नई दिल्ली। दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। विश्व बैंक (World Bank) ने 2026 के लिए वैश्विक आर्थिक वृद्धि (Global Growth) के अपने अनुमान को घटाकर 2.5 प्रतिशत कर दिया है। यह कोरोना महामारी के बाद सबसे कमजोर वैश्विक वृद्धि दर मानी जा रही है। इतना ही नहीं, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति संकट और गहरा होता है तो वैश्विक विकास दर घटकर केवल 1.3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
विश्व बैंक की यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब दुनिया पहले से ही महंगाई, ऊंची ब्याज दरों, सप्लाई चेन की समस्याओं और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो दुनिया को 2008 की वित्तीय मंदी और 2020 की महामारी जैसी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
क्यों घटाया गया ग्लोबल ग्रोथ का अनुमान?
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों पर पड़ता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल, गैस और अन्य कमोडिटी की आपूर्ति प्रभावित होने से उत्पादन लागत बढ़ रही है। इसका असर उद्योगों, परिवहन और उपभोक्ता खर्च पर दिखाई दे रहा है। नतीजतन दुनिया की अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं में विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
विश्व बैंक का कहना है कि वर्तमान हालात ने जनवरी में किए गए आर्थिक अनुमानों को पूरी तरह बदल दिया है। जहां पहले कमोडिटी कीमतों में गिरावट की उम्मीद थी, वहीं अब तेज बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है।
दो-तिहाई देशों की अर्थव्यवस्था पर संकट
रिपोर्ट की सबसे चिंताजनक बात यह है कि दुनिया की लगभग दो-तिहाई अर्थव्यवस्थाओं में विकास दर कमजोर रहने का अनुमान है। विकसित देशों से लेकर उभरते बाजारों तक, लगभग हर क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है।
अमेरिका और यूरोप पहले से ही ऊंची ब्याज दरों और कमजोर मांग का सामना कर रहे हैं। वहीं विकासशील देशों को ऊर्जा आयात और बढ़ती महंगाई के कारण अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ सकता है।
भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे बड़े उभरते बाजार भी वैश्विक मांग में कमी का असर महसूस कर सकते हैं। हालांकि इन देशों की स्थिति विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है।
कमोडिटी कीमतों में 22% उछाल का अनुमान
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2026 में वैश्विक कमोडिटी कीमतों में औसतन 22 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है। यह अनुमान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ महीने पहले तक इन कीमतों में गिरावट की संभावना जताई जा रही थी।
ऊर्जा उत्पादों के अलावा खाद्यान्न, धातु और औद्योगिक कच्चे माल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसका असर दुनिया भर के उपभोक्ताओं और उद्योगों पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो परिवहन लागत बढ़ेगी। इससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में और तेजी आ सकती है।
यूरोप में गैस संकट गहरा सकता है
विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में प्राकृतिक गैस बाजार को लेकर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक एलएनजी (Liquefied Natural Gas) की सीमित उपलब्धता के कारण यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतों में इस साल लगभग 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।
यूरोप पहले ही रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती से जूझ रहा है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव जारी रहता है तो गैस की आपूर्ति और अधिक प्रभावित हो सकती है।
ऊर्जा लागत बढ़ने का असर उद्योगों के उत्पादन पर पड़ेगा, जिससे आर्थिक गतिविधियां कमजोर हो सकती हैं।
सबसे खराब स्थिति में केवल 1.3% रह जाएगी वृद्धि
विश्व बैंक ने एक वैकल्पिक परिदृश्य भी पेश किया है। इसके अनुसार यदि ऊर्जा आपूर्ति में बाधाएं उम्मीद से ज्यादा गंभीर हो जाती हैं और वैश्विक वित्तीय बाजारों में तनाव बढ़ जाता है, तो दुनिया की आर्थिक वृद्धि दर केवल 1.3 प्रतिशत तक सीमित रह सकती है।
यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद गंभीर मानी जाएगी। इतनी कम वृद्धि दर का मतलब होगा कि रोजगार सृजन धीमा पड़ेगा, निवेश कम होगा और कई देशों में आर्थिक संकट गहरा सकता है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऐसी स्थिति में कई केंद्रीय बैंकों के सामने मुश्किल चुनौती होगी। एक तरफ महंगाई को नियंत्रित करना होगा और दूसरी तरफ आर्थिक विकास को भी बचाना होगा।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। हालांकि वैश्विक मंदी की आशंकाओं से भारत भी पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि तेल और गैस की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो आयात बिल बढ़ सकता है। इससे चालू खाते का घाटा और महंगाई दोनों बढ़ने का खतरा रहेगा।
इसके अलावा अमेरिका और यूरोप में मांग कमजोर होने पर भारतीय निर्यात क्षेत्र पर भी दबाव आ सकता है। आईटी, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि मजबूत घरेलू मांग, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और सरकारी पूंजीगत खर्च भारत को कई अन्य देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में रख सकते हैं।
क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बन सकता है उम्मीद की किरण?
विश्व बैंक ने रिपोर्ट में एक सकारात्मक पहलू का भी उल्लेख किया है। संस्था का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए विकास का नया इंजन बन सकता है।
AI तकनीक उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और नए उद्योगों को जन्म देने की क्षमता रखती है। यदि सरकारें और कंपनियां इसका प्रभावी उपयोग करती हैं तो यह वैश्विक विकास दर को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि AI का लाभ तुरंत नहीं मिलेगा। इसके लिए बड़े निवेश, कौशल विकास और तकनीकी ढांचे की जरूरत होगी।
क्या दुनिया नई मंदी की ओर बढ़ रही है?
फिलहाल विश्व बैंक ने वैश्विक मंदी की घोषणा नहीं की है, लेकिन उसकी चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई और कमजोर निवेश मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहे हैं।
यदि पश्चिम एशिया का संघर्ष लंबा खिंचता है और ऊर्जा आपूर्ति में और बाधाएं आती हैं तो दुनिया की आर्थिक वृद्धि अपेक्षा से कहीं ज्यादा कमजोर हो सकती है। ऐसे में 2026 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण वर्ष साबित हो सकता है।
निवेशकों, कंपनियों और सरकारों को आने वाले महीनों में ऊर्जा बाजार, महंगाई के रुझान और वैश्विक व्यापार गतिविधियों पर विशेष नजर रखनी होगी। यही कारक तय करेंगे कि दुनिया धीमी वृद्धि के दौर में जाएगी या फिर एक बड़ी आर्थिक मंदी का सामना करेगी।


