधिकांश अन्य आपूर्तिकर्ता 30 दिनों की क्रेडिट अवधि देते हैं। यदि भविष्य में भी ऐसी शर्तें लागू रहती हैं, तो भारतीय रिफाइनरियों को कार्यशील पूंजी के स्तर पर बड़ा लाभ मिल सकता है।
वैश्विक तेल बाजार में आएगी स्थिरता
अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला था। होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी बाधा की आशंका से वैश्विक बाजार चिंतित था, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी मार्ग से गुजरता है।
शांति समझौते के बाद ईरानी तेल निर्यात में बढ़ोतरी की संभावना है। इससे वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इसका लाभ भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों को मिलेगा।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अतिरिक्त सप्लाई आने से कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता बनी रह सकती है, जिससे पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की लागत पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
चाबहार पोर्ट परियोजना को मिलेगा नया जीवन
इस समझौते का सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ भारत को चाबहार पोर्ट के रूप में मिल सकता है।
ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार पोर्ट भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है। यह परियोजना पाकिस्तान को बायपास करते हुए भारत को क्षेत्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी का वैकल्पिक मार्ग प्रदान करती है।
अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव के कारण पिछले कुछ वर्षों में इस परियोजना की गति प्रभावित हुई थी। भारत को कई बार संचालन संबंधी व्यवस्थाओं में बदलाव करना पड़ा।
अब यदि प्रतिबंध हटते हैं, तो भारत शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के विकास और संचालन को पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ा सकेगा। भारत ने इस परियोजना में लगभग 370 मिलियन डॉलर (करीब 3,200 करोड़ रुपये) निवेश की प्रतिबद्धता जताई है।
मध्य एशिया तक व्यापार बढ़ाने का अवसर
चाबहार पोर्ट केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत की व्यापक भू-रणनीतिक नीति का हिस्सा है। इसके जरिए भारत अफगानिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और अन्य मध्य एशियाई देशों तक अपनी पहुंच मजबूत करना चाहता है।
यदि अमेरिका-ईरान संबंधों में स्थिरता आती है और प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो भारत की अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) परियोजना को भी गति मिल सकती है। इससे यूरोप और मध्य एशिया तक माल परिवहन की लागत और समय दोनों में कमी आएगी।
क्या तुरंत शुरू हो जाएगा तेल आयात?
हालांकि समझौता लागू हो गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत द्वारा ईरान से तेल आयात फिर से शुरू होने में कुछ समय लग सकता है। समझौते के बाद प्रस्तावित 60 दिनों की वार्ता अवधि में दोनों देशों के बीच कई तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर सहमति बननी बाकी है।
इसके अलावा भारतीय रिफाइनरियों को भी खरीद अनुबंध, भुगतान व्यवस्था और शिपिंग लॉजिस्टिक्स को लेकर नई रणनीति तैयार करनी होगी। इसलिए तत्काल बड़े स्तर पर आयात शुरू होने की संभावना कम है, लेकिन दिशा सकारात्मक दिखाई दे रही है।
भारत के लिए बड़ा रणनीतिक और आर्थिक अवसर
अमेरिका-ईरान शांति समझौता केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार विस्तार और क्षेत्रीय रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का अवसर भी है। यदि प्रतिबंधों में अपेक्षित ढील मिलती है, तो भारत को सस्ते कच्चे तेल, बेहतर क्रेडिट सुविधा और चाबहार पोर्ट के माध्यम से मध्य एशिया तक मजबूत पहुंच का लाभ मिल सकता है। आने वाले महीनों में यह समझौता भारत की ऊर्जा और विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।


