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Reading: India-US Rare Earth Deal: चीन की सबसे बड़ी ताकत पर भारत-अमेरिका का संयुक्त वार, ड्रैगन के ‘मोनोपॉली हथियार’ की काट तैयार
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India-US Rare Earth Deal: चीन की सबसे बड़ी ताकत पर भारत-अमेरिका का संयुक्त वार, ड्रैगन के ‘मोनोपॉली हथियार’ की काट तैयार

Namam Sharma
Last updated: 2026/05/26 at 4:11 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
china-rare-earth-export-ban-iea-6-5-trillion-global-loss-plan
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दुनिया इस समय सिर्फ तेल या गैस की लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि आने वाले दशक की सबसे बड़ी जंग अब “क्रिटिकल मिनरल्स” और “रेयर अर्थ एलिमेंट्स” पर केंद्रित होती जा रही है। स्मार्टफोन से लेकर मिसाइल सिस्टम, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), AI सर्वर, सेमीकंडक्टर चिप्स और फाइटर जेट तक—हर आधुनिक तकनीक इन दुर्लभ खनिजों पर निर्भर है। यही वजह है कि भारत और अमेरिका के बीच मंगलवार को हुआ नया रणनीतिक समझौता वैश्विक भू-राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है।

Contents
आखिर क्या हैं Rare Earth और Critical Minerals?चीन क्यों है दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी?भारत-अमेरिका डील में क्या होगा?Quad Strategy का हिस्सा है यह समझौताभारत को क्या फायदा होगा?1. EV और सेमीकंडक्टर सेक्टर को मजबूती2. चीन पर निर्भरता घटेगी3. Mining Sector में निवेश बढ़ सकता हैकौन-कौन से भारतीय सेक्टर को फायदा?शेयर बाजार पर भी दिख सकता है असरक्या चीन के लिए बढ़ेगी चिंता?आने वाले समय में क्या बदल सकता है?

भारत और अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ सप्लाई चेन को लेकर एक महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। इस डील का मकसद चीन की उस पकड़ को कमजोर करना है, जिसने पिछले दो दशकों में रेयर अर्थ प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन पर लगभग एकाधिकार बना लिया है।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया भर की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं चीन पर अत्यधिक निर्भरता को रणनीतिक खतरे के रूप में देखने लगी हैं। खासकर अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप अब वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।

आखिर क्या हैं Rare Earth और Critical Minerals?

रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements) 17 विशेष धातुओं का समूह होता है, जिनका इस्तेमाल हाई-टेक उत्पादों में किया जाता है। इनमें नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम, लैंथेनम और सेरियम जैसे तत्व शामिल हैं।

इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों, विंड टर्बाइन, सेमीकंडक्टर, AI डेटा सेंटर, मिसाइल और रक्षा उपकरण, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स में होता है।

इसी तरह लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और ग्रेफाइट जैसे खनिजों को “क्रिटिकल मिनरल्स” कहा जाता है क्योंकि इनके बिना आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था चलाना मुश्किल हो जाता है।

चीन क्यों है दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी?

वैश्विक स्तर पर रेयर अर्थ माइनिंग में चीन की हिस्सेदारी करीब 60% मानी जाती है, लेकिन असली ताकत प्रोसेसिंग में है। दुनिया की लगभग 85-90% रेयर अर्थ प्रोसेसिंग क्षमता चीन के पास है। यानी अगर किसी देश के पास खनिज मौजूद भी हो, तब भी उसे प्रोसेसिंग के लिए चीन पर निर्भर रहना पड़ सकता है। यही चीन का सबसे बड़ा “स्ट्रैटेजिक हथियार” माना जाता है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को डर है कि भविष्य में चीन इन संसाधनों का इस्तेमाल आर्थिक दबाव या भू-राजनीतिक हथियार के रूप में कर सकता है। अमेरिका पहले भी आरोप लगा चुका है कि चीन ने कई बार निर्यात नियंत्रण और सप्लाई बाधाओं का इस्तेमाल रणनीतिक दबाव बनाने के लिए किया।

भारत-अमेरिका डील में क्या होगा?

भारत और अमेरिका के बीच हुए इस समझौते के तहत दोनों देश रेयर अर्थ माइनिंग में सहयोग बढ़ाएंगे, प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करेंगे, सप्लाई चेन को सुरक्षित बनाएंगे, रीसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी पर काम करेंगे, संयुक्त निवेश और रिसर्च को बढ़ावा देंगे इसके अलावा यह फ्रेमवर्क निजी कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के बीच भी सहयोग को मजबूत करेगा।

विदेश मंत्री S. Jaishankar ने कहा कि यह समझौता केवल द्विपक्षीय नहीं बल्कि व्यापक रणनीतिक महत्व रखता है। उन्होंने संकेत दिया कि Quad और समान विचारधारा वाले देशों के साथ मिलकर भी इस दिशा में बड़ा नेटवर्क तैयार किया जाएगा। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने कहा कि महत्वपूर्ण खनिजों तक सुरक्षित और विश्वसनीय पहुंच दोनों देशों के राष्ट्रीय हित के लिए बेहद जरूरी है।

Quad Strategy का हिस्सा है यह समझौता

यह डील सिर्फ व्यापारिक समझौता नहीं बल्कि Quad रणनीति का हिस्सा भी मानी जा रही है। Quad में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इन चारों देशों की चिंता है कि भविष्य की टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन किसी एक देश के नियंत्रण में नहीं होनी चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने चीन पर टेक प्रतिबंध बढ़ाए जापान ने वैकल्पिक सप्लाई नेटवर्क पर निवेश शुरू किया, ऑस्ट्रेलिया ने रेयर अर्थ माइनिंग को बढ़ावा दिया भारत ने Critical Mineral Mission लॉन्च किया अब यह नई डील उसी बड़े वैश्विक प्रयास का अगला कदम मानी जा रही है।

भारत को क्या फायदा होगा?

भारत के लिए यह समझौता कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है।

1. EV और सेमीकंडक्टर सेक्टर को मजबूती

भारत तेजी से EV और चिप मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इसके लिए जरूरी कच्चे माल की सुरक्षित सप्लाई अभी बड़ी चुनौती है।

यह डील भारत की बैटरी मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर प्रोडक्शन, क्लीन एनर्जी, डिफेंस टेक्नोलॉजी क्षमता को मजबूत कर सकती है।

2. चीन पर निर्भरता घटेगी

भारत फिलहाल कई महत्वपूर्ण इंडस्ट्रियल मटेरियल के लिए चीन पर निर्भर है। अगर वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित होती है तो रणनीतिक जोखिम कम होंगे।

3. Mining Sector में निवेश बढ़ सकता है

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत में नई माइनिंग परियोजनाएं, प्रोसेसिंग प्लांट, विदेशी निवेश, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तेजी से बढ़ सकते हैं।

कौन-कौन से भारतीय सेक्टर को फायदा?

इस डील का असर आने वाले वर्षों में कई सेक्टर पर दिख सकता है:

सेक्टरसंभावित फायदा
EV कंपनियांबैटरी सप्लाई सुरक्षित
सेमीकंडक्टरकच्चे माल की उपलब्धता
Renewable Energyविंड और सोलर उपकरण उत्पादन
रक्षा उद्योगएडवांस टेक्नोलॉजी सपोर्ट
Mining कंपनियांनिवेश और एक्सप्लोरेशन में तेजी

शेयर बाजार पर भी दिख सकता है असर

विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारत रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन में तेजी से आगे बढ़ता है तो आने वाले समय में माइनिंग और मेटल सेक्टर की कंपनियों को बड़ा फायदा मिल सकता है। खासकर रेयर अर्थ एक्सप्लोरेशन, बैटरी मटेरियल, EV सप्लाई चेन, प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियां निवेशकों के रडार पर आ सकती हैं।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि चीन की मौजूदा बढ़त इतनी बड़ी है कि उसे चुनौती देना आसान नहीं होगा। चीन ने पिछले 20 वर्षों में इस सेक्टर में भारी निवेश किया है और उसके पास विशाल प्रोसेसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।

क्या चीन के लिए बढ़ेगी चिंता?

भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता चीन के लिए एक बड़ा संकेत है कि दुनिया अब “China Plus One” रणनीति को तेजी से लागू कर रही है।

पहले मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, सप्लाई चेन में चीन का दबदबा था। अब वही स्थिति क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर में चुनौती के घेरे में आती दिख रही है। अगर भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया मिलकर वैकल्पिक नेटवर्क तैयार कर लेते हैं, तो भविष्य में चीन की रणनीतिक ताकत कमजोर हो सकती है।

आने वाले समय में क्या बदल सकता है?

ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition), AI क्रांति और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के दौर में रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स “21वीं सदी का नया तेल” बन चुके हैं। ऐसे में भारत-अमेरिका की यह डील सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीकी और आर्थिक शक्ति संतुलन तय करने वाला बड़ा कदम मानी जा रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दशक में जिस देश के पास सुरक्षित मिनरल सप्लाई चेन होगी, वही AI, EV, रक्षा और हाई-टेक इंडस्ट्री में वैश्विक नेतृत्व हासिल करेगा। भारत और अमेरिका अब उसी दिशा में अपनी संयुक्त रणनीति को मजबूत करते दिखाई दे रहे हैं।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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