नई दिल्ली: वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रही है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमेरिका और चीन की आर्थिक सुस्ती तथा वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता के बीच दुनिया के अधिकांश देशों की विकास दर पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में भारत के लिए एक बड़ी सकारात्मक खबर सामने आई है। विश्व बैंक (World Bank) ने अपनी ताजा ग्लोबल इकोनॉमिक प्रॉस्पेक्ट्स रिपोर्ट में कहा है कि भारत आने वाले वर्षों में भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।
विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP Growth Rate) का अनुमान बढ़ाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले जनवरी में जारी अनुमान में यह दर 6.5 प्रतिशत रखी गई थी। वहीं वर्ष 2027 के लिए अनुमान को 6.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया गया है। यह संशोधन ऐसे समय में आया है जब दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के विकास अनुमान घटाए जा रहे हैं।
मजबूत घरेलू मांग बनी भारत की सबसे बड़ी ताकत
विश्व बैंक के अनुसार भारत की आर्थिक मजबूती के पीछे सबसे बड़ा कारण घरेलू मांग (Domestic Demand) है। भारत की विशाल आबादी, बढ़ती आय, शहरीकरण और उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था देश को वैश्विक अनिश्चितताओं से काफी हद तक बचाने का काम कर रही है।
विश्व बैंक के डिप्टी चीफ इकोनॉमिस्ट आयहान कोसे ने मीडिया से बातचीत में कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में घरेलू मांग उम्मीद से अधिक मजबूत बनी हुई है। यही वजह है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आर्थिक जोखिमों के बावजूद भारत का विकास अनुमान बढ़ाया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था अब केवल निर्यात पर निर्भर नहीं है। देश के भीतर उपभोक्ता खर्च, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, सरकारी पूंजीगत व्यय और निजी क्षेत्र की भागीदारी आर्थिक गतिविधियों को गति दे रही है।
मिडिल ईस्ट संकट के बावजूद क्यों मजबूत है भारत?
मध्य पूर्व क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या भू-राजनीतिक संकट तेल की कीमतों को प्रभावित करता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल कीमतों में वृद्धि का असर सीधे अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
इसके बावजूद विश्व बैंक का मानना है कि भारत की आर्थिक बुनियाद इतनी मजबूत है कि वह इस चुनौती का सामना कर सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और वैकल्पिक ऊर्जा परियोजनाओं पर निवेश बढ़ाया है।
इसके अलावा सरकार की ओर से उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI), डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स सुधार और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करने के प्रयास भी विकास को सहारा दे रहे हैं।
एक्सपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से मिल रहा समर्थन
विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि घरेलू मांग के साथ-साथ निर्यात क्षेत्र में आई मजबूती भी भारत की विकास दर को बढ़ावा दे रही है।
हाल के वर्षों में भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। एप्पल और कई वैश्विक कंपनियों द्वारा भारत में उत्पादन बढ़ाने से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नई गति मिली है।
सरकार के “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे कार्यक्रमों का प्रभाव भी अब दिखाई देने लगा है। इससे रोजगार सृजन के साथ-साथ निर्यात क्षमता में भी सुधार हुआ है।
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत आगे
विश्व बैंक की रिपोर्ट में भारत की स्थिति अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी मजबूत दिखाई गई है।
अमेरिका, यूरोप और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाएं अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि का सामना कर रही हैं। उच्च ब्याज दरें, कमजोर उपभोक्ता मांग और वैश्विक व्यापार में सुस्ती इन देशों के लिए चुनौती बनी हुई है।
इसके विपरीत भारत में निवेश गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति बेहतर हुई है, कॉरपोरेट बैलेंस शीट मजबूत हुई हैं और सरकारी निवेश लगातार बढ़ रहा है। यही कारण है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति बनाए हुए है।
दक्षिण एशिया रहेगा सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र
विश्व बैंक के अनुसार वर्ष 2026 में दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र बना रहेगा। हालांकि 2025 में क्षेत्रीय विकास दर 7 प्रतिशत से घटकर 6.3 प्रतिशत रहने की संभावना है।
इस गिरावट की मुख्य वजह ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और वैश्विक संघर्षों का प्रभाव बताया गया है। इसके बावजूद भारत की मजबूत वृद्धि दर पूरे क्षेत्र को सहारा देगी।
रिपोर्ट के अनुसार 2027 तक दक्षिण एशिया की विकास दर फिर से 6.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसमें भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहने वाली है।
भारत के लिए क्या हैं प्रमुख जोखिम?
हालांकि विश्व बैंक ने भारत की विकास संभावनाओं को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया है, लेकिन कुछ जोखिम भी बताए हैं।
सबसे बड़ा जोखिम कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। यदि मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो तेल आयात बिल बढ़ सकता है। इससे महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव आ सकता है।
इसके अलावा वैश्विक व्यापार में मंदी, विकसित देशों में आर्थिक सुस्ती और भू-राजनीतिक तनाव भी भारतीय निर्यात को प्रभावित कर सकते हैं।
फिर भी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की आर्थिक बुनियाद फिलहाल मजबूत है और इन जोखिमों का प्रभाव सीमित रहने की संभावना है।
2028 तक भी मजबूत रहने की उम्मीद
विश्व बैंक ने केवल अगले दो वर्षों के लिए ही नहीं बल्कि 2028 तक भारत की मजबूत विकास क्षमता पर भरोसा जताया है। रिपोर्ट के अनुसार 2028 में भी भारत की आर्थिक वृद्धि दर करीब 7 प्रतिशत रहने की संभावना है।
यह संकेत देता है कि भारत केवल अल्पकालिक नहीं बल्कि मध्यम अवधि में भी वैश्विक विकास का प्रमुख केंद्र बना रह सकता है।
निवेशकों और उद्योग जगत के लिए क्या मतलब?
विश्व बैंक की रिपोर्ट निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत है। मजबूत विकास दर का मतलब है कि भारत में उपभोग, इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग, ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में अवसर बढ़ सकते हैं।
उद्योग जगत के लिए यह संकेत है कि भारत में मांग का आधार मजबूत बना हुआ है। वहीं विदेशी निवेशकों के लिए भी भारत आकर्षक निवेश गंतव्य बना रहेगा।
कुल मिलाकर, वैश्विक अनिश्चितताओं और मिडिल ईस्ट संकट के बावजूद विश्व बैंक का ताजा आकलन यह दर्शाता है कि भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। मजबूत घरेलू मांग, बढ़ते निवेश, निर्यात में सुधार और सरकार के संरचनात्मक सुधार भारत की विकास यात्रा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।


