नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश में डॉलर की आवक बढ़ाने और रुपये को मजबूती देने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है। हाल के महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपये पर बढ़ते दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार में आई गिरावट को देखते हुए केंद्रीय बैंक अब सक्रिय रणनीति पर काम कर रहा है। इसी कड़ी में RBI ने देश के प्रमुख सरकारी और निजी बैंकों को प्रवासी भारतीयों (NRI) से अधिक से अधिक विदेशी मुद्रा जुटाने के निर्देश दिए हैं।
Highlights
- RBI ने बैंकों को FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए ज्यादा विदेशी मुद्रा जुटाने का निर्देश दिया
- NRI निवेश के माध्यम से देश में 30 से 70 अरब डॉलर तक आने की उम्मीद
- विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाकर रुपये को मजबूती देने की कोशिश
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक RBI के डिप्टी गवर्नर ने हाल ही में बैंकिंग सेक्टर के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर FCNR(B) यानी Foreign Currency Non-Resident (Bank) Deposit Scheme के तहत विदेशी फंड जुटाने के प्रयास तेज करने को कहा है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि इस कदम से देश में डॉलर की उपलब्धता बढ़ेगी और रुपये को स्थिरता मिलेगी।
FCNR(B) स्कीम पर क्यों है RBI का फोकस?
FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम विशेष रूप से प्रवासी भारतीयों के लिए बनाई गई है। इसके तहत NRI अपनी विदेशी मुद्रा को भारतीय बैंकों में जमा कर सकते हैं। यह जमा राशि डॉलर, यूरो, पाउंड या अन्य विदेशी मुद्राओं में रखी जाती है, जिससे निवेशक को रुपये में उतार-चढ़ाव का जोखिम नहीं उठाना पड़ता।
RBI चाहता है कि अधिक से अधिक प्रवासी भारतीय इस स्कीम में निवेश करें ताकि भारतीय बैंक विदेशी मुद्रा जुटा सकें। इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी और डॉलर की मांग तथा आपूर्ति के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा।
बैठक में शामिल बैंक अधिकारियों के अनुसार RBI ने साफ संकेत दिया है कि वर्तमान परिस्थितियों में विदेशी मुद्रा जुटाना प्राथमिकता है। इसके बाद कई बैंकों ने FCNR(B) डिपॉजिट पर ब्याज दरों में 200 से 300 बेसिस पॉइंट तक बढ़ोतरी कर दी है। फिलहाल कई बैंक 3 से 5 साल की अवधि वाले FCNR(B) डिपॉजिट पर 5.25% से 7.1% तक ब्याज ऑफर कर रहे हैं।
RBI खुद उठा रहा है हेजिंग कॉस्ट
इस योजना का सबसे आकर्षक पहलू यह है कि RBI विदेशी मुद्रा जोखिम को कम करने के लिए हेजिंग कॉस्ट का बड़ा हिस्सा खुद वहन कर रहा है। आमतौर पर विदेशी मुद्रा जमा पर बैंकों को अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ता है, लेकिन RBI के समर्थन से बैंकों के लिए विदेशी फंड जुटाना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान और लाभदायक हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बैंकों को NRI ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए और अधिक प्रतिस्पर्धी ऑफर देने के लिए प्रेरित करेगा।
रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव?
पिछले वित्त वर्ष के दौरान भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 11 प्रतिशत कमजोर हुआ। मई महीने में रुपया गिरकर 96.96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था। हालांकि हाल के दिनों में इसमें कुछ सुधार देखने को मिला और रुपया 95.11 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ।
रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे कई वैश्विक कारण रहे हैं। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिका-ईरान संघर्ष और वैश्विक निवेशकों की जोखिम से बचने की रणनीति ने उभरते बाजारों की मुद्राओं को प्रभावित किया है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।
विदेशी मुद्रा भंडार में आई कमी
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फरवरी में लगभग 728 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन रुपये को संभालने के लिए RBI के लगातार हस्तक्षेप और वैश्विक परिस्थितियों के कारण जून की शुरुआत तक यह घटकर करीब 681 अरब डॉलर रह गया।
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। इसका उपयोग आयात भुगतान, मुद्रा स्थिरता और वैश्विक संकट के समय वित्तीय सुरक्षा कवच के रूप में किया जाता है। इसी कारण RBI अब विदेशी मुद्रा भंडार को दोबारा मजबूत करने पर जोर दे रहा है।
कितना डॉलर आने की उम्मीद?
अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि RBI की इस रणनीति से देश में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आ सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार FCNR(B) अभियान के जरिए 30 से 50 अरब डॉलर तक की नई विदेशी मुद्रा भारत में आ सकती है। वहीं ICICI बैंक की एक रिसर्च रिपोर्ट में यह अनुमान 70 अरब डॉलर तक बताया गया है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रवासी भारतीयों की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही तो यह अभियान 2013 के FCNR(B) कार्यक्रम की तरह सफल साबित हो सकता है, जब भारत ने अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा आकर्षित की थी।
रुपये को कितना फायदा मिलेगा?
विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ने से डॉलर की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बेहतर होगा। इससे रुपये पर दबाव कम हो सकता है।
बाजार जानकारों का अनुमान है कि यदि अपेक्षित स्तर पर डॉलर का प्रवाह होता है तो रुपया आने वाले महीनों में 92 से 93 प्रति डॉलर के दायरे तक मजबूत हो सकता है। हालांकि यह पूरी तरह वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर भी निर्भर करेगा।
RBI ने और क्या राहत दी?
RBI ने बैंकों के लिए कुछ नियामकीय पाबंदियों में भी ढील दी है। अब FCNR(B) डिपॉजिट के आधार पर बैंक Letter of Credit (LC) और विभिन्न प्रकार की बैंक गारंटी जारी कर सकेंगे।
विशेषज्ञों के मुताबिक इससे पूंजी का प्रवाह कई गुना बढ़ सकता है। कुछ अनुमानों के अनुसार इसका प्रभाव 10 से 20 गुना तक देखने को मिल सकता है, जिससे बैंकिंग प्रणाली में तरलता बढ़ेगी।
रिटेल निवेशकों के लिए भी दिए निर्देश
विदेशी मुद्रा जुटाने के अलावा RBI घरेलू वित्तीय प्रणाली को भी मजबूत करना चाहता है। इसी उद्देश्य से बैंकों को Unified Lending Interface (ULI), रिटेल सरकारी प्रतिभूतियों और Central Bank Digital Currency (CBDC) जैसे उत्पादों को आम लोगों तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
केंद्रीय बैंक का मानना है कि डिजिटल वित्तीय सेवाओं का विस्तार भारत की अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूत, पारदर्शी और समावेशी बना सकता है।
निष्कर्ष
डॉलर के मुकाबले रुपये पर बढ़ते दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार में आई कमी के बीच RBI ने FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम के जरिए विदेशी मुद्रा आकर्षित करने का बड़ा अभियान शुरू किया है। NRI निवेशकों को बेहतर ब्याज दरें और बैंकों को दी गई नियामकीय राहत इस योजना को और आकर्षक बना रही है। यदि अनुमान के अनुसार 30 से 70 अरब डॉलर तक का निवेश भारत में आता है तो इससे विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा, रुपये को सहारा मिलेगा और भारतीय अर्थव्यवस्था को भी स्थिरता मिल सकती है।


