नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब केवल कच्चे तेल और ईंधन तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसका प्रभाव भारत के कृषि क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले केंद्र सरकार ने खाद की उपलब्धता बनाए रखने के लिए बड़ा कदम उठाते हुए वैश्विक बाजार से 17 लाख टन यूरिया खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकार को आशंका है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़े तो आने वाले महीनों में उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
Highlights
- खरीफ सीजन से पहले भारत ने 17 लाख टन यूरिया आयात प्रक्रिया शुरू की
- पश्चिम एशिया तनाव से LNG सप्लाई और यूरिया उत्पादन प्रभावित
- देश में फिलहाल करीब 2 करोड़ टन उर्वरक का स्टॉक मौजूद
- एक्सपर्ट्स ने उर्वरक कीमतों में और तेजी की आशंका जताई
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है और खरीफ सीजन के दौरान देश में यूरिया की मांग तेजी से बढ़ जाती है। ऐसे में सरकार पहले से तैयारी कर रही है ताकि किसानों को पिछले साल जैसी परेशानी का सामना न करना पड़े।
क्यों बढ़ी खाद संकट की चिंता?
पश्चिम एशिया में जारी तनाव का सबसे बड़ा असर प्राकृतिक गैस की सप्लाई पर पड़ा है। यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस बेहद जरूरी कच्चा माल होती है क्योंकि इसी से अमोनिया तैयार किया जाता है। अमोनिया के बिना यूरिया बनाना संभव नहीं है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित LNG यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस से पूरा करता है। यह गैस मुख्य रूप से कतर, UAE और अन्य मिडिल ईस्ट देशों से आती है। लेकिन ईरान की ओर से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद करने की धमकी और समुद्री तनाव बढ़ने के कारण LNG सप्लाई प्रभावित होने लगी है। जानकारों के मुताबिक एशिया के कुछ उर्वरक संयंत्रों ने गैस की कमी के चलते उत्पादन कम कर दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में तेजी देखी जा रही है।
17 लाख टन यूरिया कब तक पहुंचेगा?
सरकारी कंपनी नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) ने हाल ही में टेंडर जारी कर 17 लाख टन यूरिया खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। कंपनी की ओर से जारी नोटिस के मुताबिक करीब 9 लाख टन यूरिया पश्चिमी तट के जरिए आएगा, बाकी खेप पूर्वी तट के बंदरगाहों पर पहुंचेगी, 20 जुलाई तक शिपमेंट लोडिंग शुरू हो सकती है इसका मतलब है कि खरीफ सीजन के पीक समय तक सरकार अतिरिक्त खाद उपलब्ध कराने की कोशिश कर रही है।
पिछले साल क्यों लगी थीं लंबी लाइनें?
बीते साल उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में किसानों को खाद के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा था। कई जगहों पर यूरिया की कालाबाजारी और जमाखोरी की शिकायतें भी सामने आई थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ सीजन के दौरान धान, मक्का, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों के लिए यूरिया की मांग अचानक बढ़ जाती है। यदि समय पर आपूर्ति नहीं हो तो संकट की स्थिति बन सकती है। इसी वजह से इस बार सरकार पहले से स्टॉक बढ़ाने पर जोर दे रही है।
भारत में कितना है खाद का स्टॉक?
उर्वरक मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जून से सितंबर के बीच खरीफ सीजन में देश को करीब 3.9 करोड़ टन उर्वरकों की जरूरत होती है। इसमें यूरिया की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रहती है। फिलहाल देश में करीब 2 करोड़ टन उर्वरकों का स्टॉक मौजूद है। इसके अलावा 17 लाख टन नई खेप भी जुलाई तक आने की उम्मीद है। सरकार का दावा है कि फिलहाल देश में खाद की कोई कमी नहीं है, लेकिन वैश्विक हालात को देखते हुए अतिरिक्त खरीद जरूरी हो गई है।
दोगुनी कीमत पर खरीदना पड़ रहा यूरिया
रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ने पिछले टेंडर में करीब 25 लाख टन यूरिया खरीदा था और उस समय सरकार को सामान्य कीमतों की तुलना में लगभग दोगुना भुगतान करना पड़ा था। अब नए टेंडर में भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो भारत का उर्वरक आयात बिल और बढ़ सकता है। इसका असर सरकारी सब्सिडी खर्च पर भी पड़ सकता है क्योंकि भारत में किसानों को यूरिया काफी कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है।
किसानों पर क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि सरकार पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने की कोशिश कर रही है। हालांकि यदि अंतरराष्ट्रीय संकट लंबा चला तो खाद की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, आपूर्ति में देरी हो सकती है, सरकार का सब्सिडी बोझ बढ़ सकता है, निजी बाजार में कालाबाजारी बढ़ने का खतरा रहेगा. कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे जरूरत से ज्यादा खाद जमा करने से बचें और सरकारी वितरण केंद्रों से ही खरीद करें।
आगे क्या हो सकता है?
यदि पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो केवल कच्चे तेल ही नहीं बल्कि उर्वरक बाजार में भी बड़ी अस्थिरता देखने को मिल सकती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि खरीफ सीजन सीधे खाद्य उत्पादन से जुड़ा हुआ है। सरकार फिलहाल आयात, स्टॉक मैनेजमेंट और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर फोकस कर रही है ताकि किसानों तक समय पर खाद पहुंच सके। आने वाले कुछ हफ्ते उर्वरक बाजार और कृषि क्षेत्र दोनों के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं।
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