दुनिया की फैक्ट्रियां बदल रही हैं। अमेरिका-चीन तनाव, सप्लाई चेन संकट और बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच अब वैश्विक कंपनियां “China+1 Strategy” पर तेजी से काम कर रही हैं। यानी कंपनियां चीन पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय दूसरे देशों में भी मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार करना चाहती हैं। इस रेस में भारत को सबसे बड़े दावेदारों में माना जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत सच में चीन को चुनौती दे सकता है?
इसी मुद्दे पर जाने-माने अर्थशास्त्री और नीति आयोग के पूर्व सदस्य अरविंद विरमानी ने बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि भारत को चीन की हूबहू नकल करने की जरूरत नहीं है। भारत अपनी अलग रणनीति के जरिए भी चीन से मुकाबला कर सकता है।
नई दिल्ली में एनएनआई से बातचीत के दौरान विरमानी ने भारत की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति, विदेशी निवेश, टैक्स सिस्टम, पीएलआई स्कीम और राज्यों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने साफ कहा कि अगर भारत को वैश्विक सप्लाई चेन का बड़ा केंद्र बनना है तो सिर्फ घोषणाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीन पर तेज सुधार दिखाने होंगे।
China+1 Strategy आखिर है क्या?
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया की बड़ी कंपनियों ने महसूस किया कि चीन पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। कोविड महामारी, लॉकडाउन, अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर और ताइवान तनाव जैसे घटनाक्रमों ने ग्लोबल कंपनियों को झटका दिया।
इसी के बाद “China+1 Strategy” तेजी से लोकप्रिय हुई। इसका मतलब है कि कंपनियां चीन के अलावा कम से कम एक और देश में उत्पादन क्षमता विकसित करें ताकि संकट की स्थिति में सप्लाई चेन पूरी तरह प्रभावित न हो।
भारत, वियतनाम, मेक्सिको, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देश इस बदलाव का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि चीन पहले से ही विशाल मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बना चुका है।
“चीन जैसी फैक्ट्री नहीं चाहिए” — विरमानी

अरविंद विरमानी का सबसे बड़ा तर्क यही है कि भारत को चीन की 10,000 मजदूरों वाली विशाल फैक्ट्रियों की नकल करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर चीन की एक बड़ी फैक्ट्री में 10,000 कर्मचारी काम करते हैं तो भारत दो या तीन फैक्ट्रियों में 5,000-5,000 कर्मचारियों के जरिए भी वही प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकता है। यानी भारत का मॉडल अलग हो सकता है, लेकिन प्रभावी होना चाहिए।
यही वजह है कि विरमानी ने “1 के मुकाबले 3” वाली रणनीति समझाई। उनका मानना है कि भारत को छोटे लेकिन अधिक कुशल मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर विकसित करने चाहिए। इससे रोजगार भी बढ़ेगा और निवेश का जोखिम भी कम होगा।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में पीएलआई स्कीम, कॉरपोरेट टैक्स कटौती और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन विदेशी निवेशकों की कई शिकायतें अब भी बनी हुई हैं।
विरमानी के मुताबिक, भारत की टैक्स गवर्नेंस व्यवस्था अभी भी विदेशी कंपनियों के लिए चिंता का विषय है। इसमें इनकम टैक्स विवाद, जीएसटी की जटिलता और लंबे समय तक चलने वाले केस शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि जब एक विदेशी निवेशक दूसरे निवेशक से बात करता है और सुनता है कि उसका टैक्स विवाद 15-20 साल से अटका हुआ है, तो यह भारत की छवि को नुकसान पहुंचाता है। निवेशक स्थिरता और पूर्वानुमान चाहते हैं। अगर नीति स्पष्ट न हो या विवाद जल्दी न सुलझें तो कंपनियां निवेश से बचती हैं।
भारत की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार और युवा आबादी है। चीन की तुलना में भारत में श्रम लागत कई सेक्टर में कम है। इसके अलावा भारत के पास डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, आईटी क्षमता और लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसी खूबियां भी हैं।
Apple, Samsung, Foxconn, Dixon Technologies और Tata Electronics जैसी कंपनियां पहले ही भारत में बड़े निवेश कर रही हैं। मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में भारत तेजी से उभरा है। सरकार का दावा है कि भारत अब दुनिया के प्रमुख स्मार्टफोन एक्सपोर्टर्स में शामिल हो रहा है।
लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स के अलावा टेक्सटाइल, सेमीकंडक्टर, ऑटो कंपोनेंट, सोलर इक्विपमेंट और केमिकल सेक्टर में भी बड़े निवेश की जरूरत है।
PLI Scheme ने कितना बदला खेल?
भारत सरकार ने 2020 में Production Linked Incentive (PLI) Scheme शुरू की थी। इसका मकसद था मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना, एक्सपोर्ट बढ़ाना, रोजगार पैदा करना, ग्लोबल कंपनियों को भारत लाना इस योजना के तहत कंपनियों को अतिरिक्त उत्पादन पर वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाता है। सरकार का मानना है कि इससे बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल फोन सेक्टर में पीएलआई स्कीम का असर साफ दिखा है। भारत का मोबाइल एक्सपोर्ट पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। हालांकि कई सेक्टर में अभी भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं।
असली समस्या नीति नहीं, उसका लागू होना?
विरमानी ने एक बेहद अहम बात कही। उनके मुताबिक भारत की समस्या कई बार नीति में नहीं, बल्कि उसके implementation यानी लागू करने की प्रक्रिया में होती है।
उदाहरण के तौर पर Single Window Clearance का दावा तो किया जाता है लेकिन असल में कंपनियों को कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं डिजिटल सिस्टम कई बार समय पर काम नहीं करते Export approvals में देरी होती है यही वजह है कि कई निवेशक भारत की बजाय वियतनाम जैसे देशों को आसान विकल्प मानते हैं।
वियतनाम क्यों आगे निकल रहा?
पिछले कुछ वर्षों में वियतनाम ने इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में जबरदस्त बढ़त हासिल की है। Samsung जैसी कंपनियों ने वहां बड़े प्लांट लगाए हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि वियतनाम की सफलता के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं:
- तेज approvals
- कम bureaucratic delays
- export-focused policies
- बेहतर logistics
- aggressive FTA strategy
भारत के पास बड़ा बाजार जरूर है, लेकिन ease of doing business में अभी काफी सुधार की जरूरत है।
राज्यों की भूमिका क्यों अहम है?
विरमानी ने राज्यों की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कुछ राज्य सिर्फ कागजों पर “Single Window Clearance” का दावा करते हैं, जबकि वास्तविकता अलग होती है। उन्होंने आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन राज्यों ने कारोबारी माहौल सुधारने की कोशिश की है। लेकिन निवेशकों के मन में पुराने अनुभवों की छवि अब भी बनी हुई है।
यानी सिर्फ नीति बनाना काफी नहीं, बल्कि निवेशकों का भरोसा जीतना भी जरूरी है।
भारत को अब क्या करना होगा?
अगर भारत सच में China+1 Strategy का सबसे बड़ा लाभ उठाना चाहता है तो उसे अगले 5 वर्षों में कुछ बड़े कदम उठाने होंगे:
1. टैक्स विवाद तेजी से खत्म करने होंगे
विदेशी निवेशकों को policy certainty चाहिए।
2. राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ानी होगी
जिस राज्य में approval और logistics बेहतर होंगे, निवेश वहीं जाएगा।
3. Logistics Cost घटानी होगी
भारत में logistics cost अभी GDP के मुकाबले काफी ज्यादा मानी जाती है।
4. Skilled Workforce तैयार करनी होगी
Manufacturing growth के लिए trained manpower जरूरी है।
5. Export Ecosystem मजबूत करना होगा
Ports, highways, freight corridors और customs efficiency में तेजी लानी होगी।
क्या भारत चीन को पीछे छोड़ सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में भारत पूरी तरह चीन की जगह नहीं ले सकता। चीन का मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क दशकों में बना है। लेकिन भारत कई सेक्टर में मजबूत विकल्प जरूर बन सकता है। विशेषकर Electronics, Pharmaceuticals, Chemicals, Renewable Energy, Defence Manufacturing जैसे क्षेत्रों में भारत के पास बड़ी संभावना है।
दुनिया की कंपनियां अब सिर्फ सस्ता श्रम नहीं, बल्कि स्थिर सप्लाई चेन, भरोसेमंद नीति और तेज execution चाहती हैं। भारत अगर इन तीनों मोर्चों पर सुधार कर लेता है तो आने वाले वर्षों में वह वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र बन सकता है।
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