नई दिल्ली। वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेल और गैस के बाद जिस संसाधन को लेकर सबसे ज्यादा रणनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है, वह है क्रिटिकल मिनरल्स यानी महत्वपूर्ण खनिज। इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), स्मार्टफोन, सेमीकंडक्टर, सोलर पैनल, बैटरियों और आधुनिक रक्षा प्रणालियों के निर्माण में इन खनिजों की भूमिका इतनी अहम हो चुकी है कि कई विशेषज्ञ इन्हें 21वीं सदी का नया “स्ट्रैटेजिक ऑयल” भी कह रहे हैं।
Highlights
- दुनिया के कई महत्वपूर्ण खनिजों की रिफाइनिंग क्षमता पर चीन का 70% से अधिक नियंत्रण।
- भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया समेत 30 से अधिक देश वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाने में जुटे।
- इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्टफोन, सेमीकंडक्टर और रक्षा उपकरणों के लिए जरूरी हैं क्रिटिकल मिनरल्स।
- भारत के पास रेयर अर्थ तत्वों का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भंडार मौजूद।
- QUAD देशों ने सुरक्षित सप्लाई चेन विकसित करने के लिए अरबों डॉलर निवेश की योजना बनाई।
यही वजह है कि भारत अब अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, चिली और अन्य सहयोगी देशों के साथ मिलकर ऐसी वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने में जुटा है, जो दुनिया को चीन पर अत्यधिक निर्भरता से बाहर निकाल सके। यह पहल सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता से भी जुड़ी हुई है।
क्यों चिंता का विषय बना हुआ है चीन का दबदबा?
पिछले दो दशकों में चीन ने खनन से ज्यादा रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करने पर ध्यान दिया। नतीजा यह हुआ कि दुनिया के कई महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग क्षमता का अधिकांश हिस्सा चीन के नियंत्रण में पहुंच गया। अफ्रीका सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 20 सबसे महत्वपूर्ण खनिजों में से 19 की रिफाइनिंग क्षमता का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन के पास है। कुछ रेयर अर्थ तत्वों के मामले में यह हिस्सेदारी 90 से 100 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भू-राजनीतिक तनाव या व्यापारिक विवाद के दौरान चीन निर्यात प्रतिबंध लगा देता है तो इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल फोन, चिप निर्माण और रक्षा उत्पादन जैसी पूरी वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
आखिर क्या होते हैं क्रिटिकल मिनरल्स?
क्रिटिकल मिनरल्स वे खनिज होते हैं जो किसी देश की आर्थिक प्रगति, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं। यदि इनकी आपूर्ति बाधित होती है तो उद्योगों और रणनीतिक क्षेत्रों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। भारत के खान मंत्रालय के अनुसार ऐसे खनिज जिनकी उपलब्धता सीमित हो, जिनका उत्पादन कुछ चुनिंदा देशों में केंद्रित हो और जिनकी आपूर्ति बाधित होने पर राष्ट्रीय हित प्रभावित हों, उन्हें क्रिटिकल मिनरल्स कहा जाता है। इनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, गैलियम, जर्मेनियम, टंगस्टन, टाइटेनियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स प्रमुख हैं।
रेयर अर्थ तत्व इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?
रेयर अर्थ तत्व 17 धात्विक तत्वों का समूह है, जिनका उपयोग अत्याधुनिक तकनीकों में होता है। इलेक्ट्रिक वाहनों के मोटर, विंड टर्बाइन, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, फाइटर जेट, रडार, मेडिकल उपकरण और स्मार्टफोन इनके बिना नहीं बनाए जा सकते। उदाहरण के तौर पर नियोडिमियम और प्रासियोडिमियम का उपयोग शक्तिशाली मैग्नेट बनाने में होता है जबकि डिस्प्रोसियम और टेरबियम उच्च तापमान में कार्य करने वाले उपकरणों के लिए जरूरी माने जाते हैं। यही कारण है कि रेयर अर्थ तत्वों की आपूर्ति को लेकर दुनिया भर में प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।
भारत के पास कितना भंडार है?
वैश्विक आंकड़ों के अनुसार चीन के पास लगभग 44 मिलियन मीट्रिक टन रेयर अर्थ भंडार है जबकि ब्राजील दूसरे स्थान पर है। भारत तीसरे स्थान पर माना जाता है और उसके पास लगभग 6.9 मिलियन मीट्रिक टन रेयर अर्थ संसाधन मौजूद हैं। हालांकि भंडार के मामले में भारत मजबूत स्थिति में है लेकिन उत्पादन के क्षेत्र में अभी काफी पीछे है। चीन सालाना लगभग 2.7 लाख मीट्रिक टन रेयर अर्थ उत्पादन करता है जबकि भारत का उत्पादन कुछ हजार मीट्रिक टन के आसपास ही है। यानी भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती खनिज संसाधनों की कमी नहीं बल्कि खनन, प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन क्षमता विकसित करने की है।
30 से ज्यादा देशों का गठबंधन क्या हासिल करना चाहता है?
भारत और उसके सहयोगी देशों का उद्देश्य चीन को पूरी तरह प्रतिस्थापित करना नहीं बल्कि वैश्विक आपूर्ति को अधिक सुरक्षित और विविध बनाना है। इस पहल के तहत: नए खनन प्रोजेक्ट विकसित किए जाएंगे। रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाई जाएगी। रणनीतिक भंडारण बनाया जाएगा। तकनीकी सहयोग और निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा। सप्लाई चेन जोखिम कम किए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना सफल होती है तो आने वाले वर्षों में दुनिया के कई उद्योगों को चीन पर निर्भर रहने की मजबूरी नहीं रहेगी।
QUAD देशों ने क्या रणनीति बनाई?
हाल ही में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के समूह QUAD ने महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर नई पहल पर चर्चा की। इन देशों ने सुरक्षित और भरोसेमंद सप्लाई चेन विकसित करने के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र से लगभग 20 अरब डॉलर तक की वित्तीय सहायता जुटाने का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिज सहयोग को बढ़ाने के लिए कई समझौतों पर भी सहमति बनी है। विश्लेषकों के अनुसार QUAD की यह रणनीति आने वाले दशक में वैश्विक खनिज बाजार की दिशा बदल सकती है।
भारत की रेयर अर्थ कॉरिडोर योजना
केंद्र सरकार ने बजट 2026-27 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में रेयर अर्थ कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा की है। इस परियोजना का उद्देश्य खनन, प्रोसेसिंग, अनुसंधान और निर्माण को एकीकृत करना है ताकि भारत सिर्फ कच्चा माल निकालने वाला देश न रहकर तैयार उत्पादों का भी बड़ा निर्माता बन सके। इसके लिए सरकार पहले ही हजारों करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दे चुकी है, जिसके तहत रेयर अर्थ ऑक्साइड से लेकर तैयार मैग्नेट तक की पूरी वैल्यू चेन विकसित की जाएगी।
क्या सचमुच टूट सकता है चीन का तिलिस्म?
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का दबदबा रातोंरात खत्म नहीं होगा। उसने पिछले कई दशकों में विशाल प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी विशेषज्ञता और वैश्विक नेटवर्क विकसित किया है। फिर भी भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य सहयोगी देशों द्वारा संयुक्त प्रयास किए जाने से वैश्विक बाजार में विकल्प जरूर तैयार होंगे। इससे सप्लाई चेन अधिक सुरक्षित बनेगी और किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम होगी। अगर भारत अपने विशाल खनिज भंडार का प्रभावी उपयोग करने, प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने और विदेशी निवेश आकर्षित करने में सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में वह वैश्विक क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
निष्कर्ष
क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर शुरू हुई यह वैश्विक प्रतिस्पर्धा सिर्फ खनन उद्योग तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध भविष्य की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग, रक्षा उत्पादन और तकनीकी नेतृत्व से है। भारत के पास संसाधन भी हैं और रणनीतिक साझेदार भी। अब चुनौती इन संसाधनों को उद्योग, तकनीक और निवेश के जरिए वास्तविक ताकत में बदलने की है। यदि 30 से अधिक देशों का यह गठबंधन सफल होता है तो वैश्विक सप्लाई चेन में चीन का एकाधिकार कमजोर पड़ सकता है और भारत इस बदलाव का बड़ा लाभार्थी बनकर उभर सकता है।
(Source- PIB)
Also Read:


