सरकार ने क्यों घटाई सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडरों की संख्या?
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के तहत मिलने वाले सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडरों की संख्या को 9 से घटाकर 4 किए जाने के फैसले पर उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री Hardeep Singh Puri ने कहा कि सरकार को ऐसे कई मामलों की जानकारी मिली थी, जिनमें योजना का लाभ वास्तविक घरेलू जरूरतों के बजाय अन्य उद्देश्यों के लिए लिया जा रहा था।
मंत्री के अनुसार सरकार ने योजना के उपयोग के पैटर्न का विस्तृत अध्ययन किया। इस अध्ययन में पाया गया कि बड़ी संख्या में लाभार्थी साल में नौ सिलेंडर तक इस्तेमाल ही नहीं कर रहे थे। वहीं कुछ मामलों में सब्सिडी वाले सिलेंडरों का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों में होने की आशंका भी सामने आई। इसी आधार पर सब्सिडी वाले रिफिल की संख्या को सीमित करने का निर्णय लिया गया।
क्या कहा हरदीप सिंह पुरी ने?
आईएएनएस को दिए एक बयान में मंत्री ने कहा कि यदि किसी परिवार को सालभर में चार से अधिक सिलेंडर की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, तो अतिरिक्त सब्सिडी देने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार के पास ऐसे संकेत थे कि कुछ लाभार्थी सब्सिडी वाले सिलेंडरों का दुरुपयोग कर रहे थे।
पुरी के मुताबिक कुछ लोग सिलेंडर लेकर उन्हें व्यावसायिक उपयोग में लगा रहे थे या अन्य लोगों को अधिक कीमत पर उपलब्ध करा रहे थे। ऐसे मामलों से सरकार का सब्सिडी खर्च बढ़ रहा था और योजना का वास्तविक उद्देश्य प्रभावित हो रहा था।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना क्या है?
Pradhan Mantri Ujjwala Yojana की शुरुआत वर्ष 2016 में की गई थी। इस योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था ताकि उन्हें लकड़ी, कोयला और गोबर के उपलों जैसे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भर न रहना पड़े।
योजना के तहत पात्र परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराया गया। इसके साथ ही गैस रिफिल पर सब्सिडी भी दी गई ताकि परिवार नियमित रूप से एलपीजी का उपयोग कर सकें।
शुरुआत में लाभार्थियों को साल में 12 सब्सिडी वाले सिलेंडर उपलब्ध कराए जाते थे। बाद में इसे घटाकर 9 किया गया और अब यह संख्या घटकर 4 रह गई है।
सरकार को क्या फायदा होगा?
सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या कम होने से सरकार के राजकोषीय बोझ में कमी आएगी। एलपीजी सब्सिडी पर केंद्र सरकार हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च करती है। यदि सब्सिडी का लाभ केवल वास्तविक जरूरतमंदों तक सीमित रहता है तो सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सब्सिडी लीकेज को कम करने में मदद मिलेगी। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), आधार लिंकिंग और डिजिटल निगरानी जैसे उपायों के जरिए भी सब्सिडी प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने का प्रयास किया है।
क्या लाभार्थियों पर पड़ेगा असर?
इस फैसले का प्रभाव सभी लाभार्थियों पर समान नहीं होगा। जिन परिवारों की गैस खपत कम है, उन्हें संभवतः कोई विशेष दिक्कत नहीं होगी क्योंकि वे पहले भी साल में चार या उससे कम सिलेंडर का उपयोग करते थे।
हालांकि बड़े परिवारों या ऐसे घरों में जहां एलपीजी ही खाना पकाने का प्रमुख साधन है, वहां अतिरिक्त सिलेंडर बाजार मूल्य पर खरीदने पड़ सकते हैं। इससे घरेलू खर्च बढ़ने की संभावना है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति अलग-अलग हो सकती है। कई परिवार एलपीजी और पारंपरिक ईंधन दोनों का मिश्रित उपयोग करते हैं, जबकि कुछ परिवार पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर हो चुके हैं। ऐसे परिवारों पर इस फैसले का अधिक प्रभाव पड़ सकता है।
योजना की सफलता पर क्या असर पड़ेगा?
उज्ज्वला योजना को भारत की सबसे बड़ी सामाजिक कल्याण योजनाओं में गिना जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार करोड़ों महिलाओं को इस योजना से लाभ मिला है और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ईंधन की पहुंच बढ़ी है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि योजना की सफलता केवल एलपीजी कनेक्शन देने से नहीं, बल्कि नियमित उपयोग सुनिश्चित करने से तय होगी। यदि रिफिल महंगे हो जाते हैं या सब्सिडी कम हो जाती है, तो कुछ परिवार दोबारा पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट सकते हैं।
इसी कारण आने वाले समय में सरकार को यह संतुलन बनाना होगा कि सब्सिडी का दुरुपयोग भी न हो और वास्तविक जरूरतमंद परिवारों को पर्याप्त सहायता भी मिलती रहे।
आगे क्या?
फिलहाल सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या घटाने का फैसला डेटा और उपयोग पैटर्न के विश्लेषण के आधार पर लिया गया है। सरकार का दावा है कि इससे योजना के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और सब्सिडी का लाभ सही लोगों तक पहुंचेगा।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि इस बदलाव का उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के व्यवहार, एलपीजी खपत और सरकारी सब्सिडी खर्च पर क्या प्रभाव पड़ता है। ऐसे आंकड़े आने वाले महीनों में इस फैसले की वास्तविक सफलता या चुनौतियों को स्पष्ट करेंगे।


