भारत में डॉलर के मुकाबले रुपये की लगातार कमजोरी को लेकर जहां आम लोगों और बाजार में चिंता बनी हुई है, वहीं देश के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष Montek Singh Ahluwalia ने इस मुद्दे पर अलग राय रखी है। उनका मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा रुपये को बाजार के दबाव के हिसाब से कमजोर होने देना एक व्यावहारिक और समझदारी भरा फैसला था।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया हाल के दिनों में 97 प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की महंगाई और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है। हालांकि बाद में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी आने से रुपये को थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन बाजार में अस्थिरता अब भी बनी हुई है।
आखिर क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?
भारतीय रुपये की कमजोरी के पीछे केवल एक वजह नहीं बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं। पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर लगातार मजबूत हुआ है। अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने और ब्याज दरें ऊंची रहने से निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी संपत्तियों में निवेश कर रहे हैं।
भारत पर इसका सीधा असर पड़ा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाला, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर हुआ।
इसके अलावा पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़े तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर धकेला। भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने का मतलब है कि भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे भी रुपये पर दबाव बढ़ता है।
RBI ने क्या किया?
ऐसी परिस्थितियों में आमतौर पर केंद्रीय बैंक डॉलर बेचकर अपनी मुद्रा को सपोर्ट करता है। RBI ने भी सीमित हस्तक्षेप किया, लेकिन उसने रुपये को किसी तय स्तर पर बचाने की कोशिश नहीं की।
यही फैसला मोंटेक सिंह अहलूवालिया को सही लगता है।
उनके मुताबिक अगर बाजार की वास्तविक स्थिति कमजोर रुपये की मांग कर रही है, तो हर हाल में मुद्रा को बचाने की कोशिश करना नुकसानदायक हो सकता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट सकता है और लंबे समय में अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव पड़ सकता है।
क्या बोले मोंटेक सिंह अहलूवालिया?
इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में अहलूवालिया ने कहा कि भारत पर बाहरी दबाव बढ़ रहे हैं और विदेशी पूंजी का प्रवाह पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। ऐसे में रुपये का थोड़ा कमजोर होना स्वाभाविक और काफी हद तक अपरिहार्य था।
उन्होंने कहा कि बाजार की प्रतिकूल परिस्थितियों में विनिमय दर में गिरावट को पूरी तरह रोकने की कोशिश सही रणनीति नहीं होती। उनके अनुसार एक्सचेंज रेट को वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों को दर्शाना चाहिए।
क्या कमजोर रुपया हमेशा बुरा होता है?
आम लोगों के लिए कमजोर रुपया अक्सर महंगाई और महंगे आयात का संकेत माना जाता है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसका दूसरा पहलू भी होता है।
निर्यात को मिलता है फायदा
जब रुपया कमजोर होता है तो भारतीय सामान विदेशी बाजारों में सस्ते हो जाते हैं। इससे आईटी सेक्टर, टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो पार्ट्स, कृषि निर्यात जैसे सेक्टर्स को फायदा मिल सकता है।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई अमेरिकी कंपनी भारतीय सॉफ्टवेयर सेवा खरीदती है तो कमजोर रुपये की वजह से भारतीय कंपनियों को डॉलर में ज्यादा कमाई होती है।
लेकिन आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
कमजोर रुपये का असर सीधे आम लोगों की जेब पर भी पड़ता है।
1. पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं
भारत तेल आयात पर निर्भर है। डॉलर मजबूत होने पर तेल आयात महंगा पड़ता है। इससे पेट्रोल, डीजल, CNG, LPG की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
2. विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी
विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों को ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं क्योंकि डॉलर महंगा हो जाता है।
3. इलेक्ट्रॉनिक्स और आयातित सामान महंगे
मोबाइल, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और कई मशीनरी उत्पाद आयात होते हैं। कमजोर रुपया इनकी लागत बढ़ा सकता है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दी अहम राय
अहलूवालिया ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक भारत का चालू खाता घाटा विदेशी पूंजी के दम पर आसानी से संभलता रहा, लेकिन अब विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी हुई है।
ऐसे में अगर RBI लगातार डॉलर बेचकर रुपये को बचाने की कोशिश करता, तो विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट सकता था। उनके अनुसार यह लंबी अवधि के लिए सही रणनीति नहीं होती।
RBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इस समय RBI को एक साथ कई मोर्चों पर संतुलन बनाना पड़ रहा है:
| चुनौती | असर |
|---|---|
| कमजोर रुपया | महंगाई बढ़ने का खतरा |
| तेल की कीमतें | आयात बिल बढ़ना |
| FPI बिकवाली | बाजार में अस्थिरता |
| ब्याज दरें | विकास और महंगाई के बीच संतुलन |
अगर RBI बहुत ज्यादा डॉलर बेचता है तो विदेशी मुद्रा भंडार घटेगा। अगर कुछ नहीं करता तो रुपया तेजी से टूट सकता है। इसलिए नियंत्रित गिरावट को कई विशेषज्ञ बेहतर रणनीति मान रहे हैं।
क्या आगे भी कमजोर रहेगा रुपया?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में रुपये की दिशा कई वैश्विक कारकों पर निर्भर करेगी अमेरिका की ब्याज दरें, कच्चे तेल की कीमतें, पश्चिम एशिया का तनाव, विदेशी निवेशकों का रुख, भारत की आर्थिक वृद्धि. अगर तेल की कीमतों में राहत मिलती है और विदेशी निवेश दोबारा लौटता है, तो रुपये को मजबूती मिल सकती है। लेकिन वैश्विक अनिश्चितता बनी रहने पर दबाव जारी रह सकता है।
निष्कर्ष
मोंटेक सिंह अहलूवालिया का बयान ऐसे समय में आया है जब रुपये की कमजोरी को लेकर बाजार में चिंता बढ़ी हुई है। उनका मानना है कि हर कीमत पर रुपये को बचाने के बजाय आर्थिक वास्तविकताओं को स्वीकार करना ज्यादा व्यावहारिक नीति है।
हालांकि कमजोर रुपये से आम लोगों पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है, लेकिन इससे निर्यात और कुछ उद्योगों को फायदा भी मिलता है। आने वाले समय में RBI के फैसले और वैश्विक हालात तय करेंगे कि भारतीय मुद्रा किस दिशा में आगे बढ़ती है।
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