दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और रुपये पर दबाव ने भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे समय में मोनाको की एक कंपनी ने ऐसी तकनीक पेश की है, जिसने ऊर्जा क्षेत्र में नई बहस छेड़ दी है। दावा है कि इस तकनीक की मदद से पानी का उपयोग कर भारी मशीनों और औद्योगिक इंजनों में 10 प्रतिशत तक ईंधन बचाया जा सकता है।
मोनाको स्थित कंपनी फोवे इको सॉल्यूशंस (FOWE Eco Solutions) ने अपनी पेटेंटेड “कैविटेक फ्यूल इमल्शन” तकनीक पेश की है। कंपनी के मुताबिक यह तकनीक ईंधन के साथ पानी की बेहद सूक्ष्म बूंदों को मिलाकर दहन प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाती है। इससे न केवल ईंधन की खपत घटती है बल्कि प्रदूषण में भी उल्लेखनीय कमी आती है।
आखिर पानी से ईंधन कैसे बच सकता है?
पहली नजर में यह विचार अजीब लग सकता है, क्योंकि आम तौर पर माना जाता है कि ईंधन में पानी जाने से इंजन खराब हो सकता है। लेकिन इस तकनीक का सिद्धांत पारंपरिक सोच से बिल्कुल अलग है।
कंपनी के मुख्य परिचालन अधिकारी हेमंत सोंधी के अनुसार, इस तकनीक में “कंट्रोल्ड कैविटेशन टेक्नोलॉजी” यानी CCT का उपयोग किया जाता है। इसमें बिना किसी रासायनिक पदार्थ के ईंधन और पानी का अत्यंत महीन मिश्रण तैयार किया जाता है। पानी की बूंदें इतनी सूक्ष्म होती हैं कि वे ईंधन के भीतर समान रूप से फैल जाती हैं।
जब यह मिश्रण इंजन के अंदर अत्यधिक तापमान पर पहुंचता है, तब पानी की सूक्ष्म बूंदें तेजी से भाप में बदलती हैं और “माइक्रो एक्सप्लोजन” यानी सूक्ष्म विस्फोट पैदा करती हैं। इन विस्फोटों की वजह से ईंधन की बड़ी बूंदें और छोटे कणों में टूट जाती हैं, जिससे उनका दहन अधिक प्रभावी तरीके से होता है।
यानी सामान्य ईंधन की तुलना में अधिक संपूर्ण दहन होता है और कम ईंधन में अधिक ऊर्जा पैदा होती है।
क्या यह सिर्फ दावा है या परीक्षण भी सफल रहे?
ऊर्जा क्षेत्र में नई तकनीकों को लेकर अक्सर बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन उनकी विश्वसनीयता परीक्षणों से तय होती है। फोवे इको सॉल्यूशंस का कहना है कि इस तकनीक की टेस्टिंग कई स्वतंत्र प्रयोगशालाओं और औद्योगिक इकाइयों में की जा चुकी है।
डेनमार्क की अल्फा लावल प्रयोगशाला में हुए परीक्षणों के दौरान बॉयलर सिस्टम में 6.3 प्रतिशत तक ईंधन बचत दर्ज की गई। वहीं समुद्री जहाजों के बड़े इंजनों में 8.7 प्रतिशत तक ईंधन खपत घटने का दावा किया गया।
भारत में भी इस तकनीक की सीमित स्तर पर टेस्टिंग की गई। कंपनी के मुताबिक:
- एक सरकारी रिफाइनरी की बिजली उत्पादन इकाई में 3.6 प्रतिशत ईंधन बचत हुई।
- एक बड़े स्टील प्लांट में 5 प्रतिशत तक ईंधन खपत कम हुई।
- प्रदूषण के स्तर में लगभग 40 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि इन दावों की व्यापक औद्योगिक स्तर पर स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, लेकिन शुरुआती परिणामों ने ऊर्जा उद्योग का ध्यान जरूर खींचा है।
इंजन बदले बिना कैसे लागू होगी तकनीक?
नई औद्योगिक तकनीकों की सबसे बड़ी चुनौती उनका महंगा और जटिल इन्फ्रास्ट्रक्चर होता है। कई कंपनियां इसलिए नई तकनीक अपनाने से बचती हैं क्योंकि उन्हें पूरे प्लांट या मशीनरी में बदलाव करना पड़ता है।
फोवे इको सॉल्यूशंस का कहना है कि उनकी तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसे मौजूदा इंजनों में बड़े बदलाव के बिना इस्तेमाल किया जा सकता है। कंपनी का दावा है कि:
- पुराने इंजनों को हटाने की जरूरत नहीं होगी।
- प्लांट बंद करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
- सिस्टम को मौजूदा ईंधन सप्लाई के साथ जोड़ा जा सकेगा।
यदि यह दावा बड़े स्तर पर सही साबित होता है, तो यह तकनीक भारी उद्योगों के लिए आकर्षक विकल्प बन सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह तकनीक?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातक देशों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। हर साल इसके लिए अरबों डॉलर खर्च होते हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तब उसका असर सीधे तौर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत, महंगाई, उद्योगों के उत्पादन खर्च,और रुपये की स्थिति पर पड़ता है।
अगर औद्योगिक स्तर पर 5-10 प्रतिशत तक भी ईंधन बचत संभव हो जाती है, तो इसका असर केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भारत का आयात बिल कम हो सकता है और विदेशी मुद्रा पर दबाव भी घट सकता है।
क्या इससे प्रदूषण भी कम होगा?
यह तकनीक सिर्फ ईंधन बचत तक सीमित नहीं है। कंपनी का दावा है कि अधिक प्रभावी दहन के कारण धुएं और प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है। विशेषज्ञों के अनुसार अधूरा दहन ही भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण की बड़ी वजह होता है। यदि ईंधन पूरी तरह जलता है तो कार्बन कण कम निकलते हैं, धुआं घटता है, और इंजन की कार्यक्षमता बढ़ती है।
भारत जैसे देशों में, जहां उद्योगों और डीजल आधारित मशीनों से प्रदूषण बड़ी समस्या है, वहां ऐसी तकनीक पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
समुद्री जहाजों और भारी उद्योगों में सबसे ज्यादा उपयोग
ऊर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की तकनीक का सबसे बड़ा उपयोग उन क्षेत्रों में हो सकता है जहां ईंधन खपत अत्यधिक होती है। जैसे समुद्री जहाज, स्टील उद्योग, सीमेंट प्लांट, थर्मल पावर यूनिट, भारी डीजल जनरेटर, और बड़ी औद्योगिक मशीनें।
समुद्री परिवहन उद्योग पर वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन घटाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में यदि यह तकनीक जहाजों में ईंधन बचत और उत्सर्जन दोनों कम करती है, तो इसकी मांग बढ़ सकती है।
क्या यह तकनीक पूरी तरह सुरक्षित है?
हालांकि शुरुआती नतीजे उत्साहजनक बताए जा रहे हैं, लेकिन किसी भी नई ईंधन तकनीक को लेकर कुछ महत्वपूर्ण सवाल बने रहते हैं:
- लंबे समय में इंजन पर क्या असर पड़ेगा?
- क्या सभी प्रकार के ईंधनों में यह समान रूप से काम करेगी?
- रखरखाव की लागत कितनी होगी?
- बड़े पैमाने पर इसकी विश्वसनीयता कैसी रहेगी?
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापक औद्योगिक उपयोग से पहले कई वर्षों तक वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण जरूरी होंगे।
ऊर्जा संकट के दौर में बढ़ सकती है ऐसी तकनीकों की मांग
दुनिया इस समय ऊर्जा संक्रमण के दौर से गुजर रही है। एक तरफ इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रीन एनर्जी पर जोर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारी उद्योग अभी भी तेल और डीजल पर निर्भर हैं। ऐसे में ऐसी तकनीकें, जो मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ काम करते हुए ईंधन बचत और प्रदूषण नियंत्रण दोनों में मदद करें, आने वाले वर्षों में तेजी से लोकप्रिय हो सकती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई मंचों से ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और ईंधन आयात पर निर्भरता घटाने की बात कह चुके हैं। ऐसे में यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो यह भारत जैसे देशों के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों मोर्चों पर महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
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