नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच कृषि उत्पादों का व्यापार लंबे समय से जारी है, लेकिन खाद्य सुरक्षा मानकों को लेकर समय-समय पर विवाद भी सामने आते रहे हैं। हाल ही में चीन ने भारतीय चावल की कुछ खेपों को यह कहते हुए वापस लौटा दिया कि उनमें जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म (GMO) के अंश पाए गए हैं। इस कदम से भारतीय निर्यातकों को आर्थिक नुकसान हुआ और चीन को होने वाले चावल निर्यात पर भी सवाल खड़े हो गए।
इसी पृष्ठभूमि में कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने चीन को चावल निर्यात करने वाले भारतीय निर्यातकों, राइस मिलों और प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए नए और सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय चावल चीन के खाद्य सुरक्षा मानकों पर पूरी तरह खरा उतरे और भविष्य में किसी भी खेप को वापस लौटाए जाने जैसी स्थिति पैदा न हो।
चीन ने क्यों लौटाई थीं भारतीय चावल की खेपें?
मार्च 2026 में चीन के सीमा शुल्क प्रशासन ने भारतीय चावल की कुछ खेपों को प्रवेश देने से इनकार कर दिया था। चीनी अधिकारियों का कहना था कि जांच के दौरान चावल में GMO से जुड़े अंश पाए गए हैं। चीन की नीति खाद्य सुरक्षा और जैव-सुरक्षा के मामलों में बेहद सख्त मानी जाती है और वहां बिना स्वीकृति वाले GMO उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध है।
हालांकि भारत में व्यावसायिक स्तर पर GMO चावल की खेती की अनुमति नहीं है, फिर भी चीन ने एहतियात के तौर पर संबंधित खेपों को रोक दिया। इस घटना के बाद भारतीय निर्यातकों ने केंद्र सरकार और APEDA से हस्तक्षेप की मांग की थी ताकि निर्यात प्रक्रिया को स्पष्ट और अधिक विश्वसनीय बनाया जा सके।
अब कौन भेज सकेगा चीन को चावल?
APEDA द्वारा जारी नई गाइडलाइंस के अनुसार अब चीन को चावल निर्यात करने का अधिकार केवल उन्हीं निर्यातकों और प्रोसेसिंग यूनिट्स को होगा जो चीन के कस्टम विभाग GACC (General Administration of Customs of China) में विधिवत पंजीकृत हों।
इसका मतलब है कि बिना GACC पंजीकरण के कोई भी कंपनी या राइस मिल चीन के लिए चावल की खेप तैयार नहीं कर सकेगी। इससे चीन को जाने वाले उत्पादों की ट्रेसबिलिटी और निगरानी बेहतर होगी।
GMO जांच कराना हुआ अनिवार्य
नई व्यवस्था के तहत निर्यात से पहले प्रत्येक खेप की GMO जांच कराना जरूरी होगा। यह जांच केवल APEDA द्वारा मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में ही कराई जा सकेगी।
GMO परीक्षण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्यात किए जा रहे चावल में ऐसे आनुवंशिक तत्व मौजूद न हों जिन्हें चीन के नियमों के तहत प्रतिबंधित माना जाता है। जांच रिपोर्ट निर्यात दस्तावेजों का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी और बिना रिपोर्ट के निर्यात प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकेगी।
RCAC लेना भी जरूरी
APEDA ने स्पष्ट किया है कि चीन को चावल भेजने वाले निर्यातकों को RCAC (Registration-cum-Allocation Certificate) प्राप्त करना होगा।
यह नियम केवल गैर-बासमती चावल पर ही नहीं बल्कि बासमती चावल के निर्यात पर भी लागू होगा। RCAC के जरिए निर्यातक की पहचान, उत्पाद की जानकारी और निर्यात प्रक्रिया की निगरानी की जा सकेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे निर्यात प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होगी और किसी भी विवाद की स्थिति में जवाबदेही तय करना आसान होगा।
HACCP प्रणाली लागू करनी होगी
चीन को चावल निर्यात करने वाली सभी प्रोसेसिंग यूनिट्स और राइस मिलों को HACCP (Hazard Analysis and Critical Control Point) प्रणाली अपनानी होगी।
यह एक अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली है जो उत्पादन प्रक्रिया के दौरान संभावित जोखिमों की पहचान करती है और उन्हें नियंत्रित करने के उपाय सुनिश्चित करती है।
HACCP लागू होने से:
- खाद्य सुरक्षा मानकों में सुधार होगा।
- निर्यातित उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर होगी।
- अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय चावल की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
- आयातक देशों की शिकायतों में कमी आएगी।
SOP का पालन नहीं किया तो नहीं होगा निर्यात
APEDA ने अपने दिशा-निर्देशों में स्पष्ट किया है कि केवल वही निर्यातक चीन को चावल भेज पाएंगे जो निर्धारित Standard Operating Procedure (SOP) का पालन करेंगे।
इस SOP में कच्चे माल की खरीद, भंडारण, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, लैब परीक्षण, दस्तावेजीकरण और ट्रेसबिलिटी से जुड़े कई प्रावधान शामिल हैं। किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर निर्यात अनुमति रद्द की जा सकती है।
चीन भारतीय चावल के लिए कितना महत्वपूर्ण बाजार है?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। भारतीय बासमती और गैर-बासमती चावल की मांग एशिया, अफ्रीका, यूरोप और मध्य पूर्व के कई देशों में है। चीन भी वैश्विक चावल व्यापार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी है।
हालांकि चीन भारत से सीमित मात्रा में चावल आयात करता है, लेकिन वहां का बाजार रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि चीन जैसे बड़े देश में भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं तो उसका असर अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है।
यही कारण है कि सरकार और APEDA इस मामले को केवल एक व्यापारिक विवाद नहीं बल्कि भारत की कृषि निर्यात साख से जुड़ा मुद्दा मान रहे हैं।
GMO को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
GMO यानी Genetically Modified Organism ऐसे जीव या पौधे होते हैं जिनके आनुवंशिक गुणों में वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से बदलाव किया जाता है।
समर्थकों का मानना है कि GMO तकनीक से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और फसलों को रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी बनाया जा सकता है। वहीं कई देशों में इसके संभावित स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सख्त नियम लागू हैं।
चीन खाद्य आयात के मामलों में विशेष सावधानी बरतता है और किसी भी संदिग्ध GMO तत्व वाले उत्पाद को अनुमति देने से पहले विस्तृत जांच करता है। इसी वजह से भारतीय चावल की खेपों को लेकर विवाद खड़ा हुआ था।
भारतीय निर्यातकों पर क्या होगा असर?
नई गाइडलाइंस से शुरुआती दौर में निर्यातकों की अनुपालन लागत बढ़ सकती है क्योंकि उन्हें अतिरिक्त लैब परीक्षण, दस्तावेजीकरण और खाद्य सुरक्षा प्रणालियों पर खर्च करना होगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय में इससे भारतीय चावल निर्यात को फायदा होगा।
बेहतर गुणवत्ता नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने से भारतीय चावल की स्वीकार्यता बढ़ेगी और भविष्य में खेपों के रिजेक्ट होने की संभावना कम होगी। इससे निर्यातकों को आर्थिक नुकसान से बचाने में भी मदद मिलेगी।
निष्कर्ष
चीन द्वारा भारतीय चावल की खेपों को GMO का हवाला देकर लौटाए जाने के बाद APEDA ने निर्यात प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सख्त बनाने का फैसला किया है। अब GACC पंजीकरण, GMO परीक्षण, RCAC प्रमाणपत्र और HACCP प्रणाली का पालन अनिवार्य होगा। सरकार का लक्ष्य केवल चीन के बाजार तक पहुंच बनाए रखना नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारतीय कृषि उत्पादों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को और मजबूत करना है। इससे भविष्य में भारतीय चावल निर्यात को स्थिरता मिलने की उम्मीद है।


