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RBI New Rule: सहकारी बैंकों के लिए रिजर्व बैंक ने बदले नियम, अब 10 साल से ज्यादा कुर्सी पर नहीं रह पाएंगे डायरेक्टर

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 12:58 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शहरी सहकारी बैंकों (Urban Cooperative Banks-UCBs) के शासन ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने निदेशक मंडल (Board of Directors) के कार्यकाल से जुड़े नियमों में संशोधन करते हुए साफ कर दिया है कि अब कोई भी व्यक्ति लगातार 10 साल से ज्यादा समय तक किसी शहरी सहकारी बैंक के बोर्ड में निदेशक नहीं बना रह सकेगा।

Contents
क्या है RBI का नया नियम?RBI को नियम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?सहकारी बैंकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?क्या ग्रामीण बैंकों पर भी लागू होंगे ऐसे नियम?बैंकिंग सेक्टर पर क्या असर पड़ सकता है?1. बोर्ड में नई नेतृत्व टीम को मौका2. राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है3. जवाबदेही बढ़ेगी4. RBI की निगरानी मजबूत होगीक्या मौजूदा निदेशकों पर भी लागू होंगे नियम?सहकारी बैंकिंग सेक्टर में पहले भी हुए हैं बड़े बदलावआम ग्राहकों के लिए इसका क्या मतलब है?निष्कर्ष

आरबीआई की तरफ से सोमवार को जारी संशोधित दिशा-निर्देशों के अनुसार, 10 साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद संबंधित निदेशक को कम से कम तीन साल तक बैंक के बोर्ड से दूर रहना होगा। इस अवधि को ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ कहा गया है। इसके बाद ही वह दोबारा उसी बैंक के बोर्ड में लौटने के लिए पात्र माना जाएगा।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सहकारी बैंकों के शासन, पारदर्शिता और बोर्ड स्तर पर जवाबदेही को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई सहकारी बैंकों में अनियमितताओं और प्रबंधन संबंधी विवाद सामने आए थे, जिसके बाद आरबीआई ने गवर्नेंस नियमों को सख्त करने की दिशा में कदम तेज किए हैं।

क्या है RBI का नया नियम?

आरबीआई के संशोधित दिशा-निर्देशों के मुताबिक कोई भी व्यक्ति किसी शहरी सहकारी बैंक में लगातार 10 साल से अधिक समय तक निदेशक नहीं रह सकेगा। 10 साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद तीन साल का अनिवार्य ‘कूलिंग-ऑफ’ पीरियड लागू होगा। इस अवधि के दौरान वह व्यक्ति संबंधित बैंक के प्रबंधन या बोर्ड से किसी भी रूप में जुड़ा नहीं रहेगा। वह केवल बैंक का सामान्य सदस्य या ग्राहक बना रह सकता है। कूलिंग-ऑफ अवधि के दौरान पात्रता होने पर वह किसी दूसरे बैंक के बोर्ड में निदेशक बन सकता है। आरबीआई ने कहा कि नए नियम तत्काल प्रभाव से लागू कर दिए गए हैं।

RBI को नियम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?

केंद्रीय बैंक ने अपने दिशा-निर्देशों में साफ कहा है कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए थे, जहां कुछ निदेशक कानूनी प्रावधानों का रास्ता निकालकर लंबे समय तक बोर्ड में बने रहते थे।

कई मामलों में निदेशक बीच कार्यकाल में इस्तीफा दे देते थे और फिर थोड़े समय बाद दोबारा निर्वाचित या सह-नामित होकर बोर्ड में लौट आते थे। इस तरह वे लगातार लंबे समय तक बैंक के प्रबंधन पर प्रभाव बनाए रखते थे।

आरबीआई का मानना है कि इससे बोर्ड की स्वतंत्रता प्रभावित होती है, निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता कम होती है, और संस्थागत शासन (Corporate Governance) कमजोर पड़ता है। इसी वजह से अब “लगातार कार्यकाल” की अवधारणा को अधिक सख्ती से लागू किया गया है।

सहकारी बैंकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

भारत में सहकारी बैंक छोटे कारोबारियों, किसानों, मध्यम वर्ग और स्थानीय व्यापारियों के लिए अहम वित्तीय संस्थान माने जाते हैं। खासकर छोटे शहरों और कस्बों में इनकी भूमिका काफी बड़ी है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कई सहकारी बैंकों में वित्तीय गड़बड़ियां, फंड मैनेजमेंट की समस्याएं, राजनीतिक हस्तक्षेप, और कमजोर गवर्नेंस जैसी समस्याएं सामने आई हैं।

PMC Bank जैसे मामलों के बाद आरबीआई ने सहकारी बैंकों पर निगरानी और सख्ती दोनों बढ़ाई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड स्तर पर लंबे समय तक एक ही समूह का नियंत्रण रहने से जवाबदेही कम होती है। नए नियम से बोर्ड में नए लोगों को मौका मिलेगा और संस्थागत पारदर्शिता बढ़ सकती है।

क्या ग्रामीण बैंकों पर भी लागू होंगे ऐसे नियम?

आरबीआई ने बताया कि इसी तरह के दिशा-निर्देश ग्रामीण सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) के लिए भी अलग से जारी किए गए हैं। यानी केंद्रीय बैंक केवल शहरी सहकारी बैंकों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि पूरे सहकारी बैंकिंग ढांचे में गवर्नेंस सुधार की दिशा में काम कर रहा है।

बैंकिंग सेक्टर पर क्या असर पड़ सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले के कई बड़े असर देखने को मिल सकते हैं:

1. बोर्ड में नई नेतृत्व टीम को मौका

लंबे समय से पद पर बैठे निदेशकों की जगह नए पेशेवर और स्वतंत्र सदस्य आ सकेंगे।

2. राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है

कई सहकारी बैंकों में स्थानीय राजनीति का प्रभाव देखने को मिलता है। कार्यकाल सीमा तय होने से यह असर कुछ हद तक कम हो सकता है।

3. जवाबदेही बढ़ेगी

नए नियमों से बोर्ड में शक्ति का केंद्रीकरण कम होगा और निर्णय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बन सकती है।

4. RBI की निगरानी मजबूत होगी

केंद्रीय बैंक अब सहकारी बैंकों के संचालन पर अधिक सख्ती से नजर रख पाएगा।

क्या मौजूदा निदेशकों पर भी लागू होंगे नियम?

आरबीआई के दिशा-निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू किए गए हैं। हालांकि अलग-अलग बैंकों में निदेशकों के वर्तमान कार्यकाल और नियुक्ति स्थिति के आधार पर इसका अनुपालन किया जाएगा। जिन निदेशकों का कार्यकाल 10 साल के करीब पहुंच चुका है, उन्हें नए नियमों के तहत बाहर होना पड़ सकता है।

सहकारी बैंकिंग सेक्टर में पहले भी हुए हैं बड़े बदलाव

पिछले कुछ वर्षों में आरबीआई ने सहकारी बैंकों के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं पूंजी पर्याप्तता (Capital Adequacy) नियम सख्त किए गए, ऑडिट और निरीक्षण प्रक्रिया मजबूत की गई, बड़े एक्सपोजर नियम लागू किए गए, बोर्ड और प्रबंधन की जवाबदेही बढ़ाने के लिए नए गवर्नेंस फ्रेमवर्क लाए गए।

अब निदेशकों के कार्यकाल पर सीमा तय करना उसी कड़ी का अगला कदम माना जा रहा है।

आम ग्राहकों के लिए इसका क्या मतलब है?

सामान्य बैंक ग्राहकों के लिए यह फैसला सीधे तौर पर राहत देने वाला माना जा सकता है। यदि बैंकों का शासन ढांचा मजबूत होता है, तो वित्तीय जोखिम कम होंगे, बैंकिंग संचालन अधिक पारदर्शी होगा, और जमाकर्ताओं का भरोसा मजबूत हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सहकारी बैंकिंग सेक्टर में भरोसा बढ़ाना अभी आरबीआई की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है।

निष्कर्ष

आरबीआई का यह नया नियम सहकारी बैंकिंग सेक्टर में लंबे समय से चली आ रही गवर्नेंस संबंधी चिंताओं को दूर करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। लगातार 10 साल से अधिक समय तक निदेशक बने रहने पर रोक और तीन साल का अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड लागू होने से बोर्ड में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है। आने वाले समय में यह फैसला सहकारी बैंकों के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव ला सकता है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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