नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज उछाल का असर अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका में महंगाई दर मई महीने में बढ़कर 4.2 फीसदी पर पहुंच गई है, जो पिछले तीन वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। यह आंकड़ा अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के 2 फीसदी के दीर्घकालिक लक्ष्य से दोगुना है। इससे न केवल आम अमेरिकी नागरिकों का घरेलू बजट प्रभावित हुआ है, बल्कि ब्याज दरों को लेकर भी नई चिंताएं पैदा हो गई हैं।
अमेरिकी श्रम विभाग के तहत काम करने वाले ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स (BLS) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार मई में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में मासिक आधार पर 0.50 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि बाजार की अपेक्षाओं से अधिक रही और इसमें ऊर्जा क्षेत्र, विशेष रूप से पेट्रोलियम उत्पादों की बड़ी भूमिका रही।
तेल की कीमतों ने बढ़ाया महंगाई का दबाव
विश्लेषकों का मानना है कि मई में दर्ज महंगाई वृद्धि का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल रहा। BLS के आंकड़ों के अनुसार, CPI में हुई कुल मासिक वृद्धि का लगभग 60 फीसदी योगदान ऊर्जा लागत से आया है। पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन उत्पादों की कीमतें बढ़ने से परिवहन, लॉजिस्टिक्स और उत्पादन लागत में भी वृद्धि हुई, जिसका असर सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ा।
हालांकि राहत की बात यह रही कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में अपेक्षाकृत सीमित बढ़ोतरी देखने को मिली। मई में फूड प्राइस इंडेक्स 0.2 फीसदी बढ़ा जबकि ग्रोसरी की कीमतों में केवल 0.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। अप्रैल में यह वृद्धि क्रमशः 0.5 फीसदी और 0.7 फीसदी रही थी। इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल महंगाई का मुख्य दबाव ऊर्जा क्षेत्र से आ रहा है।
आम लोगों का बजट बिगड़ा
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे अधिक असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है। अमेरिका में बड़ी संख्या में लोग निजी वाहनों पर निर्भर हैं। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से रोजमर्रा का खर्च बढ़ जाता है। इसके अलावा माल ढुलाई महंगी होने से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो आने वाले महीनों में खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में भी अधिक तेजी देखने को मिल सकती है। इसका असर अमेरिकी उपभोक्ता खर्च पर पड़ेगा, जो देश की आर्थिक वृद्धि का प्रमुख आधार माना जाता है।
ट्रंप ने कहा- मुझे महंगाई पसंद है
महंगाई के ताजा आंकड़ों पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान चर्चा का विषय बन गया। ट्रंप ने कहा, “अच्छे आंकड़े हैं। मुझे यह पसंद है। मुझे महंगाई पसंद है।”
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि होर्मुज की खाड़ी से तेल की आपूर्ति सामान्य हो जाती है तो ऊर्जा कीमतों में गिरावट आ सकती है और महंगाई पर दबाव कम हो सकता है। ट्रंप प्रशासन लंबे समय से घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की वकालत करता रहा है और उसका मानना है कि अमेरिका को वैश्विक ऊर्जा झटकों पर निर्भरता कम करनी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का बयान आर्थिक आंकड़ों से ज्यादा बाजार को भरोसा देने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि बढ़ती महंगाई आम नागरिकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
फेडरल रिजर्व के सामने नई चुनौती
महंगाई के लगातार बढ़ते आंकड़े फेडरल रिजर्व के लिए भी चुनौती बन सकते हैं। पिछले कुछ महीनों से बाजार को उम्मीद थी कि फेड ब्याज दरों में कटौती कर सकता है, लेकिन अब बढ़ती महंगाई के कारण यह संभावना कमजोर होती दिखाई दे रही है।
फेडरल रिजर्व का मुख्य उद्देश्य महंगाई को 2 फीसदी के आसपास रखना और रोजगार को मजबूत बनाए रखना है। यदि महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है तो केंद्रीय बैंक को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं या जरूरत पड़ने पर फिर से सख्ती करनी पड़ सकती है।
ऊंची ब्याज दरों का असर हाउसिंग लोन, ऑटो लोन, क्रेडिट कार्ड और कॉर्पोरेट निवेश पर पड़ता है। इससे आर्थिक गतिविधियों की गति भी प्रभावित हो सकती है।
ईरान संकट ने बढ़ाई वैश्विक चिंता
पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को झकझोर दिया है। हाल के दिनों में अमेरिका द्वारा ईरान के कई ठिकानों को निशाना बनाए जाने और उसके जवाब में ईरान की चेतावनियों ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
इन घटनाक्रमों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक ही दिन में करीब 2 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। निवेशकों को डर है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
150 डॉलर तक पहुंच सकता है कच्चा तेल
एनर्जी रिसर्च और इंटेलिजेंस फर्म Rystad Energy ने चेतावनी दी है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं होते तो कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ऐसा होने पर वैश्विक महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार खाड़ी क्षेत्र के छह देशों से प्रतिदिन लगभग 11.8 मिलियन बैरल तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। यह वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल आपूर्ति में इतनी बड़ी बाधा पिछले कई दशकों में शायद ही देखने को मिली हो।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है अहम?
दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों का निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर करता है।
यदि इस मार्ग में किसी तरह की बाधा आती है तो दुनिया भर में तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि निवेशक और सरकारें इस क्षेत्र की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
भारत पर भी पड़ सकता है असर
अमेरिका में बढ़ती महंगाई और तेल की कीमतों में तेजी का असर भारत सहित कई देशों पर पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों, आयात बिल और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा ऊंची ऊर्जा कीमतें घरेलू महंगाई को भी प्रभावित कर सकती हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और सरकारें पश्चिम एशिया की स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए हैं।
निष्कर्ष
अमेरिका में महंगाई का तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचना केवल एक घरेलू आर्थिक घटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत है। बढ़ती तेल कीमतें, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और फेडरल रिजर्व की संभावित नीति प्रतिक्रिया आने वाले महीनों में वित्तीय बाजारों की दिशा तय कर सकती है। यदि तेल संकट गहराता है तो अमेरिका ही नहीं, दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं को महंगाई और धीमी वृद्धि की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।


