Salary Hike News
देशभर की कई प्राइवेट कंपनियों में इन दिनों अप्रेजल सीजन चल रहा है। कर्मचारियों को 8%, 10% या 15% तक की सैलरी बढ़ोतरी के लेटर मिल रहे हैं, लेकिन जब महीने के अंत में बैंक खाते में पैसा पहुंच रहा है तो कई लोग हैरान रह जा रहे हैं। कागजों पर बढ़ी हुई सैलरी और अकाउंट में आने वाली रकम के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
कई कर्मचारियों की शिकायत है कि CTC बढ़ने के बावजूद उनकी इन-हैंड सैलरी उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी। इसकी सबसे बड़ी वजह नए लेबर कोड और सैलरी स्ट्रक्चर में हुए बदलाव को माना जा रहा है। खासकर बेसिक सैलरी को कुल CTC का 50% करने के नियम ने कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी का पूरा गणित बदल दिया है।
आखिर क्यों कम हो रही इन-हैंड सैलरी?
पहले ज्यादातर कंपनियां कर्मचारियों की बेसिक सैलरी कम रखती थीं और बाकी रकम HRA, स्पेशल अलाउंस, मोबाइल बिल, ट्रैवल अलाउंस और अन्य भत्तों के रूप में देती थीं। इससे कर्मचारियों को हर महीने ज्यादा टेक-होम सैलरी मिल जाती थी क्योंकि PF कटौती कम होती थी। लेकिन नए वेज कोड (New Wage Code) के तहत कंपनियों के लिए बेसिक पे को कुल CTC का कम से कम 50% रखना जरूरी माना जा रहा है। इसका सीधा असर PF और ग्रेच्युटी जैसी कटौतियों पर पड़ा है।
उदाहरण के तौर पर अगर किसी कर्मचारी की मासिक सैलरी ₹50,000 है, तो नए नियम के अनुसार लगभग ₹25,000 बेसिक सैलरी रखनी पड़ सकती है। जैसे ही बेसिक बढ़ती है, PF कटौती भी बढ़ जाती है और हाथ में आने वाला पैसा घट जाता है।
पहले और अब में क्या फर्क आया?
पहले कंपनियां इस तरह का स्ट्रक्चर बनाती थीं:
| सैलरी कंपोनेंट | पुराना स्ट्रक्चर |
|---|---|
| बेसिक सैलरी | कम |
| अलाउंस | ज्यादा |
| PF कटौती | कम |
| टेक-होम सैलरी | ज्यादा |
अब नया सिस्टम कुछ इस तरह काम कर रहा है:
| सैलरी कंपोनेंट | नया स्ट्रक्चर |
|---|---|
| बेसिक सैलरी | ज्यादा |
| अलाउंस | कम |
| PF कटौती | ज्यादा |
| टेक-होम सैलरी | कम |
यानी CTC बढ़ने के बावजूद हर महीने मिलने वाला पैसा उतना तेजी से नहीं बढ़ रहा जितनी उम्मीद कर्मचारी कर रहे थे।
PF और ग्रेच्युटी में होगा बड़ा फायदा
हालांकि टेक-होम सैलरी में कमी कर्मचारियों को फिलहाल परेशान कर सकती है, लेकिन लंबे समय में इसका फायदा भी बड़ा माना जा रहा है। कर्मचारी भविष्य निधि (PF) की गणना बेसिक सैलरी के आधार पर होती है। कर्मचारी और कंपनी दोनों बेसिक पे का 12% PF में जमा करते हैं। ऐसे में बेसिक बढ़ने का मतलब है कि हर महीने PF अकाउंट में ज्यादा रकम जमा होगी।
उदाहरण के लिए पहले बेसिक ₹15,000 थी तो PF योगदान कम था। अब बेसिक ₹25,000 होने पर PF योगदान काफी बढ़ जाएगा। इससे रिटायरमेंट फंड मजबूत होगा और लंबे समय में बड़ी बचत तैयार हो सकेगी।
ग्रेच्युटी पर भी पड़ेगा असर
ग्रेच्युटी का कैलकुलेशन भी बेसिक सैलरी के आधार पर किया जाता है। अगर कोई कर्मचारी किसी कंपनी में 5 साल या उससे ज्यादा समय तक काम करता है, तो उसे ग्रेच्युटी मिलती है। बेसिक सैलरी ज्यादा होने पर ग्रेच्युटी की रकम भी बढ़ जाती है। यानी जिन कर्मचारियों का करियर लंबा है, उनके लिए नया सैलरी स्ट्रक्चर भविष्य में फायदे का सौदा साबित हो सकता है।
कंपनियां क्यों बदल रही हैं सैलरी स्ट्रक्चर?
HR एक्सपर्ट्स के मुताबिक कई कंपनियां धीरे-धीरे नए लेबर कोड के हिसाब से अपने पे-रोल सिस्टम को अपडेट कर रही हैं।
इसके पीछे मुख्य कारण हैं भविष्य में कानूनी विवाद से बचना, PF और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना, कर्मचारियों के रिटायरमेंट बेनिफिट बढ़ाना, वेज स्ट्रक्चर को पारदर्शी बनाना हालांकि सभी कंपनियों ने अभी तक पूरी तरह नया सिस्टम लागू नहीं किया है, लेकिन बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां अपने सैलरी मॉडल में बदलाव शुरू कर चुकी हैं।
क्या सभी कर्मचारियों की सैलरी प्रभावित होगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन कर्मचारियों की सैलरी स्ट्रक्चर में अलाउंस का हिस्सा ज्यादा था, उन पर इसका सबसे अधिक असर दिखाई देगा। मिड-लेवल और IT सेक्टर के कर्मचारियों में यह बदलाव ज्यादा महसूस किया जा रहा है क्योंकि इन सेक्टर्स में पहले टेक-होम बढ़ाने के लिए अलग-अलग अलाउंस का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता था।
कर्मचारियों को क्या करना चाहिए?
अगर अप्रेजल के बाद इन-हैंड सैलरी उम्मीद से कम आई है तो कर्मचारियों को केवल टेक-होम देखकर परेशान नहीं होना चाहिए। उन्हें पूरा सैलरी ब्रेकअप समझना जरूरी है। इन बातों पर ध्यान देना चाहिए:
- बेसिक सैलरी कितनी बढ़ी
- PF योगदान कितना बढ़ा
- ग्रेच्युटी बेनिफिट क्या होगा
- टैक्स स्लैब में बदलाव हुआ या नहीं
- कुल वार्षिक बचत कितनी बनेगी
कई मामलों में इन-हैंड कम होने के बावजूद कुल लॉन्ग-टर्म बेनिफिट पहले से बेहतर हो सकते हैं।
क्या नया लेबर कोड पूरी तरह लागू हो चुका है?
केंद्र सरकार ने नए लेबर कोड्स को पहले ही नोटिफाई कर दिया है, लेकिन सभी राज्यों में इसे पूरी तरह लागू करने की प्रक्रिया अभी जारी है। इसके बावजूद कई कंपनियां पहले से ही नए नियमों के अनुरूप सैलरी स्ट्रक्चर तैयार कर रही हैं ताकि भविष्य में बड़े बदलाव अचानक न करने पड़ें।
निष्कर्ष
अप्रेजल के बाद सैलरी स्लिप देखकर खुश होने वाले कर्मचारियों को इस बार बैंक अकाउंट में रकम देखकर झटका लग सकता है। लेकिन इसके पीछे सिर्फ कंपनी की कटौती नहीं बल्कि बदलता हुआ लेबर सिस्टम भी जिम्मेदार है।
नया वेज कोड फिलहाल टेक-होम सैलरी को थोड़ा कम जरूर कर सकता है, लेकिन PF, ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट सेविंग्स को मजबूत बनाकर यह कर्मचारियों की भविष्य की आर्थिक सुरक्षा बढ़ाने का काम भी करेगा।
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