प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। पीएम मोदी ने नागरिकों से एक साल तक गैर-जरूरी सोना न खरीदने, ईंधन बचाने और विदेशी मुद्रा के अनावश्यक खर्च से बचने की अपील की है। पश्चिम एशिया संकट, महंगे कच्चे तेल और विदेशी मुद्रा पर बढ़ते दबाव के बीच आई इस अपील को कई लोग असामान्य मान रहे हैं, लेकिन भारत के आर्थिक इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब किसी प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री ने जनता से सोना न खरीदने को कहा हो।
भारत की अर्थव्यवस्था और सोने का रिश्ता बेहद पुराना और भावनात्मक रहा है। लेकिन जब-जब देश आर्थिक संकट में फंसा, तब-तब सोना केवल गहना नहीं बल्कि आर्थिक स्थिरता, विदेशी मुद्रा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन गया।
इंदिरा गांधी से लेकर पी. चिदंबरम तक कई बड़े नेताओं ने अलग-अलग दौर में लोगों से सोना खरीदने से बचने की अपील की। इतना ही नहीं, 1991 में देश को दिवालिया होने से बचाने में भी सोने ने बड़ी भूमिका निभाई थी।
आखिर सरकारें सोना न खरीदने की अपील क्यों करती हैं?
भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर साल सैकड़ों टन सोना आयात होता है और इसके लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च होते हैं। जब कच्चा तेल महंगा होता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है और रुपया कमजोर होता है, तब सरकारें सोने के आयात को कम करने की कोशिश करती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक सोने का ज्यादा आयात Current Account Deficit (CAD) और Forex Reserve दोनों पर दबाव बढ़ाता है। यही वजह है कि आर्थिक संकट के समय सरकारें लोगों से सोना कम खरीदने की अपील करती रही हैं।
1962: चीन युद्ध और नेहरू की सोना दान अपील

भारत-चीन युद्ध के दौरान देश बेहद कठिन आर्थिक और सुरक्षा संकट से गुजर रहा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने National Defence Fund के लिए नागरिकों से सोना और धन दान करने की अपील की थी। यह फंड सैनिकों, उनके परिवारों और रक्षा तैयारियों के लिए बनाया गया था। सरकार ने उस समय कहा था कि देश की क्षेत्रीय अखंडता बचाने, नागरिकों का भविष्य सुरक्षित करने और शांति बनाए रखने के लिए यह जरूरी है। इसी दौर में इंदिरा गांधी ने भी करीब 367 ग्राम सोने के गहने दान किए थे।
1967: जब इंदिरा गांधी ने कहा था ‘सोना मत खरीदिए’

6 जून 1967 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से लोगों से सोना न खरीदने की अपील की थी। उस समय भारत 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और भीषण सूखे के असर से जूझ रहा था। देश का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कमजोर हो चुका था।
भारत को आजाद हुए केवल 20 साल हुए थे और आर्थिक संस्थाएं अभी शुरुआती चरण में थीं। इसी परिस्थिति में इंदिरा गांधी ने “राष्ट्रीय अनुशासन” और आर्थिक जिम्मेदारी की बात करते हुए नागरिकों से किसी भी रूप में सोना न खरीदने की अपील की थी। विशेषज्ञों के मुताबिक उस दौर में भारत के लिए हर डॉलर बेहद महत्वपूर्ण था।
1991: जब सोने ने भारत को दिवालिया होने से बचाया

भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे बड़ा संकट 1991 में आया। उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश के पास केवल कुछ हफ्तों के आयात लायक डॉलर बचे थे। भारत कच्चे तेल और उर्वरकों का भुगतान करने में भी मुश्किल महसूस कर रहा था। ऐसी स्थिति में भारत सरकार और RBI ने 20 टन सोना गिरवी रखकर करीब 200 मिलियन डॉलर जुटाए। इसके बाद 47 टन सोना Bank of England को भेजा गया। इस फैसले की काफी आलोचना भी हुई, लेकिन इसी कदम ने भारत को तत्काल भुगतान संकट और संभावित डिफॉल्ट से बचाया। विशेषज्ञ मानते हैं कि 1991 का संकट भारत की आर्थिक नीति में आज भी सबसे बड़ी चेतावनी की तरह देखा जाता है।
2013: पी. चिदंबरम की ‘सोना मत खरीदिए’ अपील

2013 में UPA सरकार के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी लोगों से सोना न खरीदने की अपील की थी। उस समय भारत का Current Account Deficit (CAD) रिकॉर्ड 6.7% तक पहुंच गया था। विशेषज्ञों ने भारी गोल्ड इम्पोर्ट को इसकी बड़ी वजह बताया था। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में चिदंबरम ने कहा था:
“अगर मेरी कोई एक इच्छा है जिसे भारत की जनता पूरा कर सकती है, तो वह यह है कि वे सोना न खरीदें।”
उस समय सरकार ने गोल्ड इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर 8% कर दी थी ताकि सोने के आयात को नियंत्रित किया जा सके।
PM मोदी की अपील क्यों अहम मानी जा रही है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील ऐसे समय आई है जब पश्चिम एशिया संकट, महंगा कच्चा तेल और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। इसके अलावा भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातकों में भी शामिल है। यानी तेल और सोना दोनों ही भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर बड़ा दबाव डालते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक पीएम मोदी की अपील का मकसद foreign exchange conservation और आर्थिक स्थिरता को मजबूत करना है।
क्या भारत फिर किसी बड़े आर्थिक दबाव की तरफ बढ़ रहा है?
फिलहाल भारत की स्थिति 1991 जैसी नहीं मानी जा रही क्योंकि देश के पास मजबूत Forex Reserve मौजूद है। लेकिन लंबे समय तक महंगा तेल, कमजोर रुपया और लगातार बढ़ते आयात बिल आर्थिक दबाव जरूर बढ़ा सकते हैं। यही वजह है कि सरकार अभी से preventive economic measures पर जोर दे रही है।
Why It Matters
भारत में सोना केवल निवेश नहीं बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक संपत्ति भी माना जाता है। लेकिन जब देश आर्थिक दबाव में आता है, तो यही सोना विदेशी मुद्रा और आर्थिक स्थिरता का बड़ा मुद्दा बन जाता है। इतिहास बताता है कि आर्थिक संकट के समय भारत को कई बार सोने से जुड़े कठिन फैसले लेने पड़े हैं। पीएम मोदी की हालिया अपील भी उसी आर्थिक सावधानी का हिस्सा मानी जा रही है।
भारत और सोना: बड़े आर्थिक मोड़
| साल | घटना |
|---|---|
| 1962 | नेहरू ने रक्षा कोष के लिए सोना दान की अपील की |
| 1967 | इंदिरा गांधी ने सोना न खरीदने को कहा |
| 1991 | भारत ने सोना गिरवी रखकर डॉलर जुटाए |
| 2013 | पी. चिदंबरम ने गोल्ड इम्पोर्ट रोकने की अपील की |
| 2026 | पीएम मोदी ने एक साल तक सोना न खरीदने की सलाह दी |
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