नई दिल्ली। दुनिया की सप्लाई चेन में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कभी वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले चीन पर अत्यधिक निर्भरता अब कई देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) को जोखिमपूर्ण लगने लगी है। अमेरिका-चीन तनाव, कोविड-19 महामारी के दौरान सप्लाई चेन में आई रुकावटें, बढ़ती मजदूरी लागत और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने कंपनियों को नए विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है।
इसी बदलाव ने “China+1 Strategy” को जन्म दिया, जिसके तहत कंपनियां चीन में अपना कारोबार जारी रखते हुए किसी दूसरे देश में भी उत्पादन क्षमता विकसित कर रही हैं। इस वैश्विक रणनीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बनने की दौड़ में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है।
यस सिक्योरिटीज की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास ऐसा अवसर है जो शायद एक पीढ़ी में केवल एक बार मिलता है। यदि देश सही दिशा में सुधार और निवेश जारी रखता है, तो वह दुनिया के प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर सकता है।
क्या है China+1 Strategy और क्यों बढ़ रहा है इसका महत्व?
China+1 Strategy का अर्थ है कि वैश्विक कंपनियां अपने उत्पादन और सप्लाई नेटवर्क को केवल चीन तक सीमित नहीं रखना चाहतीं। वे जोखिम कम करने के लिए किसी दूसरे देश में भी मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार कर रही हैं।
कोविड महामारी के दौरान जब चीन में लॉकडाउन लगा, तब दुनिया भर की कंपनियों को उत्पादन और सप्लाई में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके बाद अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा, जिससे कंपनियों को यह एहसास हुआ कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
इसी वजह से कंपनियां भारत, वियतनाम, मैक्सिको, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों की ओर देख रही हैं।
भारत क्यों बन रहा है कंपनियों की पहली पसंद?
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल कार्यबल (Labour Force) और तेजी से बढ़ता घरेलू बाजार है। दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के कारण भारत कंपनियों को न केवल उत्पादन का अवसर देता है, बल्कि एक विशाल उपभोक्ता बाजार भी उपलब्ध कराता है।
इसके अलावा सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिन्होंने विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है।
प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना, औद्योगिक कॉरिडोर, नए एक्सप्रेसवे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, आधुनिक बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क ने भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत किया है।
यस सिक्योरिटीज का मानना है कि इन सुधारों के कारण भारत अब केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि वैश्विक उत्पादन केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर बना सबसे बड़ा विजेता
China+1 Strategy का सबसे बड़ा असर भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में दिखाई दे रहा है।
कुछ साल पहले तक भारत बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का आयात करता था। लेकिन आज स्थिति तेजी से बदल रही है। विशेष रूप से स्मार्टफोन निर्माण के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है।
ऐपल और उसके सप्लायर नेटवर्क द्वारा भारत में किए गए निवेश ने पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम को बदल दिया है। आज भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते स्मार्टफोन निर्यातकों में शामिल हो चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान गति बनी रहती है तो आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
फार्मा और इंजीनियरिंग सेक्टर को भी मिलेगा फायदा
भारत पहले से ही जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। China+1 Strategy के चलते फार्मास्यूटिकल्स सेक्टर को नई गति मिल सकती है।
कई वैश्विक कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत से दवा और मेडिकल उपकरणों की खरीद बढ़ा सकती हैं।
इसी तरह इंजीनियरिंग गुड्स सेक्टर में भी नए अवसर बन रहे हैं। मशीनरी, औद्योगिक उपकरण और विशेष इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में वृद्धि की संभावना है।
यस सिक्योरिटीज का कहना है कि यदि भारत गुणवत्ता और लागत प्रतिस्पर्धा बनाए रखता है तो इंजीनियरिंग निर्यात आने वाले वर्षों में नई ऊंचाइयों को छू सकता है।
ऑटो कंपोनेंट उद्योग को मिल सकता है बड़ा फायदा
ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी China+1 Strategy का सकारात्मक असर दिखाई दे सकता है।
दुनिया भर की वाहन निर्माता कंपनियां अब सप्लाई चेन को विविधतापूर्ण बनाने की कोशिश कर रही हैं। इसके चलते भारतीय ऑटो एंसिलरी और ऑटो कंपोनेंट कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
भारत पहले से ही कई वैश्विक ऑटोमोबाइल कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण सप्लायर है। यदि निवेश और तकनीकी क्षमता में वृद्धि जारी रहती है तो यह क्षेत्र निर्यात का बड़ा केंद्र बन सकता है।
FTA समझौते बढ़ा रहे भारत की ताकत
भारत ने हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) किए हैं।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के साथ हुए समझौतों ने भारतीय निर्यातकों के लिए नए दरवाजे खोले हैं।
इसके अलावा यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ चल रही बातचीत भविष्य में और बड़े अवसर पैदा कर सकती है।
इन समझौतों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि भारतीय कंपनियों को प्रमुख बाजारों में बेहतर पहुंच और टैरिफ लाभ मिल सकता है। इससे भारत को वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी।
चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं
हालांकि अवसर बड़े हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
भारत में लॉजिस्टिक्स लागत अभी भी कई प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में अधिक है। बिजली की लागत, नियामकीय जटिलताएं, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया और श्रम उत्पादकता जैसे मुद्दे निवेशकों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल FTA या PLI योजनाएं ही पर्याप्त नहीं होंगी। भारत को अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता लगातार बढ़ानी होगी।
अगर इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया तो कंपनियां वियतनाम, इंडोनेशिया या मैक्सिको जैसे देशों की ओर भी रुख कर सकती हैं।
क्या भारत बन सकता है अगला वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दुनिया की सप्लाई चेन में जो बदलाव इस समय हो रहा है, वह अगले कई दशकों की आर्थिक दिशा तय कर सकता है।
भारत के पास युवा आबादी, बड़ा बाजार, बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर और सुधारों की मजबूत गति जैसी कई खूबियां हैं। यदि सरकार और उद्योग जगत मिलकर प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बेहतर बनाने पर काम करते हैं तो भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
China+1 Strategy भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक अवसर नहीं बल्कि आर्थिक परिवर्तन का अवसर है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे “एक पीढ़ी में मिलने वाला मौका” बता रहे हैं।
निष्कर्ष
China+1 Strategy ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में नए समीकरण पैदा किए हैं। चीन से बाहर निकलती कंपनियां ऐसे देशों की तलाश कर रही हैं जो बड़े पैमाने पर उत्पादन, स्थिर नीतियां और मजबूत बाजार प्रदान कर सकें।
भारत इन सभी मानकों पर तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, इंजीनियरिंग और ऑटो कंपोनेंट जैसे क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियां इसकी पुष्टि करती हैं। हालांकि सफलता के लिए भारत को लागत, लॉजिस्टिक्स और उत्पादकता से जुड़ी चुनौतियों पर लगातार काम करना होगा।
यदि सुधारों की रफ्तार बनी रहती है, तो China+1 Strategy भारत की आर्थिक कहानी को अगले दशक में पूरी तरह बदल सकती है।


