नई दिल्ली। दुनिया भर में निवेशकों को लंबे समय तक सुरक्षित निवेश का सबसे भरोसेमंद विकल्प माना जाने वाला सोना इस समय दबाव में दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ महीनों तक रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद अब सोने की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है। इसका असर केवल फिजिकल गोल्ड मार्केट तक सीमित नहीं है, बल्कि गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (Gold ETF) में भी दिखाई देने लगा है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 5 जून को समाप्त सप्ताह के दौरान गोल्ड ETF में इस वर्ष की सबसे बड़ी निकासी दर्ज की गई। लगातार चौथे सप्ताह निवेशकों ने गोल्ड ETF से पैसा निकाला, जिससे बाजार में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या निवेशकों का भरोसा सोने से कम हो रहा है या फिर यह केवल मुनाफावसूली का दौर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल सोने की कीमतों में गिरावट का परिणाम नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, अमेरिकी ब्याज दरों और डॉलर की मजबूती से भी जुड़ा हुआ है।
गोल्ड ETF से क्यों निकला इतना पैसा?
WGC की रिपोर्ट के अनुसार 5 जून को समाप्त सप्ताह में गोल्ड ETF में कुल नेट निवेश 17 प्रतिशत घटकर 15.28 अरब डॉलर रह गया। इससे पहले 23 मई को समाप्त सप्ताह में यह आंकड़ा 18.46 अरब डॉलर था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पिछले सप्ताह जहां कुल 1.05 अरब डॉलर का नया निवेश आया, वहीं 2.71 अरब डॉलर यानी लगभग 25,845 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज की गई। इस वजह से कुल मिलाकर गोल्ड ETF में शुद्ध प्रवाह नकारात्मक रहा।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार जब किसी एसेट की कीमतें लंबे समय तक तेजी से बढ़ती हैं तो निवेशक मुनाफा बुक करने लगते हैं। सोने के साथ भी फिलहाल यही स्थिति दिखाई दे रही है। जनवरी के अंत में रिकॉर्ड स्तर छूने के बाद सोना लगातार दबाव में है और कई निवेशकों ने मुनाफा सुरक्षित करने का फैसला किया है।
अमेरिका की ब्याज दरों ने बढ़ाई चिंता
सोने की कीमतों पर सबसे बड़ा प्रभाव अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति का पड़ता है। हाल के दिनों में अमेरिका से आए मजबूत रोजगार आंकड़ों ने संकेत दिया है कि ब्याज दरों में जल्द कटौती की संभावना कमजोर पड़ सकती है।
जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं तो निवेशकों को बॉन्ड और अन्य निश्चित आय वाले निवेश विकल्पों में बेहतर रिटर्न मिलने लगता है। ऐसे में सोने जैसे गैर-ब्याज देने वाले निवेश की आकर्षण शक्ति कम हो जाती है।
इसी कारण डॉलर इंडेक्स में मजबूती आई और सोने पर दबाव बढ़ा। डॉलर मजबूत होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना अपेक्षाकृत महंगा हो जाता है, जिससे मांग प्रभावित होती है।
किन देशों के निवेशकों ने सबसे ज्यादा बिकवाली की?
रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा निकासी उत्तर अमेरिका से हुई। अमेरिकी निवेशकों ने अकेले 1.27 अरब डॉलर के गोल्ड ETF यूनिट्स बेचे। कनाडा से 102 मिलियन डॉलर की निकासी दर्ज की गई।
एशिया में भी बिकवाली देखने को मिली। चीन के निवेशकों ने 513 मिलियन डॉलर निकाले। कुल मिलाकर उत्तर अमेरिका से 1.36 अरब डॉलर और एशिया से लगभग 530 मिलियन डॉलर की निकासी दर्ज हुई।
हालांकि यह तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। कुछ देशों में निवेशकों ने अभी भी सोने पर भरोसा बनाए रखा है। जापान, हॉन्गकॉन्ग और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में वर्ष की शुरुआत से अब तक सकारात्मक निवेश प्रवाह दर्ज किया गया है।
भारत के निवेशकों का क्या रुख है?
साप्ताहिक आधार पर भारत के विस्तृत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन WGC के अनुसार मई महीने में भारतीय निवेशकों ने करीब 61 मिलियन डॉलर गोल्ड ETF से निकाले।
हालांकि भारतीय निवेशकों की दीर्घकालिक सोच अभी भी सोने के पक्ष में दिखाई देती है। भारत में गोल्ड ETF के अलावा फिजिकल गोल्ड, डिजिटल गोल्ड और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसे विकल्पों में भी निवेश किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय निवेशक आमतौर पर गिरावट को खरीदारी के अवसर के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि अल्पकालिक बिकवाली के बावजूद भारत में सोने की मांग पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है।
क्या सचमुच खत्म हो रही है सोने की चमक?
यह सबसे बड़ा सवाल है जो निवेशकों के मन में है। लेकिन उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
गोल्ड ETF में निकासी जरूर बढ़ी है, लेकिन कुल वैश्विक होल्डिंग्स अभी भी 4,106.3 टन बनी हुई हैं। एक साल पहले यह आंकड़ा 3,559.2 टन था। यानी कुल होल्डिंग्स में अभी भी उल्लेखनीय वृद्धि बनी हुई है।
इसका अर्थ यह है कि अल्पकालिक स्तर पर निवेशकों ने मुनाफावसूली की है, लेकिन दीर्घकालिक निवेशक अभी भी सोने को पोर्टफोलियो का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहे हैं।
इतिहास बताता है कि आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और मुद्रास्फीति बढ़ने पर निवेशक फिर से सोने की ओर लौटते हैं। इसलिए मौजूदा निकासी को स्थायी ट्रेंड मानना उचित नहीं होगा।
आगे सोने की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा?
आने वाले महीनों में सोने की दिशा मुख्य रूप से तीन कारकों पर निर्भर करेगी। पहला अमेरिकी फेडरल रिजर्व का ब्याज दरों को लेकर रुख, दूसरा डॉलर की मजबूती और तीसरा वैश्विक आर्थिक वृद्धि का परिदृश्य।
यदि फेड आने वाले महीनों में ब्याज दरों में कटौती का संकेत देता है तो सोने में फिर से तेजी लौट सकती है। वहीं अगर डॉलर और बॉन्ड यील्ड मजबूत बने रहते हैं तो कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है।
कमोडिटी विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा गिरावट के बावजूद सोना अभी भी लंबी अवधि के निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण एसेट बना हुआ है क्योंकि यह पोर्टफोलियो को अस्थिरता से बचाने में मदद करता है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार केवल अल्पकालिक गिरावट देखकर घबराने की जरूरत नहीं है। जिन निवेशकों का लक्ष्य लंबी अवधि का है, उनके लिए गोल्ड ETF अभी भी विविधीकृत पोर्टफोलियो का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
हालांकि किसी भी निवेश निर्णय से पहले निवेशकों को अपनी जोखिम क्षमता, निवेश अवधि और वित्तीय लक्ष्यों का मूल्यांकन जरूर करना चाहिए। सोने में निवेश को हमेशा कुल पोर्टफोलियो के एक हिस्से तक सीमित रखना बेहतर माना जाता है।
फिलहाल गोल्ड ETF से निकासी जरूर बढ़ी है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि निवेशकों का सोने पर भरोसा पूरी तरह खत्म हो गया है। बल्कि यह तेजी के लंबे दौर के बाद मुनाफावसूली और बदलती वैश्विक परिस्थितियों का असर अधिक दिखाई देता है।


