नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था इस समय कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, बढ़ता आयात बिल और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) सरकार के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं। इसी बीच वित्त आयोग के चेयरमैन और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष Arvind Panagariya ने सरकार की हालिया आर्थिक रणनीति पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि सिर्फ सोने के आयात पर ड्यूटी बढ़ाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। इसके बजाय रुपये को बाजार के हिसाब से कमजोर होने देना ज्यादा प्रभावी कदम साबित हो सकता है।
भारत सरकार ने हाल ही में गैर-जरूरी आयात कम करने के उद्देश्य से सोने, चांदी और प्लैटिनम पर आयात शुल्क बढ़ाया है। सरकार का मानना है कि इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा और चालू खाते का घाटा नियंत्रित किया जा सकेगा। लेकिन अरविंद पनगढ़िया इस दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं दिखते। उनका कहना है कि अर्थव्यवस्था में व्यापक संतुलन बनाए रखने के लिए मुद्रा विनिमय दर (Exchange Rate) को अधिक लचीला रखना जरूरी है।
चालू खाते के दबाव को लेकर सरकार क्यों चिंतित?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। खासतौर पर कच्चा तेल और सोना देश के सबसे बड़े आयात उत्पादों में शामिल हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है या आयात बढ़ता है, तब डॉलर की मांग बढ़ जाती है। इससे रुपये पर दबाव आता है और चालू खाते का घाटा बढ़ने लगता है।
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक तेल कीमतों में तेजी देखी गई है। होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी अनिश्चितताओं ने भी बाजार में चिंता बढ़ाई है। भारत पहले ही अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में सरकार विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर सतर्क है।
अरविंद पनगढ़िया का मानना है कि ऐसी स्थिति में किसी एक उत्पाद को निशाना बनाने के बजाय व्यापक आर्थिक संतुलन की नीति अपनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर रुपया स्वाभाविक रूप से कमजोर होता है तो आयात अपने आप महंगे हो जाएंगे। इससे गैर-जरूरी आयात कम होंगे और निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेगा।
सोने पर ड्यूटी बढ़ाने से क्या होगा?
सरकार ने हाल ही में सोने और चांदी के आभूषणों पर 5% तथा प्लैटिनम पर 5.4% अतिरिक्त ड्यूटी लगाई है। भारत का सोने का आयात पहले ही रिकॉर्ड 72 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। सरकार को उम्मीद है कि ऊंची ड्यूटी से सोने की मांग घटेगी और डॉलर की बचत होगी।
लेकिन पनगढ़िया ने चेतावनी दी कि इस तरह के कदमों के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। उनका कहना है कि ज्यादा ड्यूटी लगाने से सोने की तस्करी और अनौपचारिक कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है। भारत पहले भी सोने की तस्करी की समस्या झेल चुका है। जब भी आयात शुल्क बहुत ज्यादा बढ़ाया गया, अवैध चैनलों के जरिए सोना देश में आने लगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सरकार कैसे तय करेगी कि 72 अरब डॉलर का आयात गलत है और 71 या 73 अरब डॉलर सही है? उनके अनुसार बाजार को खुद यह फैसला करने देना चाहिए कि किस उत्पाद की कितनी मांग है। यही मुक्त अर्थव्यवस्था की मूल भावना है।
रुपये को कमजोर होने देना क्यों जरूरी?
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार जब किसी देश की मुद्रा कमजोर होती है तो उसके दो बड़े असर होते हैं। पहला, आयात महंगे हो जाते हैं। दूसरा, निर्यात सस्ते और प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं। यही वजह है कि कई अर्थशास्त्री चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने के लिए विनिमय दर में लचीलापन जरूरी मानते हैं।
पनगढ़िया ने कहा कि अगर रुपया थोड़ा कमजोर होता है तो इससे सिर्फ सोना ही नहीं बल्कि सभी आयात प्रभावित होंगे। इससे लोग और कंपनियां स्वाभाविक रूप से खर्च और आयात में कटौती करेंगी। दूसरी ओर भारतीय निर्यातकों को फायदा होगा क्योंकि विदेशी खरीदारों के लिए भारतीय सामान अपेक्षाकृत सस्ता हो जाएगा।
हालांकि रुपये की कमजोरी का दूसरा पक्ष भी है। इससे पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। लेकिन पनगढ़िया का तर्क है कि बाजार आधारित समाधान प्रशासनिक हस्तक्षेप से अधिक प्रभावी होते हैं।
पीएम मोदी की अपील पर क्या बोले पनगढ़िया?
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में नागरिकों से ईंधन बचाने, गैर-जरूरी यात्रा कम करने और संभव हो तो वर्क फ्रॉम होम अपनाने की अपील की थी। सरकारें खर्चों में कटौती और ईंधन उपयोग कम करने के उपायों पर जोर दे रही हैं।
अरविंद पनगढ़िया ने प्रधानमंत्री की इस अपील का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि संकट के समय नेताओं द्वारा की गई नैतिक अपीलें लोगों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने इसकी तुलना 1965 में पूर्व प्रधानमंत्री Lal Bahadur Shastri की उस अपील से की, जिसमें खाद्यान्न संकट के दौरान लोगों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने को कहा गया था।
पनगढ़िया का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में नागरिक स्वेच्छा से ईंधन बचत के उपाय अपनाते हैं तो इससे आयात बिल पर कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि दीर्घकालिक समाधान फिर भी बाजार आधारित आर्थिक नीतियां ही होंगी।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी दिया बड़ा सुझाव
पनगढ़िया ने यह भी कहा कि सरकार को पेट्रोल-डीजल की कीमतों को कृत्रिम रूप से नियंत्रित करने के बजाय बाजार के अनुसार बढ़ने देना चाहिए। उनका कहना है कि जब ईंधन महंगा होगा तो लोग स्वाभाविक रूप से गैर-जरूरी यात्रा कम करेंगे, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ेगा और ऊर्जा बचत पर ध्यान देंगे।
उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पश्चिम एशिया संकट के बाद पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ीं, लेकिन बाजार ने खुद संतुलन बनाने का काम किया। भारत में सरकार ने अब तक कीमतों को काफी हद तक नियंत्रित रखा है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना आसान नहीं होगा।
आम आदमी पर क्या पड़ेगा असर?
अगर रुपये में कमजोरी आती है और वैश्विक तेल कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो आने वाले महीनों में कई क्षेत्रों पर असर दिखाई दे सकता है:
- पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं
- ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ने से खाद्य महंगाई बढ़ सकती है
- इलेक्ट्रॉनिक्स और आयातित सामान महंगे हो सकते हैं
- सोने की कीमतों में और तेजी आ सकती है
- एयर टिकट और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है
हालांकि दूसरी तरफ आईटी, फार्मा और निर्यात आधारित उद्योगों को फायदा मिल सकता है क्योंकि कमजोर रुपया उनके उत्पादों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाता है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब सिर्फ महंगाई या तेल कीमतें नहीं हैं, बल्कि आर्थिक संतुलन बनाए रखना है। एक तरफ सरकार को विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रखना है, दूसरी ओर विकास दर और उपभोक्ता मांग को भी संभालना है।
अरविंद पनगढ़िया का बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने सरकार की रणनीति पर सीधा सवाल उठाने के साथ-साथ वैकल्पिक आर्थिक रास्ता भी सुझाया है। उनका मानना है कि किसी एक सेक्टर पर दबाव डालने के बजाय व्यापक बाजार संकेतों को काम करने देना ज्यादा बेहतर होगा।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार आयात नियंत्रण, रुपये की विनिमय दर और ईंधन नीति के बीच संतुलन कैसे बनाती है। फिलहाल इतना साफ है कि वैश्विक संकट का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर लगातार गहराता जा रहा है और इससे निपटने के लिए सिर्फ तात्कालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत होगी।
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