भारत में प्रॉपर्टी बेचने पर मिलने वाले मुनाफे पर आमतौर पर भारी टैक्स देना पड़ता है। खासकर जब मामला करोड़ों रुपये का हो, तो लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स बड़ी रकम बन जाता है। लेकिन मुंबई के एक टैक्सपेयर को आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) से ऐसी राहत मिली, जिसने हजारों प्रॉपर्टी निवेशकों और घर बेचने वालों के लिए बड़ा उदाहरण पेश कर दिया है।
मुंबई पीठ के इस फैसले में ITAT ने साफ कहा कि अगर किसी व्यक्ति ने प्रॉपर्टी बेचने से हुए कैपिटल गेन्स को तय समय सीमा के भीतर नए घर में निवेश कर दिया है, तो केवल ITR देर से भरने की वजह से टैक्स छूट से वंचित नहीं किया जा सकता। यह फैसला इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54 को लेकर लंबे समय से चल रही कई व्यावहारिक परेशानियों को भी स्पष्ट करता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला मुंबई के विले पार्ले में रहने वाले एक व्यक्ति से जुड़ा था। टैक्सपेयर ने साल 2017 में अपने तीन प्लॉट्स को कुल 5.03 करोड़ रुपये में बेचा था। इस सौदे से उन्हें करीब 3.68 करोड़ रुपये का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) हुआ।
इनकम टैक्स नियमों के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति प्रॉपर्टी बेचकर हुए मुनाफे को निर्धारित समय के भीतर नई रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी खरीदने में निवेश कर देता है, तो उसे धारा 54 के तहत LTCG टैक्स में छूट मिल सकती है। यही छूट इस मामले का केंद्र बनी।
विवाद क्यों शुरू हुआ?
असल विवाद ITR फाइलिंग की समय सीमा को लेकर पैदा हुआ। असेसमेंट ईयर 2018-19 के लिए आयकर रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तारीख सरकार ने बढ़ाकर 31 अक्टूबर 2018 कर दी थी। लेकिन टैक्सपेयर ने अपना रिटर्न 28 दिसंबर 2018 को दाखिल किया। यानी यह एक Belated Return था। इसके अलावा टैक्सपेयर ने कैपिटल गेन्स की रकम को Capital Gains Account Scheme (CGAS) में भी जमा नहीं कराया था।
सामान्य नियम यह कहता है कि अगर टैक्सपेयर नई प्रॉपर्टी खरीदने से पहले निर्धारित समय सीमा तक रकम का उपयोग नहीं कर पाता, तो उसे CGAS खाते में पैसा जमा करना होता है। इसी आधार पर इनकम टैक्स विभाग ने धारा 54 की छूट देने से इनकार कर दिया।
फिर टैक्सपेयर ने क्या किया था?
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि टैक्सपेयर ने 24 दिसंबर 2018 को 8.45 करोड़ रुपये का नया मकान खरीद लिया था।
ध्यान देने वाली बात यह है कि नया घर ITR दाखिल करने से पहले खरीदा गया था, निवेश की गई रकम कैपिटल गेन्स से ज्यादा थी पूरा निवेश धारा 54 में निर्धारित समय के भीतर किया गया था यानी सरकार को यह स्पष्ट था कि टैक्सपेयर ने वास्तव में पैसा नई रिहायशी संपत्ति में लगा दिया था।
ITAT ने क्या कहा?
आईटीएटी की मुंबई पीठ ने अपने फैसले में धारा 54 की “मूल भावना” को आधार बनाया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि धारा 54 का असली उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:
“प्रॉपर्टी बेचने से हुआ मुनाफा नए आवासीय घर में निवेश किया गया है या नहीं।”
आईटीएटी ने माना कि: टैक्सपेयर ने धारा 139(4) के तहत Belated Return दाखिल किया लेकिन उससे पहले ही पूरी रकम नए मकान में निवेश कर दी गई थी इसलिए सिर्फ देरी से ITR फाइल करने के आधार पर टैक्स छूट रोकना उचित नहीं होगा यही वजह रही कि ट्रिब्यूनल ने टैक्सपेयर को पूरी राहत दे दी।
धारा 54 आखिर है क्या?
इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54 उन लोगों को राहत देती है जो कोई पुरानी रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी बेचते हैं और उससे मिले कैपिटल गेन्स को नई रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी खरीदने या बनाने में निवेश करते हैं
धारा 54 के मुख्य नियम
- नया घर खरीदना जरूरी
- निवेश निर्धारित समय सीमा के भीतर होना चाहिए
- पूरी रकम निवेश होने पर पूरा टैक्स बच सकता है
समय सीमा क्या होती है?
- बिक्री से 1 साल पहले घर खरीदा हो सकता है
- बिक्री के 2 साल बाद तक नया घर खरीदा जा सकता है
- निर्माण के लिए 3 साल तक की सीमा
CGAS स्कीम क्यों जरूरी मानी जाती है?
Capital Gains Account Scheme (CGAS) उन टैक्सपेयर्स के लिए बनाई गई है जो तुरंत नया घर नहीं खरीद पाते लेकिन भविष्य में निवेश करना चाहते हैं ऐसी स्थिति में पैसा CGAS खाते में जमा करना पड़ता है ताकि टैक्स छूट बनी रहे।
हालांकि इस मामले में ITAT ने माना कि क्योंकि टैक्सपेयर ने वास्तविक निवेश कर दिया था इसलिए केवल CGAS में रकम जमा न करने को आधार नहीं बनाया जा सकता
इस फैसले का आम लोगों पर क्या असर होगा?
यह फैसला खासतौर पर उन लोगों के लिए राहत भरा माना जा रहा है जो प्रॉपर्टी बेचते हैं नई संपत्ति में निवेश करते हैं लेकिन तकनीकी कारणों से ITR देर से फाइल हो जाती है अब यह फैसला भविष्य के कई मामलों में मिसाल बन सकता है। हालांकि टैक्स विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि हर केस के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए इसे “सार्वजनिक छूट” नहीं माना जा सकता।
टैक्सपेयर्स को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
हालांकि ITAT ने राहत दी, लेकिन विशेषज्ञ अब भी सलाह देते हैं कि ITR समय पर फाइल करें, जरूरत होने पर CGAS का इस्तेमाल करें, निवेश के सारे दस्तावेज सुरक्षित रखें, प्रॉपर्टी खरीद-बिक्री की पेमेंट ट्रेल स्पष्ट रखें क्योंकि हर केस में ITAT का फैसला एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है।
क्यों अहम माना जा रहा है यह फैसला?
पिछले कुछ वर्षों में इनकम टैक्स विभाग कैपिटल गेन्स मामलों की जांच काफी सख्ती से कर रहा है। ऐसे में ITAT का यह फैसला यह संकेत देता है कि केवल तकनीकी देरी को आधार बनाकर राहत नहीं रोकी जानी चाहिए कानून की “स्पिरिट” यानी वास्तविक उद्देश्य भी महत्वपूर्ण है यदि निवेश वास्तविक है तो टैक्स छूट मिल सकती है यह फैसला खासकर रियल एस्टेट निवेशकों, HNI टैक्सपेयर्स और संपत्ति बेचने वाले मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।
Also Read:


