भारतीय मुद्रा रुपये पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सोमवार 18 मई को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.20 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। यह भारतीय करेंसी का अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव ने रुपये की कमजोरी को और बढ़ा दिया है।
पिछले कुछ हफ्तों से रुपये में लगातार गिरावट देखी जा रही थी, लेकिन अब हालात ज्यादा गंभीर होते नजर आ रहे हैं। शुक्रवार को रुपया पहली बार 96 के पार गया था और सोमवार को यह और टूट गया। इससे पहले भारतीय मुद्रा लंबे समय तक 83-84 के दायरे में बनी हुई थी, लेकिन वैश्विक हालात और घरेलू आर्थिक दबावों ने इसकी स्थिति कमजोर कर दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तनाव और तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो आने वाले दिनों में रुपया और दबाव में आ सकता है। इसका असर सिर्फ विदेशी व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम लोगों की जेब पर भी दिखाई देगा।
पिछले हफ्ते पहली बार 96 के पार गया था रुपया
विदेशी मुद्रा बाजार में शुक्रवार को रुपया 96.14 प्रति डॉलर तक टूट गया था और कारोबार के अंत में 95.97 पर बंद हुआ। सोमवार को बाजार खुलते ही इसमें फिर कमजोरी देखने को मिली और यह 96.20 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया।
माना जा रहा है कि मध्य-पूर्व में तेजी से बिगड़ते हालात ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश विकल्पों की तरफ धकेल दिया है। ऐसे समय में दुनियाभर के निवेशक अमेरिकी डॉलर को सबसे सुरक्षित मुद्रा मानते हैं, जिसकी वजह से डॉलर की मांग बढ़ रही है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है।
रुपये में गिरावट की 3 सबसे बड़ी वजहें
1. कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल
रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी मानी जा रही है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 111 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
बताया जा रहा है कि संयुक्त अरब अमीरात में एक न्यूक्लियर पावर प्लांट पर हमले की खबर के बाद तेल बाजार में घबराहट बढ़ गई। इसके अलावा ईरान को लेकर अमेरिका के संभावित सैन्य विकल्पों की चर्चाओं ने भी बाजार में तनाव बढ़ा दिया है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर हो जाता है।
तेल की कीमतों में तेजी का असर सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता। इससे पेट्रोल-डीजल, गैस, ट्रांसपोर्ट और महंगाई पर भी असर पड़ता है।
2. मध्य-पूर्व संकट और वैश्विक अनिश्चितता
रुपये पर दबाव बढ़ाने वाली दूसरी बड़ी वजह मध्य-पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। ईरान, अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में डर का माहौल पैदा कर दिया है।
जब दुनिया में युद्ध या संघर्ष की स्थिति बनती है तो निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालने लगते हैं। भारत जैसे उभरते बाजारों से विदेशी निवेश निकलने लगता है और पैसा अमेरिकी डॉलर जैसी सुरक्षित संपत्तियों में जाता है।
इसी वजह से भारतीय शेयर बाजार में भी दबाव देखा जा रहा है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ने से डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर मध्य-पूर्व संकट लंबा खिंचता है तो इसका असर सिर्फ रुपये पर ही नहीं बल्कि पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
3. बढ़ता व्यापार घाटा और कमजोर कैपिटल इंफ्लो
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय बढ़ते व्यापार घाटे और कमजोर विदेशी निवेश जैसी चुनौतियों का भी सामना कर रही है। जब किसी देश का आयात उसके निर्यात से ज्यादा होता है तो उसे व्यापार घाटा कहा जाता है। भारत का तेल आयात बिल बढ़ने से व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। दूसरी तरफ विदेशी निवेश की रफ्तार कमजोर पड़ने से डॉलर की सप्लाई कम हो रही है।
यही वजह है कि रुपये पर दोहरा दबाव बन रहा है डॉलर की मांग बढ़ रही है लेकिन डॉलर की आवक कमजोर है इस स्थिति में करेंसी बाजार में असंतुलन पैदा होता है और रुपया कमजोर हो जाता है।
रुपये की गिरावट क्यों है चिंताजनक?
रुपये में लगातार गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है। कमजोर रुपया कई मोर्चों पर असर डालता है।
1. महंगाई बढ़ सकती है
भारत बड़ी मात्रा में तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कई जरूरी सामान आयात करता है। रुपया कमजोर होने पर इन चीजों का आयात महंगा हो जाता है। इससे कंपनियों की लागत बढ़ती है और अंत में इसका बोझ आम लोगों पर पड़ता है।
2. पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं
अगर कच्चा तेल महंगा बना रहा और रुपया कमजोर रहा, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
3. विदेशी पढ़ाई और यात्रा महंगी होगी
कमजोर रुपये का असर उन लोगों पर भी पड़ता है जो विदेश में पढ़ाई करते हैं या विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं। डॉलर महंगा होने से फीस, होटल, टिकट और दूसरे खर्च बढ़ जाते हैं।
4. कंपनियों पर बढ़ेगा दबाव
जिन भारतीय कंपनियों ने विदेशी मुद्रा में कर्ज लिया हुआ है, उनके लिए भुगतान महंगा हो जाएगा। इससे कॉर्पोरेट सेक्टर पर भी असर पड़ सकता है।
सरकार और RBI क्या कर रहे हैं?
रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों सक्रिय नजर आ रहे हैं।
RBI का हस्तक्षेप
भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचकर रुपये को सहारा देने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा बैंकों की ‘नेट ओपन पोजिशन’ से जुड़े नियमों को भी सख्त किया गया है ताकि अत्यधिक सट्टेबाजी को रोका जा सके।
आयात पर नियंत्रण
सरकार ने कीमती धातुओं के आयात पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। चांदी के कई आयातों पर रोक लगाने का फैसला भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, ताकि डॉलर की मांग को सीमित किया जा सके।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में रुपया काफी हद तक तीन चीजों पर निर्भर करेगा मध्य-पूर्व संकट की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति अगर तेल की कीमतें और बढ़ती हैं या भू-राजनीतिक तनाव गहराता है, तो रुपया और कमजोर हो सकता है। वहीं अगर हालात सामान्य होते हैं और विदेशी निवेश वापस लौटता है, तो भारतीय मुद्रा को कुछ राहत मिल सकती है। फिलहाल बाजार की नजर RBI की रणनीति और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर बनी हुई है।
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