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चीन को लगा तगड़ा झटका, फैक्ट्रियों में थमा काम; अब ड्रैगन के सस्ते सामानों पर बैन लगाने की तैयारी में 5 बड़े देश

Namam Sharma
Last updated: 2026/05/31 at 7:22 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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नई दिल्ली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को एक बार फिर आर्थिक मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है। चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (NBS) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक मई 2026 में देश की मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां और धीमी पड़ गई हैं। निर्यात ऑर्डरों में गिरावट, बढ़ती उत्पादन लागत और वैश्विक अनिश्चितताओं ने चीन के उद्योग जगत पर दबाव बढ़ा दिया है।

Contents
Highlightsमई में क्यों कमजोर पड़ा चीन का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर?वैश्विक तनाव भी बना बड़ी वजहचीन की सबसे बड़ी समस्या क्या है?यूरोप के 5 बड़े देश क्यों हुए चीन के खिलाफ?किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है?इलेक्ट्रिक वाहन (EV)सोलर पैनलस्टील और फेरोएलॉयबैटरी उद्योगइलेक्ट्रॉनिक्सचीन की अर्थव्यवस्था के लिए क्यों बढ़ रही चिंता?भारत को मिल सकता है बड़ा मौकाआगे क्या होगा?

Highlights

  • मई में चीन का मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 50 पर पहुंचा।
  • नए निर्यात ऑर्डर 50.3 से गिरकर 48.6 पर आ गए।
  • यूरोप के 5 बड़े देश चीनी सस्ते उत्पादों पर सख्ती की मांग कर रहे हैं।
  • चीन की ‘ओवरकैपेसिटी’ वैश्विक व्यापार में बड़ा विवाद बनती जा रही है।
  • भारत समेत कई देशों के लिए नए निर्यात अवसर पैदा हो सकते हैं।

चीन लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर खिलौनों, स्टील, सोलर पैनल, बैटरियों और मशीनरी तक दुनिया के बड़े हिस्से की आपूर्ति चीन से होती है। लेकिन अब स्थिति बदलती दिखाई दे रही है। एक तरफ घरेलू मांग कमजोर बनी हुई है तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजार चीन के सस्ते उत्पादों के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाते जा रहे हैं। ताजा आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब यूरोपीय संघ के पांच प्रमुख सदस्य देश चीन जैसे देशों से आने वाले सस्ते उत्पादों पर प्रतिबंध और अतिरिक्त शुल्क लगाने की मांग कर रहे हैं। इससे चीन की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ सकता है।

मई में क्यों कमजोर पड़ा चीन का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर?

राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार चीन का आधिकारिक मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) अप्रैल के 50.3 से घटकर मई में 50 पर आ गया। यह पिछले तीन महीनों का सबसे निचला स्तर है। PMI को किसी भी देश की औद्योगिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। आमतौर पर 50 से ऊपर का स्तर विस्तार और 50 से नीचे का स्तर संकुचन को दर्शाता है। मई में PMI का 50 पर आना यह संकेत देता है कि चीन की औद्योगिक वृद्धि लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंच गई है। हालांकि उत्पादन उप-सूचकांक 51.2 पर बना रहा, लेकिन नए ऑर्डर का सूचकांक 49.9 पर पहुंच गया। इसका मतलब है कि फैक्ट्रियां उत्पादन तो कर रही हैं, लेकिन बाजार में मांग उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही जितनी उद्योग को उम्मीद थी। विशेष चिंता की बात नए निर्यात ऑर्डरों में आई गिरावट है। मई में यह सूचकांक 50.3 से गिरकर 48.6 पर पहुंच गया। इससे संकेत मिलता है कि चीन के उत्पादों की वैश्विक मांग कमजोर पड़ रही है।

वैश्विक तनाव भी बना बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, वैश्विक सप्लाई चेन की अनिश्चितता और विभिन्न देशों की संरक्षणवादी नीतियों ने चीन के निर्यात क्षेत्र को प्रभावित किया है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और यूरोप ने चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब “China Plus One Strategy” के तहत भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया और मेक्सिको जैसे देशों में निवेश बढ़ा रही हैं। इसका सीधा असर चीन के निर्यात ऑर्डरों पर दिखाई देने लगा है। कई विदेशी कंपनियां उत्पादन और सप्लाई चेन का हिस्सा अन्य देशों में स्थानांतरित कर रही हैं, जिससे चीन के औद्योगिक उत्पादन को चुनौती मिल रही है।

चीन की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

विश्लेषकों के अनुसार चीन की सबसे बड़ी समस्या ‘औद्योगिक अति-क्षमता’ यानी Overcapacity है। इसका मतलब है कि चीन की फैक्ट्रियां घरेलू और वैश्विक मांग से कहीं अधिक उत्पादन कर रही हैं। जब उत्पादों की आपूर्ति जरूरत से ज्यादा हो जाती है तो कंपनियां उन्हें कम कीमतों पर बेचने लगती हैं। यही कारण है कि चीन से दुनिया भर में बेहद सस्ते उत्पादों की बाढ़ आ रही है। इससे कई देशों के स्थानीय उद्योगों पर दबाव बढ़ गया है। यूरोप और अमेरिका का आरोप है कि चीन की कई कंपनियों को सरकारी सहायता और सब्सिडी मिलती है, जिसके कारण वे वैश्विक बाजार में बेहद कम कीमतों पर सामान बेच पाती हैं। इससे अन्य देशों की कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है।

यूरोप के 5 बड़े देश क्यों हुए चीन के खिलाफ?

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट और फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्टों के अनुसार स्पेन, इटली, फ्रांस, नीदरलैंड और लिथुआनिया ने यूरोपीय संघ से चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं की औद्योगिक अति-क्षमता के खिलाफ अधिक आक्रामक कदम उठाने की मांग की है। इन देशों का कहना है कि सस्ते आयात के कारण स्थानीय उद्योगों, निवेश और रोजगार पर असर पड़ रहा है। इसलिए यूरोपीय संघ को मौजूदा एंटी-डंपिंग जांचों से आगे बढ़कर व्यापक सुरक्षा उपाय लागू करने चाहिए। इन उपायों में अतिरिक्त टैरिफ, आयात कोटा और विशेष व्यापार प्रतिबंध शामिल हो सकते हैं। यूरोपीय आयोग भी चीन नीति की समीक्षा कर रहा है और आने वाले महीनों में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए जा सकते हैं।

किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है?

यदि यूरोप चीन के खिलाफ सख्त कदम उठाता है तो सबसे अधिक असर कुछ प्रमुख क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

इलेक्ट्रिक वाहन (EV)

चीन दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता है। यूरोप पहले ही चीनी इलेक्ट्रिक कार कंपनियों की जांच कर रहा है।

सोलर पैनल

दुनिया के अधिकांश सोलर पैनल चीन में बनते हैं। यूरोपीय कंपनियों का कहना है कि सस्ते चीनी उत्पादों के कारण उनका कारोबार प्रभावित हो रहा है।

स्टील और फेरोएलॉय

यूरोप पहले भी चीन से आने वाले स्टील उत्पादों पर प्रतिबंधात्मक कदम उठा चुका है। नई सख्ती इस क्षेत्र को और प्रभावित कर सकती है।

बैटरी उद्योग

EV बैटरियों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में चीन की बड़ी हिस्सेदारी है। यूरोप इस क्षेत्र में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना चाहता है।

इलेक्ट्रॉनिक्स

मोबाइल, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सप्लाई चेन पर भी असर पड़ सकता है।

चीन की अर्थव्यवस्था के लिए क्यों बढ़ रही चिंता?

चीन पहले से ही कई आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। रियल एस्टेट सेक्टर में लंबे समय से संकट बना हुआ है। कई बड़ी डेवलपर कंपनियां वित्तीय दबाव में हैं। घरेलू उपभोक्ता खर्च उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रहा है। युवाओं में बेरोजगारी भी चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे समय में यदि निर्यात क्षेत्र भी कमजोर पड़ता है तो आर्थिक वृद्धि पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है। चीन के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले दो दशकों में उसकी आर्थिक सफलता का बड़ा आधार निर्यात और विनिर्माण रहा है।

भारत को मिल सकता है बड़ा मौका

चीन की चुनौतियां भारत के लिए अवसर भी बन सकती हैं। यदि यूरोप और अमेरिका चीन पर अपनी निर्भरता कम करते हैं तो वैकल्पिक सप्लाई चेन की मांग बढ़ेगी। भारत पहले से ही वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में काम कर रहा है। मोबाइल फोन, ऑटो कंपोनेंट्स, टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में भारतीय कंपनियां लाभ उठा सकती हैं। सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना भी विदेशी निवेश आकर्षित करने में मदद कर रही है। कई वैश्विक कंपनियां भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और श्रम उत्पादकता में सुधार जारी रखता है तो आने वाले वर्षों में उसे चीन से स्थानांतरित हो रहे निवेश का बड़ा हिस्सा मिल सकता है।

आगे क्या होगा?

आने वाले महीनों में चीन की आर्थिक स्थिति पर दुनिया की नजर रहेगी। यदि निर्यात ऑर्डरों में गिरावट जारी रहती है और यूरोप सख्त व्यापारिक कदम उठाता है तो चीन के विनिर्माण क्षेत्र पर दबाव और बढ़ सकता है। दूसरी ओर, चीन सरकार घरेलू मांग बढ़ाने, निवेश को प्रोत्साहित करने और उद्योगों को समर्थन देने के लिए नए प्रोत्साहन पैकेज ला सकती है। फिलहाल इतना साफ है कि दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र एक नए दौर की चुनौतियों का सामना कर रहा है और वैश्विक व्यापार का संतुलन धीरे-धीरे बदलता नजर आ रहा है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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