भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एशियाई विकास बैंक (ADB) ने एक तरफ जहां मोदी सरकार के बड़े आर्थिक सुधारों की खुलकर तारीफ की है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशिया संकट और महंगे कच्चे तेल को लेकर गंभीर चेतावनी भी दी है। एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क का मानना है कि भारत आने वाले वर्षों में विदेशी निवेश आकर्षित करने की बड़ी क्षमता रखता है, लेकिन अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो इसका असर विकास दर, महंगाई और आम लोगों की जेब पर साफ दिखाई देगा।
नई दिल्ली में आयोजित एक आर्थिक चर्चा के दौरान पार्क ने कहा कि भारत सरकार द्वारा किए गए श्रम सुधार, जीएसटी लागू करना, कारोबारी माहौल सुधारना और मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर तेजी से काम करना देश को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बना रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ा जोखिम बन चुका है और भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा।
किन 2 बड़े फैसलों से खुश हुआ ADB?
एडीबी ने खास तौर पर मोदी सरकार के दो बड़े कदमों की सराहना की है। पहला, भारत द्वारा विभिन्न देशों के साथ तेजी से किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और दूसरा, जीएसटी तथा श्रम सुधार जैसे संरचनात्मक आर्थिक बदलाव।
अल्बर्ट पार्क ने कहा कि भारत लंबे समय तक ऊंचे आयात शुल्क और जटिल कारोबारी नियमों के कारण विदेशी कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण बाजार माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है।
भारत ने हाल के वर्षों में यूएई, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के साथ व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाया है। सरकार ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ भी बड़े एफटीए पर काम कर रही है। इसका फायदा यह होगा कि भारतीय कंपनियों को नए बाजार मिलेंगे और विदेशी कंपनियों को भारत में विनिर्माण बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
ADB का मानना है कि “चाइना प्लस वन” रणनीति के दौर में भारत के पास वैश्विक सप्लाई चेन का बड़ा केंद्र बनने का मौका है। पश्चिमी कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करना चाहती हैं और भारत खुद को वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
विदेशी निवेश में क्यों आई बड़ी गिरावट?
हालांकि एडीबी ने सुधारों की तारीफ की, लेकिन विदेशी निवेश के आंकड़ों को लेकर चिंता भी जताई। भारत में शुद्ध विदेशी निवेश (Net FDI) पिछले कुछ वर्षों में लगातार कमजोर हुआ है।
वित्त वर्ष 2021-22 में भारत में 38.6 अरब डॉलर का शुद्ध विदेशी निवेश आया था। लेकिन वित्त वर्ष 2023 में यह घटकर 28 अरब डॉलर रह गया। इसके बाद वित्त वर्ष 2024 में यह सिर्फ 10.2 अरब डॉलर तक सिमट गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि वित्त वर्ष 2025 में शुद्ध विदेशी निवेश घटकर करीब 1 अरब डॉलर रह गया। हालांकि अप्रैल-दिसंबर 2026 के दौरान इसमें हल्का सुधार देखने को मिला और यह बढ़कर 3 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता, ऊंची ब्याज दरें, भू-राजनीतिक तनाव और चीन समेत कई देशों की आर्थिक सुस्ती का असर विदेशी निवेश प्रवाह पर पड़ा है। इसके बावजूद भारत अभी भी एशिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
पश्चिम एशिया संकट क्यों बना भारत के लिए खतरा?
एडीबी की सबसे बड़ी चिंता पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इसमें भी अधिकांश तेल पश्चिम एशिया से आता है। ऐसे में यदि होर्मुज स्ट्रेट या प्रमुख सप्लाई रूट प्रभावित होते हैं तो भारत पर सीधा असर पड़ सकता है।
अल्बर्ट पार्क ने कहा कि एशियाई अर्थव्यवस्थाएं पश्चिम एशिया संकट के झटकों के प्रति अन्य क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील हैं। इसका कारण यह है कि एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं।
भारत के लिए खतरा सिर्फ तेल आपूर्ति तक सीमित नहीं है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो इससे:
- पेट्रोल और डीजल महंगे होंगे
- ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी
- खाद्य महंगाई बढ़ सकती है
- रुपया कमजोर हो सकता है
- चालू खाते का घाटा बढ़ेगा
- सरकार पर सब्सिडी का दबाव बढ़ेगा
यानी असर सीधे आम आदमी की जेब तक पहुंचेगा।
96 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है कच्चा तेल
एडीबी ने तेल की कीमतों को लेकर भी बड़ा अनुमान दिया है। पार्क के मुताबिक, 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 96 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। वहीं 2027 में यह करीब 80 डॉलर प्रति बैरल तक रह सकती है।
यह अनुमान इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि भारत जैसे देश के लिए हर 10 डॉलर की तेल कीमत बढ़ोतरी का असर महंगाई और राजकोषीय घाटे पर साफ दिखाई देता है।
यदि तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास लंबे समय तक बना रहता है तो सरकार को ईंधन टैक्स कम करना पड़ सकता है, तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा, एयरलाइंस और लॉजिस्टिक्स कंपनियों की लागत बढ़ेगी, शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है
GDP Growth पर कितना असर पड़ेगा?
एडीबी ने चेतावनी दी कि पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत की जीडीपी वृद्धि दर में करीब 0.6 प्रतिशत की कमी आ सकती है। यानी अगर अनुमानित वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत थी तो प्रभावी वृद्धि दर घटकर 6.3 प्रतिशत रह सकती है।
हालांकि यह दर अभी भी कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर है, लेकिन भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए यह गिरावट महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
ADB ने अप्रैल में अनुमान लगाया था कि:
- वित्त वर्ष 2026 में भारत की विकास दर 6.9% रह सकती है
- वित्त वर्ष 2027-28 में यह बढ़कर 7.3% तक जा सकती है
- घरेलू मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश इसमें बड़ी भूमिका निभाएंगे
लेकिन यदि भू-राजनीतिक संकट लंबा खिंचता है तो ये अनुमान बदल सकते हैं।
महंगाई पर भी बढ़ेगा दबाव
एडीबी ने साफ कहा कि चालू वित्त वर्ष में महंगाई अनुमान से ज्यादा बढ़ सकती है। अप्रैल में संस्था ने भारत में 4.5 प्रतिशत महंगाई का अनुमान लगाया था, लेकिन तेल और कमोडिटी कीमतों में तेजी से यह आंकड़ा ऊपर जा सकता है।
भारत में महंगाई बढ़ने का सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ता है क्योंकि रसोई गैस महंगी होती है, खाने-पीने का सामान महंगा होता है, बिजली और परिवहन लागत बढ़ती है यही वजह है कि सरकार के सामने विकास दर और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बनने वाला है।
भारत के लिए आगे क्या सबसे जरूरी?
एडीबी का मानना है कि भारत को सुधारों की गति बनाए रखनी होगी। सिर्फ एफटीए या जीएसटी काफी नहीं होंगे। आने वाले वर्षों में भारत को मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ानी होगी, निर्यात मजबूत करना होगा, ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करनी होगी, नवीकरणीय ऊर्जा पर निवेश बढ़ाना होगा, सप्लाई चेन मजबूत करनी होगी
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर भारत वैश्विक संकटों के बीच भी स्थिर विकास दर बनाए रखता है तो वह दुनिया की सबसे बड़ी निवेश मंजिलों में शामिल हो सकता है। लेकिन इसके लिए सिर्फ नीतिगत सुधार नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर तेज क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी होगा।
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