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LPG Crude Strategic Reserve: तेल, गैस और एलपीजी पर सरकार ने उठाया बड़ा कदम, ईरान युद्ध के बीच क्या है इसका मतलब?

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/11 at 12:47 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच केंद्र सरकार ने देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कच्चे तेल (Crude Oil), लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) और प्राकृतिक गैस (LNG) के रणनीतिक भंडार का आकलन करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है। इस टास्क फोर्स का काम यह तय करना होगा कि भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए भारत को कितनी अतिरिक्त भंडारण क्षमता की जरूरत है और इसके लिए कौन सा वित्तीय मॉडल सबसे उपयुक्त रहेगा।

Contents
क्या करेगा नया टास्क फोर्स?भारत के पास अभी कितना रिजर्व है?ईरान और पश्चिम एशिया का संकट क्यों बढ़ा रहा चिंता?पहले भी दे चुकी है सरकार संकेतISPRL क्या है और इसकी क्या भूमिका है?भारत की खपत के मुकाबले कितना बड़ा है यह भंडार?चंडीखोल और पादुर परियोजनाओं की क्या स्थिति है?आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?आज के लाइव रेट्स

मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालात में सिर्फ आयात पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी कारण से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन प्रभावित होती है या तेल उत्पादक क्षेत्रों में संघर्ष बढ़ता है, तो भारत के पास पर्याप्त रणनीतिक भंडार होना बेहद जरूरी होगा। यही वजह है कि अब सरकार तेल, गैस और एलपीजी के दीर्घकालिक भंडारण ढांचे को मजबूत करने पर गंभीरता से काम कर रही है।

क्या करेगा नया टास्क फोर्स?

सरकार द्वारा गठित टास्क फोर्स देश की ऊर्जा जरूरतों का विस्तृत अध्ययन करेगी। यह मूल्यांकन किया जाएगा कि आने वाले वर्षों में भारत को कितनी अतिरिक्त रणनीतिक भंडारण क्षमता की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि इन भंडारों के निर्माण और संचालन के लिए कौन सा मॉडल अधिक व्यावहारिक होगा।

अधिकारियों के अनुसार, टास्क फोर्स पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP), लीजिंग मॉडल और अन्य वित्तीय विकल्पों की भी समीक्षा करेगी। अगले छह से आठ सप्ताह के भीतर इसकी रिपोर्ट आने की उम्मीद है। रिपोर्ट के आधार पर सरकार भविष्य की रणनीति तय कर सकती है।

सरकार का उद्देश्य सिर्फ अतिरिक्त भंडारण बनाना नहीं है, बल्कि ऐसा मॉडल तैयार करना है जिससे इन सुविधाओं का व्यावसायिक उपयोग भी किया जा सके और निवेशकों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

भारत के पास अभी कितना रिजर्व है?

पेट्रोलियम मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बावजूद भारत फिलहाल कच्चे तेल, एलपीजी और प्राकृतिक गैस का लगभग 60 दिन का स्टॉक बनाए हुए है। यह भंडार किसी भी आपातकालीन स्थिति में देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है।

खाना पकाने वाली गैस यानी एलपीजी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए मंत्रालय ने सरकारी तेल विपणन कंपनियों को कम से कम 30 दिन का एलपीजी रिजर्व रखने के निर्देश दिए हैं। कंपनियां इस दिशा में लगातार काम कर रही हैं।

हालांकि सरकार के सामने एक चुनौती यह भी है कि ऊर्जा कंपनियों पर कीमतों का दबाव बना हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, डीजल की बिक्री पर कंपनियों को प्रति लीटर लगभग 25 से 30 रुपये तक का नुकसान हो रहा है। वहीं एक घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर नुकसान करीब 690 रुपये तक पहुंच गया है।

ईरान और पश्चिम एशिया का संकट क्यों बढ़ा रहा चिंता?

भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में मध्य पूर्व या पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि सरकार लंबे समय से आयात स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रही है।

अधिकारियों का कहना है कि भारत फिलहाल करीब 40 देशों से तेल खरीद रहा है। रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से आयात बढ़ाने के प्रयास भी जारी हैं। इसके बावजूद यदि वैश्विक आपूर्ति बाधित होती है तो रणनीतिक भंडार ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच साबित होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर कोई संकट उत्पन्न होता है तो वैश्विक तेल कीमतों में अचानक उछाल आ सकता है। ऐसी स्थिति में रणनीतिक भंडार देश को कुछ समय तक राहत प्रदान कर सकते हैं।

पहले भी दे चुकी है सरकार संकेत

पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने 29 मई को कहा था कि सरकार तेल और गैस के रणनीतिक भंडार को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने यह भी बताया था कि तेल विपणन कंपनियों को एलपीजी का कम से कम 30 दिन का रिजर्व बनाए रखने को कहा गया है।

इससे पहले 12 मई को पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी संकेत दिया था कि सरकार रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने और अतिरिक्त स्टोरेज सुविधाओं के निर्माण पर विचार कर रही है। मौजूदा टास्क फोर्स को उसी दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

ISPRL क्या है और इसकी क्या भूमिका है?

भारत में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का प्रबंधन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (ISPRL) के माध्यम से किया जाता है। यह एक विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) है जिसे देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बनाया गया था।

ISPRL ने पहले चरण में तीन भूमिगत रणनीतिक भंडारण सुविधाएं विकसित की हैं। इनमें विशाखापत्तनम में 1.33 मिलियन टन, मंगलुरु में 1.5 मिलियन टन और पादुर में 2.5 मिलियन टन की क्षमता शामिल है। कुल मिलाकर इन सुविधाओं की क्षमता 5.33 मिलियन टन कच्चा तेल संग्रहित करने की है।

इन भूमिगत भंडारण सुविधाओं को इस तरह डिजाइन किया गया है कि किसी भी आपातकालीन परिस्थिति में देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सके।

भारत की खपत के मुकाबले कितना बड़ा है यह भंडार?

भारत प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत करता है। यदि 5.33 मिलियन टन रणनीतिक भंडार को बैरल में परिवर्तित किया जाए तो यह करीब 38 से 39 मिलियन बैरल के बराबर बैठता है।

इस हिसाब से मौजूदा रणनीतिक भंडार लगभग 8 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है। हालांकि 60 दिनों के कुल रिजर्व में तेल विपणन कंपनियों और रिफाइनरियों के पास मौजूद कच्चा तेल तथा रिफाइंड उत्पादों का स्टॉक भी शामिल होता है।

यही वजह है कि सरकार अब अतिरिक्त क्षमता निर्माण पर जोर दे रही है ताकि भविष्य में किसी बड़े संकट की स्थिति में देश को अधिक सुरक्षा मिल सके।

चंडीखोल और पादुर परियोजनाओं की क्या स्थिति है?

सरकार ने जुलाई 2021 में PPP मॉडल के तहत ओडिशा के चंडीखोल और कर्नाटक के पादुर में नई रणनीतिक भंडारण सुविधाओं को मंजूरी दी थी। इन दोनों परियोजनाओं की कुल क्षमता 6.5 मिलियन टन निर्धारित की गई थी।

चंडीखोल परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण का काम काफी हद तक पूरा हो चुका है और वित्तीय प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। हालांकि संसद की एक समिति की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में इन परियोजनाओं में अपेक्षित गति नहीं रही है और कई चरणों में देरी दर्ज की गई है।

आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?

सरकार द्वारा रणनीतिक तेल, गैस और एलपीजी भंडार बढ़ाने की योजना का सबसे बड़ा फायदा आम उपभोक्ताओं को हो सकता है। यदि वैश्विक बाजार में अचानक संकट आता है या तेल आपूर्ति बाधित होती है तो देश के पास पर्याप्त रिजर्व होने से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलेगी।

इसके अलावा सरकार को कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए भी अतिरिक्त समय मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होने से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा और उद्योगों को स्थिर आपूर्ति मिलती रहेगी।

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सरकार का यह कदम भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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