नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का असर गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। अमेरिका द्वारा ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद वैश्विक निवेशकों के बीच चिंता बढ़ गई। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में दो फीसदी से अधिक की तेजी दर्ज की गई, जिसका दबाव भारतीय बाजार पर भी देखने को मिला।
कारोबार की शुरुआत से ही निवेशकों का रुख सतर्क रहा। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 400 अंकों से अधिक टूट गया, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 इंडेक्स 23,100 अंक के नीचे फिसल गया। हालांकि दोपहर के कारोबार में कुछ खरीदारी लौटने से बाजार ने नुकसान का एक हिस्सा रिकवर किया, लेकिन अंत में दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए।
सेंसेक्स 150.63 अंक यानी 0.20 फीसदी की गिरावट के साथ 73,832.55 अंक पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 53.35 अंक यानी 0.23 फीसदी टूटकर 23,161.60 अंक पर आ गया। विदेशी मुद्रा बाजार में भी दबाव देखने को मिला और डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 0.5 फीसदी कमजोर होकर 95.76 पर बंद हुआ। पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 95.2650 पर बंद हुआ था।
पश्चिम एशिया संकट से क्यों डरा बाजार?
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पिछले कुछ दिनों से लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका द्वारा ईरान के कई ठिकानों पर कार्रवाई के बाद क्षेत्रीय संघर्ष और व्यापक होने की आशंका पैदा हो गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा कि ईरान को बातचीत और समझौते के लिए पर्याप्त समय दिया गया था, लेकिन अब उसे इसकी कीमत चुकानी होगी। इस बयान के बाद वैश्विक वित्तीय बाजारों में जोखिम लेने की क्षमता कमजोर हुई और निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करना शुरू कर दिया।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है, जिसका सीधा असर भारत जैसे तेल आयातक देशों पर पड़ेगा।
आईटी शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली
गुरुवार के कारोबार में आईटी सेक्टर सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले सेक्टरों में शामिल रहा। निवेशकों ने बड़े आईटी शेयरों में मुनाफावसूली की, जिससे पूरे सेक्टर पर दबाव बना।
इन्फोसिस का शेयर 2.28 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुआ और यह निफ्टी का सबसे बड़ा लूजर रहा। इसके अलावा एचसीएल टेक समेत कई टेक कंपनियों के शेयरों में भी कमजोरी देखने को मिली।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वैश्विक मांग को लेकर बनी अनिश्चितता का असर भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ सकता है क्योंकि इनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों से आता है। यही वजह है कि तनाव बढ़ने पर सबसे पहले आईटी शेयर दबाव में आते हैं।
सेंसेक्स के 30 में से 21 शेयर लाल निशान में
बीएसई सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 21 गिरावट के साथ बंद हुए। इन्फोसिस के अलावा अडानी पोर्ट्स, एचसीएल टेक, इटरनल, हिंदुस्तान यूनिलीवर, बजाज फाइनेंस, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), लार्सन एंड टुब्रो, ट्रेंट और एशियन पेंट्स में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि बाजार में कुछ शेयरों ने मजबूती भी दिखाई। महिंद्रा एंड महिंद्रा, आईसीआईसीआई बैंक, सन फार्मा, भारती एयरटेल और रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर हरे निशान में बंद हुए। इन शेयरों में खरीदारी ने बाजार को बड़ी गिरावट से बचाने में मदद की।
ब्रॉडर मार्केट में भी दिखी कमजोरी
केवल बड़े शेयर ही नहीं बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.81 फीसदी गिरकर बंद हुआ जबकि निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.67 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
ब्रॉडर मार्केट में कमजोरी यह संकेत देती है कि निवेशक केवल चुनिंदा बड़े शेयरों में ही नहीं बल्कि छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों में भी जोखिम कम कर रहे हैं।
मार्केट विशेषज्ञों का कहना है कि जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश विकल्पों को प्राथमिकता देते हैं। यही कारण है कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में ज्यादा दबाव देखने को मिलता है।
सेक्टरवार प्रदर्शन कैसा रहा?
सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो निफ्टी आईटी, निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और निफ्टी केमिकल इंडेक्स में प्रमुख गिरावट रही। दूसरी ओर निफ्टी मीडिया, निफ्टी प्राइवेट बैंक और निफ्टी फार्मा इंडेक्स मजबूती के साथ बंद हुए।
फार्मा शेयरों में खरीदारी का कारण निवेशकों का रक्षात्मक सेक्टरों की ओर रुख माना जा रहा है। अनिश्चितता के माहौल में फार्मा और हेल्थकेयर जैसे सेक्टर अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं।
कच्चे तेल की कीमतों का भारत पर क्या असर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। इसलिए तेल की कीमतों में हर बढ़ोतरी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगा कच्चा तेल आयात बिल बढ़ाता है, जिससे चालू खाता घाटा और मुद्रास्फीति दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
तेल की कीमतें बढ़ने से परिवहन, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग लागत भी बढ़ती है। इससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि कच्चे तेल में तेजी आते ही शेयर बाजार अक्सर नकारात्मक प्रतिक्रिया देता है।
हालांकि कारोबार के अंत तक ब्रेंट क्रूड में कुछ नरमी देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 0.79 फीसदी की गिरावट के साथ 92.36 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया। इसके बावजूद निवेशकों की चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है क्योंकि पश्चिम एशिया का तनाव अभी बना हुआ है।
आगे बाजार की दिशा क्या होगी?
विश्लेषकों के अनुसार आने वाले कारोबारी सत्रों में बाजार की दिशा मुख्य रूप से तीन कारकों से तय होगी। पहला, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किस दिशा में जाता है। दूसरा, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव। तीसरा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की गतिविधियां।
यदि भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ता है तथा कच्चा तेल 95 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर स्थिर होता है तो भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं तनाव कम होने और तेल की कीमतों में नरमी आने पर बाजार में राहत की रैली भी देखने को मिल सकती है।
फिलहाल निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं और वैश्विक घटनाक्रमों पर उनकी नजर बनी हुई है।
(डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेश करने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।)


