भारत अब केवल दुनिया का बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं रह गया है, बल्कि वह तेजी से वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी मजबूत जगह भी बना रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने माल निर्यात (Merchandise Exports) के मामले में नया रिकॉर्ड बनाते हुए 441.78 अरब डॉलर यानी करीब 42.32 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा छू लिया। यह उपलब्धि सिर्फ एक बड़ा आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह संकेत भी है कि भारत अब उन बाजारों में भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, जहां लंबे समय से चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों का दबदबा रहा है।
वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय निर्यातकों ने इस बार पारंपरिक उत्पादों और पुराने बाजारों पर निर्भर रहने के बजाय नई रणनीति अपनाई। इसी रणनीति के तहत 1,821 नए प्रमुख उत्पादों के साथ दुनिया के कई नए बाजारों में एंट्री की गई। इसका असर साफ तौर पर उत्तर-पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में दिखाई दिया, जहां भारत के निर्यात में तेज उछाल दर्ज हुआ।
उत्तर-पूर्व एशिया में भारत की जबरदस्त छलांग
चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब माने जाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, औद्योगिक सामान और इंजीनियरिंग सेक्टर में इन देशों की पकड़ बेहद मजबूत रही है। लेकिन अब भारत भी इस क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बना रहा है।
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर-पूर्व एशिया में भारत का निर्यात 21.6% बढ़कर 41.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया। कुल भारतीय निर्यात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर 9.4% हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल कीमतों की वजह से नहीं आया है, बल्कि भारतीय कंपनियों की गुणवत्ता, सप्लाई क्षमता और तेजी से डिलीवरी करने की क्षमता ने भी अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का भरोसा जीता है। खासतौर पर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स, रसायन और औद्योगिक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब दुनिया की कई कंपनियां “China Plus One Strategy” अपना रही हैं। इसके तहत वैश्विक कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करके भारत, वियतनाम और अन्य देशों से सप्लाई बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। भारत को इसका बड़ा फायदा मिलता दिखाई दे रहा है।
अमेरिका अब भी सबसे बड़ा बाजार, लेकिन लैटिन अमेरिका में भी बढ़ी पकड़
उत्तरी अमेरिका भारतीय उत्पादों के लिए अभी भी सबसे बड़ा निर्यात बाजार बना हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 में इस क्षेत्र में भारत का निर्यात 97.7 अरब डॉलर रहा, जो कुल निर्यात का करीब 22.1% है। हालांकि वृद्धि दर केवल 1.3% रही, लेकिन वैश्विक आर्थिक सुस्ती के बीच यह स्थिर प्रदर्शन भी काफी अहम माना जा रहा है।
दूसरी तरफ भारत ने लैटिन अमेरिकी देशों में भी तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की है। इस क्षेत्र में निर्यात 7.8% बढ़कर 16.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया। ब्राजील, मेक्सिको, चिली और पेरू जैसे देशों में भारतीय दवाइयों, ऑटो कंपोनेंट्स, केमिकल्स और कृषि-प्रसंस्कृत उत्पादों की मांग बढ़ी है।
आंकड़ों के अनुसार, उत्तर अमेरिका, उत्तर-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका मिलकर भारत के कुल निर्यात में 35% से अधिक योगदान दे रहे हैं। यह दर्शाता है कि भारत अब केवल कुछ चुनिंदा बाजारों पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि वह निर्यात का दायरा लगातार बढ़ा रहा है।
अफ्रीका और मध्य एशिया में भारत का नया फोकस
भारत की नई निर्यात रणनीति केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं है। अफ्रीका और मध्य एशिया जैसे उभरते बाजारों में भी भारत ने आक्रामक तरीके से विस्तार शुरू किया है।
पूर्वी अफ्रीका को भारत का निर्यात 13.7% बढ़कर 12.6 अरब डॉलर हो गया, जबकि उत्तरी अफ्रीका में यह 14.8% बढ़कर 8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इन क्षेत्रों में भारत पेट्रोलियम उत्पाद, दवाइयां, खाद्य उत्पाद, मशीनरी और कृषि उपकरण निर्यात कर रहा है।
मध्य एशिया और मध्य अफ्रीका जैसे छोटे बाजारों में भी भारतीय निर्यात ने दोहरे अंक की वृद्धि दर्ज की है। यह संकेत है कि भारतीय कंपनियां अब नए और कम प्रतिस्पर्धी बाजारों में भी अवसर तलाश रही हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में अफ्रीका भारत के लिए सबसे बड़े निर्यात अवसरों में से एक बन सकता है, क्योंकि वहां तेजी से शहरीकरण और औद्योगिकीकरण बढ़ रहा है।
1821 नए उत्पादों ने कैसे बदल दिया भारत का निर्यात मॉडल?
वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, भारत की इस सफलता के पीछे सबसे बड़ी भूमिका नए उत्पादों और विविधता की रही है। इस बार भारतीय कंपनियों ने 1,821 नए प्रमुख उत्पादों के साथ नए बाजारों में प्रवेश किया।
पहले भारत का निर्यात मुख्य रूप से कपड़ा, मसाले, जेम्स एंड ज्वेलरी, कृषि उत्पाद तक सीमित माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। अब भारत इंजीनियरिंग गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स, प्रोसेस्ड फूड, टेक्नोलॉजी आधारित उत्पाद, ऑटो कंपोनेंट्स, इंडस्ट्रियल मशीनरी जैसे हाई वैल्यू सेक्टर में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (EEPC) और विभिन्न उद्योग संगठनों के अनुसार, भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बढ़ते निवेश, PLI स्कीम और “मेक इन इंडिया” अभियान का असर अब निर्यात आंकड़ों में भी दिखाई देने लगा है।
वैश्विक संकट के बीच भारत के लिए बड़ा मौका
दुनिया इस समय कई चुनौतियों से जूझ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया तनाव, रेड सी संकट और वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधानों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित किया है। इसके बावजूद भारत का निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना काफी अहम माना जा रहा है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, अगर भारत आने वाले वर्षों में लॉजिस्टिक्स लागत कम करता है, बंदरगाह क्षमता बढ़ाता है, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) को तेज करता है, और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मजबूत करता है,
तो वह चीन के विकल्प के रूप में दुनिया की बड़ी सप्लाई चेन शक्ति बन सकता है।
क्या ‘मेक इन India’ अब सच में ग्लोबल ब्रांड बन रहा है?
एक समय था जब “Made in China” दुनिया के हर बाजार पर हावी था। लेकिन अब भारतीय उत्पाद भी तेजी से वैश्विक पहचान बना रहे हैं। मोबाइल फोन से लेकर इंजीनियरिंग सामान और फार्मा उत्पादों तक, कई सेक्टर में भारत की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।
वित्त वर्ष 2025-26 के निर्यात आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि भारत अब केवल घरेलू बाजार तक सीमित अर्थव्यवस्था नहीं रह गया है। वह वैश्विक व्यापार के नए केंद्र के रूप में उभरने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। अगर यही रफ्तार जारी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत दुनिया की सबसे बड़ी निर्यात अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है।
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