असम के नलबाड़ी जिले की रहने वाली कनिका तालुकदार की कहानी सिर्फ एक बिजनेस सक्सेस स्टोरी नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मनिर्भरता और हिम्मत की मिसाल है। 10वीं तक पढ़ीं कनिका ने जिंदगी के सबसे कठिन दौर में हार मानने के बजाय खुद को संभाला और सिर्फ 500 रुपये की छोटी सी पूंजी से ऐसा कारोबार खड़ा कर दिया, जिसका सालाना टर्नओवर आज 70 से 75 लाख रुपये तक पहुंच चुका है।
आज उनकी कंपनी ‘जयातु ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स’ (Jayatu Organic Products) वर्मीकम्पोस्ट, ऑर्गेनिक कीटनाशक और गोबर से बनी केमिकल-फ्री अगरबत्तियां तैयार करती है। उनके उत्पाद अब स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि Amazon, Flipkart और GeM जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स पर भी बिक रहे हैं।
सड़क हादसे ने बदल दी जिंदगी

कनिका तालुकदार की जिंदगी में सबसे बड़ा झटका साल 2008 में लगा, जब एक सड़क हादसे में उनके पति की मौत हो गई। उस समय उनकी बेटी सिर्फ चार महीने की थी। अचानक परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
कम पढ़ाई और सीमित संसाधनों के कारण उनके सामने रोजगार के ज्यादा विकल्प नहीं थे। शुरुआती वर्षों में उन्होंने घरेलू कामों में हाथ बंटाकर किसी तरह परिवार चलाया। लेकिन, धीरे-धीरे उन्होंने यह समझ लिया कि आर्थिक रूप से मजबूत बने बिना जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना मुश्किल होगा। यहीं से उनके आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत हुई।
सेल्फ हेल्प ग्रुप से मिली नई दिशा
साल 2014 में कनिका ने एक सेल्फ हेल्प ग्रुप (SHG) ज्वाइन किया। यहां उन्हें ‘जीविका सखी’ की जिम्मेदारी मिली। इसी दौरान उन्होंने पहली बार टीमवर्क, छोटे बिजनेस मॉडल और ग्रामीण उद्यमिता के बारे में सीखा।
इस समूह के साथ नलबाड़ी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के दौरे ने उनकी सोच पूरी तरह बदल दी। वहां उन्होंने विशेषज्ञ डॉ. मानोषी चक्रवर्ती से वर्मीकम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद बनाने की ट्रेनिंग ली।
ट्रेनिंग के बाद कनिका को एहसास हुआ कि जैविक खेती और ऑर्गेनिक उत्पादों की मांग भविष्य में तेजी से बढ़ सकती है। उन्होंने तुरंत इस दिशा में काम शुरू करने का फैसला किया।
सिर्फ ₹500 से शुरू किया वर्मीकम्पोस्ट का काम

कनिका के पास ज्यादा पूंजी नहीं थी। उन्होंने अपने माता-पिता के घर के पीछे खाली जगह में सिर्फ 500 रुपये लगाकर वर्मीकम्पोस्ट बनाने का छोटा सा प्रयोग शुरू किया।
शुरुआत में उनके पास महंगे संसाधन खरीदने के पैसे भी नहीं थे। इसलिए उन्होंने घर और आसपास से मिलने वाले ऑर्गेनिक कचरे, गोबर, सूखे पत्तों और प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया।
धीरे-धीरे उन्होंने केंचुआ खाद का पहला बैच तैयार किया। हालांकि, उस समय उनके सामने सबसे बड़ी समस्या बाजार और ग्राहकों की थी।
लोगों को नहीं थी जैविक खेती की जानकारी
कनिका के इलाके में उस समय ज्यादातर किसान पारंपरिक खेती पर निर्भर थे। बहुत कम लोगों को वर्मीकम्पोस्ट और ऑर्गेनिक खेती के फायदों की जानकारी थी। यही कारण था कि शुरुआत में लोग उनका उत्पाद खरीदने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन, कनिका ने हार नहीं मानी।
उन्होंने खुद गांव-गांव जाकर किसानों को समझाना शुरू किया कि केमिकल खाद की तुलना में जैविक खाद मिट्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद होती है। उन्होंने छोटे-छोटे जागरूकता समूह बनाए, किसानों से व्यक्तिगत मुलाकात की और रेडियो कार्यक्रमों में इंटरव्यू देकर भी लोगों को ऑर्गेनिक खेती के फायदे बताए।
उनकी लगातार मेहनत का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। स्थानीय किसानों का भरोसा बढ़ा और उनकी खाद की मांग भी बढ़ने लगी।
‘जयातु ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स’ की शुरुआत

साल 2017 में कनिका ने अपने बिजनेस को औपचारिक रूप दिया और ‘जयातु ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स’ ब्रांड की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने सिर्फ वर्मीकम्पोस्ट तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने ऑर्गेनिक कीटनाशक और गाय के गोबर से बनी केमिकल-फ्री अगरबत्तियां भी बनानी शुरू कीं।
जैविक खेती और पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता का उन्हें फायदा मिला। धीरे-धीरे उनका कारोबार स्थानीय बाजार से निकलकर बड़े प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच गया।
सरकारी मदद ने बदल दी तस्वीर
कनिका के कारोबार को सबसे बड़ा मोड़ साल 2019 में मिला। जिला उद्योग केंद्र (DIC) ने उनके काम को देखते हुए ब्रांडिंग और मार्केटिंग में मदद की।
सरकारी सहयोग से उन्होंने अपने उत्पादों को Amazon, Flipkart और Government e-Marketplace (GeM) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर बेचने की शुरुआत की। GeM पर रजिस्ट्रेशन के बाद उन्हें सरकारी विभागों से नियमित ऑर्डर मिलने लगे।
इसके अलावा, असम कृषि विश्वविद्यालय के NEEDHub, IIM Calcutta और National Rural Economic Transformation Project (NRETP) जैसी संस्थाओं से उन्हें कुल 27.50 लाख रुपये का बिजनेस ग्रांट भी मिला। इस आर्थिक मदद से उन्होंने अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का विस्तार किया और नए प्रोडक्ट लॉन्च किए।
राष्ट्रीय स्तर पर मिला सम्मान

कनिका की मेहनत और इनोवेशन को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। साल 2019 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया।
यह सम्मान उनके लिए सिर्फ एक अवॉर्ड नहीं था, बल्कि इस बात का प्रमाण था कि छोटे गांव से शुरू हुआ उनका प्रयास अब देशभर में पहचान बना चुका है।
हर महीने 70 टन खाद का उत्पादन
आज कनिका करीब 1.5 बीघा जमीन पर अपने पूरे कारोबार को व्यवस्थित तरीके से संभाल रही हैं। उनकी यूनिट में हर महीने लगभग 70 टन वर्मीकम्पोस्ट तैयार किया जा रहा है।
इसके लिए रोजाना गोबर, केले के पत्ते और जलकुंभी जैसे कच्चे माल का इंतजाम किया जाता है। उनकी खाद की सप्लाई नर्सरियों, कृषि दुकानों और सीधे ग्राहकों तक की जा रही है। उन्होंने ऐसा प्राइसिंग मॉडल तैयार किया है जिसमें थोक खरीदारों को खाद 10 रुपये प्रति किलो तक मिलती है, जबकि छोटे पैकेट 150 रुपये तक में बेचे जाते हैं।
सालाना टर्नओवर पहुंचा ₹75 लाख
कभी सिर्फ 500 रुपये से शुरू हुआ यह छोटा प्रयास अब 70 से 75 लाख रुपये सालाना टर्नओवर वाले बिजनेस में बदल चुका है। सबसे खास बात यह है कि कनिका ने यह सफलता बिना किसी बड़े इंडस्ट्रियल सेटअप के हासिल की है। उनका कारोबार ग्रामीण मॉडल पर आधारित है, जिसमें स्थानीय संसाधनों और महिलाओं की भागीदारी को प्राथमिकता दी जाती है।
अब क्या है आगे का प्लान?
कनिका भविष्य में अपनी उत्पादन क्षमता और बढ़ाना चाहती हैं। इसके साथ ही वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने और ज्यादा से ज्यादा ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देने पर भी काम कर रही हैं।
उनका लक्ष्य सिर्फ बिजनेस बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों को टिकाऊ और जैविक खेती की ओर प्रेरित करना भी है।
महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं कनिका
कनिका तालुकदार की कहानी यह साबित करती है कि सीमित पढ़ाई, आर्थिक तंगी और पारिवारिक मुश्किलें किसी इंसान की सफलता को रोक नहीं सकतीं। सही दिशा, मेहनत और धैर्य के दम पर छोटे गांव से भी बड़ा कारोबार खड़ा किया जा सकता है।
आज उनकी सफलता उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो मुश्किल परिस्थितियों में भी आत्मनिर्भर बनने का सपना देखती हैं।
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