भारत में सोयाबीन और सोयामील की कीमतों में आई रिकॉर्ड तेजी अब देश के निर्यात कारोबार पर भारी पड़ने लगी है। घरेलू बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ने के कारण भारतीय कंपनियों ने 25,000 मीट्रिक टन सोयामील के निर्यात अनुबंध रद्द कर दिए हैं। इससे उन अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को अब अमेरिका और दक्षिण अमेरिकी देशों की ओर रुख करना पड़ रहा है, जो परंपरागत रूप से भारत से सोयामील खरीदते थे।
पिछले एक महीने में भारत में सोयामील की कीमतों में करीब 41 फीसदी का उछाल आया है। बाजार में इसकी कीमत बढ़कर लगभग 66,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई है, जो पिछले चार वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि घरेलू बाजार में सप्लाई कम होने और पशु चारा उद्योग की मांग बढ़ने से यह तेजी देखने को मिली है।
विदेशी बाजार में भारतीय सोयामील महंगा पड़ा
कीमतों में तेज उछाल के कारण भारतीय सोयामील वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा से बाहर होता दिखाई दे रहा है। जून लोडिंग शिपमेंट के लिए भारतीय सोयामील का निर्यात मूल्य लगभग 695 डॉलर प्रति मीट्रिक टन एफओबी (Free On Board) तक पहुंच गया, जबकि एक महीने पहले यही कीमत करीब 475 डॉलर प्रति टन थी।
यानी केवल एक महीने में करीब 200 डॉलर प्रति टन की बढ़ोतरी हुई। इतने बड़े अंतर को विदेशी खरीदार स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। परिणामस्वरूप भारतीय निर्यातकों और खरीदारों के बीच आपसी सहमति से मई और जून की कई खेपों के निर्यात अनुबंध रद्द कर दिए गए।
अमेरिका और दक्षिण अमेरिका को मिल सकता है फायदा
भारतीय निर्यात सौदों के रद्द होने का सीधा फायदा अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे बड़े सोयामील उत्पादक देशों को मिल सकता है। एशियाई देशों के कई खरीदार अब अपनी जरूरतों के लिए उत्तर और दक्षिण अमेरिकी सप्लायर्स की ओर रुख कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो भारत अपने पारंपरिक खरीदारों का एक हिस्सा स्थायी रूप से खो सकता है। इससे आने वाले महीनों में भारतीय निर्यातकों पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत को अब करना पड़ रहा आयात
स्थिति इतनी बदल चुकी है कि जो भारत पहले सोयामील निर्यात करता था, वही अब आयात की तैयारी कर रहा है। उद्योग सूत्रों के मुताबिक भारतीय व्यापारियों ने जून और जुलाई शिपमेंट के लिए अफ्रीकी देशों से लगभग 80,000 टन सोयाबीन आयात बुक किया है।
महाराष्ट्र ऑयल एक्सट्रैक्शन्स के प्रबंध निदेशक मनोज अग्रवाल ने मीडिया को बताया कि भारतीय कंपनियों ने लागत, बीमा और मालभाड़ा (CIF) आधार पर 700 से 760 डॉलर प्रति टन की दर से अफ्रीकी सोयाबीन खरीदी है। उनका अनुमान है कि सितंबर 2026 तक भारत का कुल सोयाबीन आयात रिकॉर्ड 8 लाख टन तक पहुंच सकता है।
पिछले साल की तुलना में भारी उछाल
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष भारत ने केवल लगभग 2,000 टन सोयाबीन का आयात किया था। लेकिन इस साल घरेलू बाजार में आई तेजी ने तस्वीर पूरी तरह बदल दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर घरेलू उत्पादन, ऊंची मांग और स्टॉक की कमी ने बाजार को असंतुलित कर दिया है। इसका असर केवल निर्यात कारोबार पर ही नहीं बल्कि पोल्ट्री और पशु चारा उद्योग पर भी पड़ सकता है, क्योंकि सोयामील का उपयोग बड़े पैमाने पर पशु आहार में किया जाता है।
केवल गैर-जीएम सोयाबीन आयात की अनुमति
भारत केवल गैर-आनुवंशिक रूप से संशोधित (Non-GM) सोयाबीन के आयात की अनुमति देता है। यही वजह है कि भारत के पास आयात के सीमित विकल्प हैं। वर्तमान में बेनिन, नाइजर, टोगो और नाइजीरिया जैसे कुछ अफ्रीकी देशों से ही गैर-जीएम सोयाबीन उपलब्ध हो पा रही है।
इन देशों में गैर-जीएम सोयाबीन की कीमतें सामान्य जीएम किस्मों की तुलना में अधिक होती हैं। इससे भारतीय आयातकों की लागत और बढ़ जाती है। हालांकि घरेलू बाजार में रिकॉर्ड कीमतों के कारण आयात करना अभी भी व्यापारियों के लिए मजबूरी बन गया है।
किसानों को फायदा, लेकिन उद्योग पर दबाव
सोयाबीन की ऊंची कीमतों का फायदा किसानों को जरूर मिल रहा है, क्योंकि उन्हें अपनी फसल के बेहतर दाम मिल रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर पोल्ट्री उद्योग, डेयरी सेक्टर और पशु आहार बनाने वाली कंपनियों की लागत तेजी से बढ़ रही है।
यदि आने वाले महीनों में कीमतों में नरमी नहीं आई, तो इसका असर अंडे, चिकन और डेयरी उत्पादों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
आगे क्या?
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अब सबकी नजर मानसून और खरीफ सीजन की बुवाई पर रहेगी। अगर इस साल सोयाबीन उत्पादन बेहतर रहता है तो घरेलू सप्लाई बढ़ सकती है और कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन यदि उत्पादन कमजोर रहा, तो भारत को और अधिक आयात करना पड़ सकता है।
सोयामील बाजार में यह उथल-पुथल भारत के कृषि निर्यात क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। जिस देश को एशियाई बाजारों में मजबूत सप्लायर माना जाता था, वह अब खुद आयातक बनने की स्थिति में पहुंच गया है।
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