एक दौर था जब हर घर में दिखता था Videocon का लोगो
1990 और 2000 के दशक में अगर किसी भारतीय मिडिल क्लास परिवार के घर में टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन या डीटीएच कनेक्शन होता था, तो बहुत संभावना थी कि उस पर ‘Videocon’ लिखा हो। भारतीय कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में कभी यह ब्रांड भरोसे और किफायती तकनीक का पर्याय माना जाता था। लेकिन आज यही कंपनी हजारों करोड़ के कर्ज, कानूनी विवादों और दिवालियापन की प्रक्रिया में फंसी हुई है।
कभी देश की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों में गिनी जाने वाली वीडियोकॉन का साम्राज्य आखिर कैसे ढह गया? यह सिर्फ एक कारोबारी असफलता की कहानी नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा विस्तार, भारी कर्ज और गलत रणनीति के कारण बर्बाद हुए एक भारतीय कॉर्पोरेट साम्राज्य की मिसाल भी है।
छोटे कारोबार से शुरू हुआ था धूत परिवार का सफर
वीडियोकॉन की शुरुआत महाराष्ट्र के अहमदनगर से हुई थी। धूत परिवार मूल रूप से कॉटन जिनिंग, अनाज व्यापार और बजाज ऑटो डीलरशिप के कारोबार से जुड़ा था। 1985-86 के आसपास नंदलाल माधवलाल धूत ने ‘Videocon International’ की नींव रखी।
कंपनी को आगे बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभाई वेणुगोपाल धूत ने। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद वे जापान गए, जहां उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी को करीब से समझा। इसके बाद जापानी कंपनी Toshiba के साथ तकनीकी साझेदारी की गई। यही वह दौर था जब भारतीय बाजार तेजी से रंगीन टीवी और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स की तरफ बढ़ रहा था। Videocon ने कम कीमत पर अच्छी तकनीक उपलब्ध कराई और देखते ही देखते यह ब्रांड भारतीय परिवारों की पहली पसंद बन गया।
90 के दशक में Videocon का था दबदबा
उदारीकरण के बाद भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार तेजी से बढ़ रहा था। उस समय LG, Samsung और Sony जैसे विदेशी ब्रांड पूरी तरह मजबूत नहीं हुए थे। ऐसे में Videocon ने घरेलू बाजार में जबरदस्त पकड़ बना ली।
कंपनी सिर्फ टीवी या फ्रिज तक सीमित नहीं रही। उसने वॉशिंग मशीन, एयर कंडीशनर, माइक्रोवेव और बाद में डीटीएच सेवाओं तक अपना कारोबार फैलाया। कंपनी ने विज्ञापनों और डीलर नेटवर्क पर भी भारी निवेश किया। उस दौर में Videocon का नाम भरोसे, भारतीय पहचान और बड़े ब्रांड वैल्यू का प्रतीक बन चुका था।
विदेशों तक फैल गया था कारोबार
2000 के दशक तक Videocon सिर्फ भारतीय कंपनी नहीं रही थी। कंपनी ने चीन, पोलैंड, इटली और मैक्सिको जैसे देशों में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित कीं। कंपनी का सपना एक ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स दिग्गज बनने का था। लेकिन यही महत्वाकांक्षा धीरे-धीरे सबसे बड़ी कमजोरी बन गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनी ने अपने मजबूत कोर बिजनेस पर ध्यान बनाए रखने के बजाय उन सेक्टर्स में पैसा लगाना शुरू कर दिया जहां जोखिम बहुत ज्यादा था और अनुभव सीमित था।
इलेक्ट्रॉनिक्स छोड़ टेलीकॉम और ऑयल सेक्टर में घुसना पड़ा भारी
Videocon के पतन की शुरुआत तब हुई जब कंपनी ने इलेक्ट्रॉनिक्स से बाहर निकलकर कई नए क्षेत्रों में आक्रामक विस्तार शुरू किया।
1. टेलीकॉम सेक्टर में एंट्री
कंपनी ने कई टेलीकॉम सर्किल्स में स्पेक्ट्रम लाइसेंस खरीदे। उस समय भारत में मोबाइल क्रांति तेजी से बढ़ रही थी और लगभग हर बड़ा कारोबारी समूह टेलीकॉम सेक्टर में उतरना चाहता था।
लेकिन 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने 2G स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़े 122 लाइसेंस रद्द कर दिए। इनमें Videocon के लाइसेंस भी शामिल थे। इससे कंपनी को भारी नुकसान हुआ। बाद में कंपनी ने अपने स्पेक्ट्रम अधिकार Airtel को बेच दिए और इस कारोबार से बाहर निकल गई।
2. तेल और गैस कारोबार में भारी निवेश
Videocon ने भारत के अलावा ब्राज़ील और इंडोनेशिया में भी ऑयल और गैस एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट्स में निवेश किया। यह कारोबार बेहद पूंजी-आधारित और जोखिम भरा था।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भारी निवेश के कारण कंपनी पर कर्ज बढ़ता चला गया। लेकिन रिटर्न उम्मीद के मुताबिक नहीं मिला।
3. DTH, पावर और रियल एस्टेट में भी दांव
कंपनी ने DTH सेवाओं, बिजली उत्पादन, इंश्योरेंस और रियल एस्टेट जैसे सेक्टर्स में भी कदम रखा। लेकिन इनमें से कोई भी कारोबार लंबे समय तक मजबूत मुनाफा नहीं दे सका।
विश्लेषकों का मानना है कि Videocon ने बहुत कम समय में बहुत ज्यादा क्षेत्रों में विस्तार कर लिया था। इससे कंपनी का फोकस बंट गया और कैश फ्लो कमजोर होने लगा।
विदेशी कंपनियों से बढ़ा दबाव
उधर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में Samsung, LG, Whirlpool और Sony जैसी कंपनियां तेजी से मजबूत हो रही थीं।
इन विदेशी ब्रांड्स ने बेहतर टेक्नोलॉजी, आक्रामक मार्केटिंग, मजबूत सर्विस नेटवर्क, प्रीमियम ब्रांडिंग के दम पर भारतीय बाजार पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। Videocon धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी और इनोवेशन की दौड़ में पीछे छूटती चली गई।
कर्ज का पहाड़ बनता गया
आक्रामक विस्तार के कारण कंपनी ने बैंकों से भारी उधार लेना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे कंपनी का कुल कर्ज हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
जब कारोबार से पर्याप्त कमाई नहीं हुई, तो लोन चुकाना मुश्किल होने लगा। ब्याज का बोझ बढ़ता गया और कंपनी की वित्तीय हालत कमजोर होती चली गई। 2017 में RBI ने जिन 12 बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टर्स की सूची जारी की थी, उसमें Videocon Group का नाम भी शामिल था।
ICICI बैंक लोन विवाद ने बढ़ाई मुश्किलें
Videocon का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में तब आया जब ICICI बैंक लोन विवाद सामने आया। आरोप थे कि 2009 से 2012 के बीच ICICI Bank ने Videocon Group को भारी-भरकम लोन दिए। उस समय चंदा कोचर बैंक की CEO थीं।
बाद में जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि इन लोन के बदले चंदा कोचर के पति दीपक कोचर की कंपनी को फायदा पहुंचाया गया। इस मामले को “Quid Pro Quo” यानी “फायदे के बदले फायदा” के रूप में देखा गया।
CBI और ED ने इस मामले में जांच शुरू की। 2018 में चंदा कोचर को इस्तीफा देना पड़ा। बाद में 2022 में चंदा कोचर, दीपक कोचर और वेणुगोपाल धूत को गिरफ्तार भी किया गया। इस विवाद ने Videocon की पहले से खराब छवि को और ज्यादा नुकसान पहुंचाया।
NCLT पहुंचा मामला, शुरू हुई दिवालियापन प्रक्रिया
जून 2018 में SBI की याचिका पर NCLT ने Videocon Industries के खिलाफ CIRP (Corporate Insolvency Resolution Process) शुरू की। कंपनी पर कुल दावा लगभग ₹64,000 करोड़ से ₹65,000 करोड़ के बीच पहुंच चुका था।
इसके बाद कई निवेशकों ने कंपनी को खरीदने में रुचि दिखाई। 2020-21 में Vedanta Group की कंपनी Twin Star Technologies ने करीब ₹3,000 करोड़ में Videocon को खरीदने का प्रस्ताव दिया। लेकिन यह रकम बैंकों के कुल बकाया की तुलना में बहुत कम थी। इसे लेकर काफी विवाद हुआ और बाद में NCLAT ने इस डील को रद्द कर दिया।
अब सुप्रीम कोर्ट में फंसा है मामला
2025-26 तक आते-आते मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है। दिवालियापन प्रक्रिया और अलग-अलग इकाइयों की सुनवाई को लेकर कानूनी विवाद जारी है। Videocon Industries और Videocon Oil Ventures के मामलों को अलग-अलग चलाने के फैसले को लेकर भी कानूनी लड़ाई चल रही है।
उधर 2021 से ही कंपनी के शेयरों की ट्रेडिंग सस्पेंड है और निवेशकों का पैसा फंसा हुआ है।
Videocon की कहानी से क्या सीख मिलती है?
Videocon की कहानी भारतीय कॉर्पोरेट जगत के लिए एक बड़ा सबक मानी जाती है।
सबसे बड़ी गलतियां:
- कोर बिजनेस से फोकस हटाना
- जरूरत से ज्यादा विस्तार
- भारी कर्ज लेना
- जोखिम भरे सेक्टर्स में निवेश
- बदलती टेक्नोलॉजी के साथ खुद को अपडेट न करना
सिर्फ ‘महत्वाकांक्षा’ नहीं, संतुलन भी जरूरी
कारोबार में विस्तार जरूरी होता है, लेकिन बिना मजबूत रणनीति के अंधाधुंध विस्तार कई बार कंपनियों को बर्बादी की तरफ ले जाता है।
Videocon ने इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में जो भरोसा और पहचान बनाई थी, अगर कंपनी उसी क्षेत्र में टेक्नोलॉजी और इनोवेशन पर ध्यान देती, तो शायद आज कहानी कुछ और होती। लेकिन जरूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षा, बढ़ते कर्ज और गलत कारोबारी फैसलों ने एक समय भारतीय घरों की शान रहे इस ब्रांड को दिवालियापन के मुहाने पर पहुंचा दिया।
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