अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया सोमवार को बड़ी गिरावट के साथ अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 54 पैसे टूटकर 96.35 प्रति डॉलर (अस्थायी) पर बंद हुआ। इससे पहले कारोबार के दौरान यह 96.39 तक फिसल गया था। लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में आई इस भारी कमजोरी ने बाजार में चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि इसका असर सिर्फ विदेशी व्यापार तक सीमित नहीं रहता बल्कि पेट्रोल-डीजल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और आम लोगों की रोजमर्रा की लागत पर भी पड़ता है।
विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि इस बार रुपये पर दबाव सिर्फ एक वजह से नहीं आया, बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारकों ने मिलकर भारतीय मुद्रा को कमजोर किया है। अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की रिकॉर्ड कीमतें, मजबूत डॉलर और वैश्विक अनिश्चितता ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को दबाव में डाल दिया है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, उन पर इसका असर और ज्यादा दिखाई देता है।
क्यों टूटा रुपया?
रुपये में गिरावट की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज तेजी मानी जा रही है। ब्रेंट क्रूड सोमवार को 109.97 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। भारत अपनी जरूरत का करीब 85-90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में जब तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
इसके अलावा अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजार में डर का माहौल बना दिया है। निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड जैसी सुरक्षित परिसंपत्तियों की तरफ जा रहे हैं। इसका असर भारतीय मुद्रा समेत ज्यादातर एशियाई मुद्राओं पर पड़ा है।
मिराए एसेट शेयरखान के शोध विश्लेषक अनुज चौधरी के मुताबिक मजबूत डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में तेजी के कारण रुपये में कमजोरी बनी रह सकती है। उन्होंने कहा कि विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां और भू-राजनीतिक तनाव आने वाले दिनों में भी रुपये की दिशा तय करेंगे।
डॉलर क्यों हो रहा मजबूत?
दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की स्थिति बताने वाला डॉलर इंडेक्स 99.14 के आसपास बना हुआ है। हालांकि इसमें हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन बाजार में डॉलर की सुरक्षित निवेश वाली छवि अभी भी मजबूत बनी हुई है।
जब दुनिया में युद्ध, राजनीतिक संकट या आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक डॉलर खरीदना शुरू कर देते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और अन्य देशों की मुद्राएं कमजोर पड़ने लगती हैं। यही वजह है कि रुपया लगातार दबाव में दिखाई दे रहा है।
आम आदमी पर क्या पड़ेगा असर?
रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। अगर रुपया लगातार गिरता है तो भारत के लिए आयात महंगा हो जाता है। इसका असर कई क्षेत्रों में दिखाई देता है।
पेट्रोल-डीजल हो सकते हैं महंगे
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। डॉलर महंगा और रुपया कमजोर होने पर तेल कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल की कीमतें बढ़ सकती हैं
मोबाइल, लैपटॉप, चिप्स और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बड़ा हिस्सा आयात होता है। कमजोर रुपया इन उत्पादों को महंगा बना सकता है।
विदेश में पढ़ाई और यात्रा होगी महंगी
जो छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं या विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं, उन्हें ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं क्योंकि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो चुका है।
सोना भी हो सकता है महंगा
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातकों में शामिल है। डॉलर मजबूत होने और रुपया कमजोर होने से सोने की घरेलू कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है।
क्या RBI संभाल पाएगा स्थिति?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जरूरत पड़ने पर बाजार में डॉलर बेचकर रुपये को समर्थन दे सकता है। RBI पहले भी कई बार विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर चुका है ताकि रुपये में अत्यधिक गिरावट को रोका जा सके।
हालांकि राहत की बात यह है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत बना हुआ है। RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 8 मई को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.29 अरब डॉलर बढ़कर 696.98 अरब डॉलर पहुंच गया। मजबूत फॉरेक्स रिजर्व RBI को बाजार में हस्तक्षेप करने की क्षमता देता है।
क्या आगे और गिरेगा रुपया?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती और वैश्विक तनाव कम नहीं होता, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि डॉलर के मुकाबले रुपया निकट भविष्य में 96 से 96.60 के दायरे में कारोबार कर सकता है।
अगर पश्चिम एशिया संकट और गहराता है या अमेरिकी फेडरल रिजर्व सख्त रुख बनाए रखता है, तो उभरते बाजारों की मुद्राओं में और कमजोरी देखी जा सकती है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों को इस समय घबराने के बजाय संतुलित रणनीति अपनानी चाहिए। आयात-आधारित कंपनियों के शेयरों पर दबाव रह सकता है, जबकि आईटी और निर्यात आधारित कंपनियों को कमजोर रुपये से फायदा हो सकता है क्योंकि उन्हें डॉलर में कमाई होती है।
वहीं, आम निवेशकों को वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों और RBI की नीतियों पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
निष्कर्ष
रुपये का 96.35 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचना सिर्फ मुद्रा बाजार की खबर नहीं है, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ते वैश्विक दबाव का संकेत भी है। तेल की ऊंची कीमतें, पश्चिम एशिया तनाव और मजबूत डॉलर फिलहाल रुपये के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। आने वाले दिनों में RBI की रणनीति और अंतरराष्ट्रीय हालात तय करेंगे कि रुपया संभलता है या दबाव और बढ़ता है।
Also Read:


