Highlights
- रुपये को संभालने के लिए RBI कई बड़े कदमों पर कर रहा विचार
- ब्याज दरें बढ़ाने से EMI और लोन महंगे हो सकते हैं
- NRI डॉलर डिपॉजिट और करेंसी स्वैप से विदेशी मुद्रा बढ़ाने की तैयारी
नई दिल्ली। भारतीय रुपये में लगातार जारी कमजोरी अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए बड़ी चिंता बनती जा रही है। डॉलर के मुकाबले रुपया इस हफ्ते करीब 97 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया, जिसके बाद केंद्रीय बैंक एक्शन मोड में दिखाई दे रहा है। मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, RBI अब रुपये को संभालने के लिए “3 in 1” रणनीति पर काम कर सकता है। इसमें ब्याज दरों में बढ़ोतरी, करेंसी स्वैप का दायरा बढ़ाना और विदेशों से डॉलर जुटाने जैसे कदम शामिल हैं।
सूत्रों के मुताबिक RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों ने हाल के दिनों में कई आंतरिक बैठकें की हैं। इन बैठकों में चर्चा का मुख्य मुद्दा यही रहा कि रुपये की गिरावट को कैसे रोका जाए और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव को कैसे कम किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर महंगाई, पेट्रोल-डीजल कीमतों और आम लोगों की जेब पर साफ दिखाई दे सकता है।
आखिर क्यों टूट रहा है रुपया?
पिछले कुछ महीनों में वैश्विक परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। जब डॉलर महंगा होता है तो भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
इसके अलावा विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से पैसा निकालने का असर भी रुपये पर पड़ा है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने के कारण कई विदेशी निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर जा रहे हैं। इससे भारतीय शेयर बाजार और मुद्रा दोनों पर दबाव बढ़ा है।
क्या है RBI का ‘3 in 1’ प्लान?
1. ब्याज दरों में बढ़ोतरी
RBI के सामने सबसे बड़ा विकल्प रेपो रेट बढ़ाने का है। अगर केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाता है तो बैंक लोन महंगे हो सकते हैं। इसका सीधा असर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की EMI पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऊंची ब्याज दरें विदेशी निवेशकों को आकर्षित करती हैं क्योंकि उन्हें बेहतर रिटर्न मिलता है। इससे डॉलर का प्रवाह बढ़ सकता है और रुपये को समर्थन मिल सकता है।
हालांकि इसका नकारात्मक असर आम लोगों और कारोबार पर पड़ सकता है। EMI बढ़ने से खर्च कम हो सकता है और अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
2. करेंसी स्वैप बढ़ाने की तैयारी
RBI पहले ही बैंकिंग सिस्टम में 5 अरब डॉलर की नकदी डालने का एलान कर चुका है। इसके तहत 26 मई को डॉलर-रुपये खरीद-बिक्री स्वैप नीलामी आयोजित की जाएगी।
करेंसी स्वैप क्या होता है?
इस प्रक्रिया में RBI बैंकों को डॉलर उपलब्ध कराता है और बदले में रुपये लेता है। इससे बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है और रुपये पर दबाव कम करने में मदद मिलती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक RBI इस कदम के जरिए विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा प्रभावित किए बिना बाजार में स्थिरता बनाए रखना चाहता है।
3. NRI से डॉलर जुटाने की योजना
RBI का तीसरा बड़ा प्लान अनिवासी भारतीयों (NRI) से डॉलर जुटाने का है। इसके लिए विशेष जमा योजनाएं लाई जा सकती हैं, जिनमें बेहतर ब्याज दरें दी जाएंगी ताकि विदेशों में रहने वाले भारतीय ज्यादा डॉलर भारत भेजें।
सूत्रों के मुताबिक RBI को उम्मीद है कि इस बार ऐसी योजनाओं से करीब 50 अरब डॉलर तक जुटाए जा सकते हैं। यह रकम 2013 के टेपर टैंट्रम संकट के दौरान आए लगभग 30 अरब डॉलर से काफी ज्यादा हो सकती है।
2013 जैसा संकट दोहराने से बचना चाहता है RBI
मौजूदा स्थिति की तुलना 2013 के “टेपर टैंट्रम” दौर से की जा रही है। उस समय अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा प्रोत्साहन पैकेज कम करने के संकेतों से दुनियाभर के उभरते बाजारों में भारी बिकवाली हुई थी। भारत का रुपया भी तेजी से टूटा था।
तब RBI ने NRI डिपॉजिट स्कीम और डॉलर जुटाने जैसे कई कदम उठाए थे, जिससे विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ा और रुपये को स्थिरता मिली थी। अब एक बार फिर केंद्रीय बैंक उसी तरह के विकल्पों पर विचार करता दिख रहा है।
आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
अगर RBI सख्त कदम उठाता है तो इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
EMI बढ़ सकती है
अगर रेपो रेट बढ़ता है तो: होम लोन महंगा होगा, कार लोन की किस्त बढ़ेगी, पर्सनल लोन महंगे होंगे
महंगाई बढ़ने का खतरा
कमजोर रुपया मतलब: पेट्रोल-डीजल महंगा, LPG और CNG महंगी, आयातित सामान की कीमतों में उछाल, इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल महंगे
शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव
रुपये में गिरावट और ब्याज दरों में बढ़ोतरी से शेयर बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। खासकर बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट सेक्टर पर दबाव देखने को मिल सकता है।
सरकार के सामने क्या चुनौती?
सरकार और RBI के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रुपये को स्थिर भी रखा जाए और आर्थिक विकास की रफ्तार भी धीमी न पड़े। अगर ब्याज दरें ज्यादा बढ़ाई जाती हैं तो निवेश और खपत दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
इसके साथ ही भारत को तेल आयात बिल, विदेशी निवेश और चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) पर भी नजर रखनी होगी। आने वाले हफ्तों में पश्चिम एशिया की स्थिति और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति भी रुपये की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।
क्या 5 जून की RBI पॉलिसी में बड़ा फैसला संभव?
अब बाजार की नजर 5 जून को होने वाली RBI मॉनेटरी पॉलिसी बैठक पर है। कई विशेषज्ञ मान रहे हैं कि केंद्रीय बैंक रुपये को संभालने के लिए कड़ा रुख अपना सकता है। हालांकि RBI की कोशिश होगी कि बाजार में घबराहट न फैले और धीरे-धीरे स्थिरता लाई जाए।
अगर रुपये में गिरावट जारी रहती है तो आने वाले दिनों में आम लोगों को महंगी EMI, बढ़ती महंगाई और महंगे आयात का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में RBI का यह “3 in 1” प्लान आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है।
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