Gold-Silver ETF Rules Changed: अगर आप Gold ETF, Silver ETF या किसी अन्य ETF में निवेश करते हैं तो आपके लिए जरूरी खबर है। 7 सितंबर 2026 से ETF से जुड़े नए नियम लागू हो गए हैं। SEBI ने ETF की प्राइसिंग और ट्रेडिंग व्यवस्था में बदलाव किया है। इन बदलावों का सबसे ज्यादा असर गोल्ड और सिल्वर ETF पर देखने को मिलेगा।
नए नियमों के तहत ETF का बेस प्राइस अब पहले से अलग तरीके से तय होगा, अलग-अलग एसेट क्लास के लिए प्राइस बैंड अलग होंगे और गोल्ड-सिल्वर ETF में प्री-ओपन कॉल ऑक्शन की व्यवस्था लागू होगी।
SEBI ने इन बदलावों की घोषणा 15 जून 2026 के सर्कुलर में की थी। इन्हें पहले 1 सितंबर से लागू किया जाना था, लेकिन 28 अगस्त को जारी सर्कुलर के जरिए लागू होने की तारीख बढ़ाकर 7 सितंबर 2026 कर दी गई।
ETF के नियमों में क्यों किया गया बदलाव?
ETF यानी Exchange Traded Fund शेयरों की तरह स्टॉक एक्सचेंज पर खरीदे और बेचे जाते हैं। इनके साथ मुख्य रूप से दो कीमतें जुड़ी होती हैं—NAV और मार्केट प्राइस।
NAV यानी Net Asset Value ETF के पास मौजूद एसेट्स की प्रति यूनिट अनुमानित वैल्यू होती है, जबकि मार्केट प्राइस वह कीमत होती है जिस पर एक्सचेंज पर खरीदार और विक्रेता ट्रेड करते हैं।
आमतौर पर ETF का मार्केट प्राइस उसकी वास्तविक वैल्यू यानी NAV के आसपास रहना चाहिए। लेकिन पुराने नियमों में बेस प्राइस तय करने का तरीका ऐसा था कि तेज बाजार हलचल के दौरान ETF की मार्केट कीमत और उसके अंडरलाइंग एसेट की वैल्यू में बड़ा अंतर पैदा हो सकता था।
इसी समस्या को कम करने के लिए अब ETF की प्राइस बैंड और बेस प्राइस व्यवस्था में बदलाव किया गया है।
1. अब T-2 NAV नहीं, पिछले दिन की कीमत होगी बेस प्राइस
सबसे बड़ा बदलाव ETF के बेस प्राइस को लेकर हुआ है।
पुरानी व्यवस्था में ETF का बेस प्राइस दो ट्रेडिंग दिन पहले की NAV यानी T-2 NAV के आधार पर तय किया जाता था। इसके आसपास ETF के लिए प्राइस बैंड निर्धारित होता था।
नई व्यवस्था में यह तरीका बदल गया है। अब ETF का बेस प्राइस पिछले ट्रेडिंग सेशन की क्लोजिंग प्राइस के आधार पर तय होगा। इसके लिए पिछले कारोबारी सत्र के अंतिम 30 मिनट में ETF के ट्रेड्स का VWAP यानी Volume Weighted Average Price इस्तेमाल किया जाएगा।
इस बदलाव का मकसद यह है कि ETF की ट्रेडिंग रेंज बाजार में उसकी हाल की वास्तविक ट्रेडिंग वैल्यू के ज्यादा करीब रहे।
इसे एक उदाहरण से समझें
मान लीजिए किसी ETF की NAV सोमवार को ₹100 थी। मंगलवार को उसके अंडरलाइंग एसेट्स में तेज तेजी आ गई और उसकी वास्तविक वैल्यू बढ़कर ₹125 हो गई।
पुरानी व्यवस्था में दो दिन पुरानी NAV के आधार पर प्राइस बैंड तय होने के कारण ETF की मार्केट कीमत अपनी वास्तविक वैल्यू तक पहुंचने में अटक सकती थी।
अब पिछले दिन के क्लोजिंग VWAP को बेस प्राइस बनाने से ETF को मौजूदा बाजार परिस्थितियों के अनुरूप एडजस्ट होने की ज्यादा गुंजाइश मिलेगी।
2. अब हर ETF पर एक जैसा प्राइस बैंड नहीं होगा
दूसरा बड़ा बदलाव प्राइस बैंड को लेकर है।
पहले अलग-अलग तरह के ETF पर समान तरह की सीमा लागू होने की स्थिति थी। लेकिन ETF में इक्विटी, डेट, गोल्ड, सिल्वर और अन्य एसेट्स शामिल हो सकते हैं और इनकी कीमतों में उतार-चढ़ाव का पैटर्न अलग होता है।
नई व्यवस्था में प्राइस बैंड को ETF के अंडरलाइंग एसेट के हिसाब से तय किया जाएगा।
इक्विटी और डेट ETF
इक्विटी और डेट ETF में शुरुआती ट्रेडिंग रेंज 10% होगी। जरूरत पड़ने पर इसे चरणबद्ध तरीके से बढ़ाकर 20% तक किया जा सकता है।
प्राइस बैंड की सीमा तक पहुंचने पर 15 मिनट का कूलिंग-ऑफ पीरियड होगा। इसके बाद जरूरत के मुताबिक अगली ट्रेडिंग रेंज उपलब्ध कराई जा सकती है।
गोल्ड और सिल्वर ETF
गोल्ड और सिल्वर ETF के लिए शुरुआत में 6% का प्राइस बैंड रहेगा।
लेकिन इन ETF की खासियत यह है कि इनके अंडरलाइंग ग्लोबल बुलियन मार्केट में कीमतें भारतीय बाजार के बंद रहने के दौरान भी बदलती रहती हैं।
इसलिए अगर रातभर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने या चांदी की कीमतों में बड़ा बदलाव आता है तो गोल्ड और सिल्वर ETF को अपनी नई फेयर वैल्यू तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त फ्लेक्सिबिलिटी दी गई है।
इनका प्राइस बैंड 3% के चरणों में आगे बढ़ सकता है और इसके लिए कोई ऊपरी सीमा निर्धारित नहीं है।
इसका फायदा खासतौर पर उन दिनों में हो सकता है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में रातभर सोने या चांदी की कीमत में तेज हलचल हुई हो।
ओवरनाइट और लिक्विड ETF
ओवरनाइट और लिक्विड ETF के लिए 5% का फिक्स्ड प्राइस बैंड बना रहेगा।
यानी अलग-अलग ETF की प्रकृति और जोखिम के हिसाब से अब प्राइस बैंड की व्यवस्था की गई है।
3. गोल्ड और सिल्वर ETF में प्री-ओपन ऑक्शन
तीसरा महत्वपूर्ण बदलाव गोल्ड और सिल्वर ETF की ट्रेडिंग की शुरुआत को लेकर है।
अब इन ETF में भी स्टॉक्स की तरह प्री-ओपन कॉल ऑक्शन की व्यवस्था होगी।
प्री-ओपन सेशन में मार्केट खुलने से पहले निवेशकों के खरीद और बिक्री के ऑर्डर इकट्ठे किए जाते हैं। इसके बाद डिमांड और सप्लाई के आधार पर एक ऐसा भाव तय किया जाता है जिस पर अधिकतम ऑर्डर्स मैच हो सकें। इसे इक्विलिब्रियम प्राइस कहा जाता है।
इस व्यवस्था से ETF की शुरुआती कीमत किसी एक रैंडम ऑर्डर के बजाय बाजार की कुल डिमांड और सप्लाई को बेहतर तरीके से प्रतिबिंबित कर सकती है।
गोल्ड और सिल्वर ETF के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके पीछे मौजूद अंतरराष्ट्रीय बुलियन मार्केट भारतीय बाजार के बंद रहने के दौरान भी चलता रहता है।
पुराने नियमों में क्या दिक्कत थी?
शार्प फाइनेंशियल्स के फाउंडर बालकृष्ण बगड़िया के अनुसार, पुराने सिस्टम में ETF की कीमत और उसकी वास्तविक वैल्यू के बीच अंतर बढ़ने की गुंजाइश थी।
मान लीजिए किसी ETF की NAV ₹100 है और अगले दिन उसके अंडरलाइंग एसेट्स की वैल्यू तेजी से बढ़कर ₹125 हो जाती है। अगर ETF का प्राइस बैंड पुराने बेस प्राइस के आधार पर तय है और अधिकतम ट्रेडिंग सीमा ₹120 है तो ETF अपनी वास्तविक वैल्यू के अनुरूप ₹125 तक तुरंत नहीं पहुंच पाएगा।
पुराने सिस्टम की दूसरी समस्या यह थी कि अलग-अलग प्रकृति वाले ETF के लिए प्राइस बैंड की व्यवस्था पर्याप्त रूप से अलग नहीं थी। गोल्ड ETF, इक्विटी ETF और बॉन्ड ETF के बाजार व्यवहार में काफी अंतर होता है।
नए नियमों में इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग कैटेगरी के लिए अलग व्यवस्था की गई है।
निवेशकों के लिए क्या बदलेगा?
नए नियमों का उद्देश्य ETF की मार्केट कीमत को उसके अंडरलाइंग एसेट की वैल्यू के ज्यादा करीब रखने में मदद करना है।
खासकर गोल्ड और सिल्वर ETF में रातभर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी हलचल होने पर अब भारतीय बाजार खुलने के बाद कीमत को एडजस्ट होने के लिए ज्यादा लचीलापन मिलेगा।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ETF हमेशा अपनी NAV पर ही ट्रेड करेगा।
ETF की कीमत अभी भी डिमांड, सप्लाई और लिक्विडिटी के कारण NAV से ऊपर यानी प्रीमियम या नीचे यानी डिस्काउंट पर ट्रेड कर सकती है।
इसलिए निवेशकों को सिर्फ ETF का मार्केट प्राइस देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। जहां उपलब्ध हो, वहां iNAV यानी Indicative NAV पर भी नजर रखना महत्वपूर्ण है।
ETF में निवेश करते समय इन बातों का रखें ध्यान
नए नियम लागू होने के बाद भी ETF निवेशकों के लिए कुछ बुनियादी सावधानियां पहले जैसी ही रहेंगी।
- ETF खरीदने से पहले उसकी लिक्विडिटी और ट्रेडिंग वॉल्यूम देखें।
- मार्केट प्राइस और iNAV/NAV के बीच अंतर जरूर जांचें।
- तेज उतार-चढ़ाव वाले बाजार में मार्केट ऑर्डर के बजाय लिमिट ऑर्डर का इस्तेमाल करना बेहतर हो सकता है।
- गोल्ड और सिल्वर ETF में निवेश करते समय अंतरराष्ट्रीय बुलियन मार्केट की चाल पर भी नजर रखें।
- ETF के एक्सपेंस रेशियो और ट्रैकिंग एरर को भी नजरअंदाज न करें।
क्या ETF के रिटर्न और टैक्स के नियम बदल गए हैं?
नए बदलाव मुख्य रूप से ETF की ट्रेडिंग, बेस प्राइस और प्राइस बैंड से जुड़े हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि ETF का रिटर्न, निवेश की लागत या टैक्स व्यवस्था इन बदलावों के कारण अपने आप बदल गई है।
हालांकि किसी भी ETF में निवेश से पहले उसके प्रोडक्ट डॉक्यूमेंट, खर्च, टैक्स नियम और अपने निवेश लक्ष्य को समझना जरूरी है।
कौन-कौन से नियम पहले जैसे हैं?
ETF निवेशकों के लिए यह समझना भी जरूरी है कि सभी नियम नहीं बदले हैं।
NAV और मार्केट प्राइस अलग-अलग रहेंगे। ETF की मार्केट कीमत डिमांड और सप्लाई के आधार पर NAV से ऊपर या नीचे जा सकती है।
इसी तरह ETF के रिटर्न, खर्च और टैक्स से जुड़े नियम केवल इन प्राइस-बैंड बदलावों की वजह से नहीं बदलते।
निष्कर्ष
SEBI के नए ETF नियमों का सबसे बड़ा उद्देश्य ETF की ट्रेडिंग को उसकी मौजूदा फेयर वैल्यू के ज्यादा करीब लाना है। 7 सितंबर 2026 से बेस प्राइस, प्राइस बैंड और गोल्ड-सिल्वर ETF के प्री-ओपन ऑक्शन से जुड़े तीन अहम बदलाव लागू हो गए हैं।
गोल्ड और सिल्वर ETF निवेशकों के लिए प्राइस बैंड में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बुलियन मार्केट 24 घंटे सक्रिय रहता है। हालांकि नए नियमों के बावजूद निवेशकों को iNAV, लिक्विडिटी और मार्केट प्राइस को देखकर ही ETF में खरीद-बिक्री का फैसला करना चाहिए।
डिस्क्लेमर: NewsJagran.in पर दी गई जानकारी निवेश संबंधी सलाह नहीं है। शेयर बाजार और ETF में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेश करने से पहले अपने वित्तीय लक्ष्य, जोखिम क्षमता और निवेश अवधि को ध्यान में रखें तथा जरूरत पड़ने पर SEBI-रजिस्टर्ड वित्तीय सलाहकार की सलाह लें।


