SEBI New ETF Trading Rules: अगर आप गोल्ड ETF, सिल्वर ETF, इक्विटी ETF या डेट ETF में निवेश करते हैं, तो आपके लिए बड़ा अपडेट है। सेबी के ETF ट्रेडिंग से जुड़े नए नियम 7 सितंबर 2026 से लागू हो गए हैं। नए फ्रेमवर्क के तहत ETF के बेस प्राइस, प्राइस बैंड और गोल्ड-सिल्वर ETF की ट्रेडिंग व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य ETF के एक्सचेंज पर चल रहे बाजार भाव और उसकी वास्तविक वैल्यू यानी NAV (Net Asset Value) के बीच के अंतर को कम करना है। खासकर तेज उतार-चढ़ाव वाले बाजार में इन बदलावों से ETF की कीमत को वास्तविक वैल्यू के करीब रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि सेबी के नए नियमों में क्या बदला है और ETF निवेशकों को अब ट्रेडिंग के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
पहले ETF के बेस प्राइस को लेकर क्या दिक्कत थी?
नए नियमों को समझने से पहले पुराने सिस्टम को जानना जरूरी है। पहले ETF के बेस प्राइस को तय करने के लिए दो दिन पुरानी NAV यानी T-2 NAV का इस्तेमाल किया जाता था। इसके अलावा अलग-अलग तरह के ETF पर एक समान 20 फीसदी प्राइस बैंड की व्यवस्था थी।
ऐसे में अगर किसी ETF की वास्तविक वैल्यू बाजार में तेजी या विदेशी बाजारों में बड़े बदलाव के कारण तेजी से बदलती थी, तो उसका एक्सचेंज प्राइस उसी रफ्तार से एडजस्ट नहीं हो पाता था।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए सोमवार को किसी ETF की NAV ₹100 थी। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेज उछाल के बाद उसकी अनुमानित वास्तविक वैल्यू ₹125 हो गई। लेकिन बुधवार की ट्रेडिंग के लिए बेस प्राइस पुरानी NAV के आधार पर तय होने की वजह से ETF की कीमत पर प्राइस बैंड की सीमा लग सकती थी।
इससे ETF का बाजार भाव उसकी वास्तविक वैल्यू से पीछे रह सकता था।
7 सितंबर से लागू हुए ETF के 3 बड़े बदलाव
सेबी के नए फ्रेमवर्क में ETF ट्रेडिंग व्यवस्था को ज्यादा व्यावहारिक बनाने के लिए तीन प्रमुख बदलाव किए गए हैं।
1. अब दो दिन पुरानी NAV नहीं बनेगी बेस प्राइस का आधार
सबसे बड़ा बदलाव ETF के बेस प्राइस को लेकर है।
अब बेस प्राइस तय करने के लिए दो दिन पुरानी NAV के बजाय पिछले कारोबारी दिन के आखिरी 30 मिनट के वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) को आधार बनाया जाएगा।
इसका सीधा मतलब यह है कि ETF की आज की ट्रेडिंग सीमा पिछले दिन उसके एक्सचेंज पर हुए वास्तविक कारोबार के आधार पर तय होगी।
इससे अचानक बदलती बाजार परिस्थितियों में ETF के प्राइस डिस्कवरी सिस्टम को ज्यादा प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।
2. अलग-अलग ETF के लिए अलग प्राइस बैंड
अब सभी ETF के लिए एक जैसा प्राइस बैंड नहीं होगा। अलग-अलग एसेट क्लास के ETF के लिए उनकी प्रकृति और उतार-चढ़ाव के हिसाब से अलग व्यवस्था की गई है।
इक्विटी और डेट ETF
इक्विटी और डेट ETF में ट्रेडिंग की शुरुआत 10 फीसदी के प्राइस बैंड के साथ होगी।
अगर बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, तो 15 मिनट के कूलिंग-ऑफ पीरियड के बाद प्राइस बैंड को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाकर 20 फीसदी तक किया जा सकता है।
इसका उद्देश्य अचानक आई तेजी या गिरावट में बाजार को थोड़ा समय देना है, ताकि खरीदार और विक्रेता नए भाव पर संतुलन बना सकें।
गोल्ड और सिल्वर ETF
गोल्ड और सिल्वर ETF के लिए शुरुआती प्राइस बैंड 6 फीसदी रखा गया है।
इन दोनों ETF की खासियत यह है कि इनके पीछे मौजूद कमोडिटी बाजार का कारोबार भारतीय शेयर बाजार के समय तक सीमित नहीं रहता। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने और चांदी की कीमतों में रातों-रात बड़ा बदलाव हो सकता है।
इसी वजह से इनके प्राइस बैंड को ज्यादा लचीला बनाया गया है। जरूरत पड़ने पर यह 3-3 फीसदी के चरणों में आगे बढ़ सकता है और इसके लिए पहले से तय कोई अपर कैप नहीं रखा गया है।
इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई बड़ी हलचल को घरेलू ETF की कीमत में बेहतर तरीके से शामिल करने में मदद मिल सकती है।
लिक्विड और ओवरनाइट ETF
लिक्विड और ओवरनाइट ETF में आमतौर पर कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता। इसलिए इनके लिए 5 फीसदी का फिक्स्ड प्राइस बैंड रखा गया है।
इससे इस कैटेगरी के ETF में ट्रेडिंग व्यवस्था अपेक्षाकृत सरल बनी रहेगी।
3. गोल्ड और सिल्वर ETF में शुरू हुआ प्री-ओपन ऑक्शन
नए नियमों में गोल्ड और सिल्वर ETF के निवेशकों के लिए एक और अहम बदलाव किया गया है।
अब इनमें भी शेयर बाजार की तरह प्री-ओपन कॉल ऑक्शन की व्यवस्था होगी। इसका उद्देश्य बाजार खुलने के समय शुरुआती कीमत को ज्यादा व्यवस्थित तरीके से तय करना है।
प्री-ओपन ऑक्शन में खरीद और बिक्री के ऑर्डर के आधार पर शुरुआती कीमत खोजने की कोशिश की जाती है। इससे बाजार खुलते ही किसी एक बड़े ऑर्डर की वजह से ETF की शुरुआती कीमत में असामान्य उतार-चढ़ाव की संभावना कम हो सकती है।
गोल्ड और सिल्वर ETF में यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार की गतिविधियों से काफी प्रभावित होती हैं।
नए नियम कब से लागू हुए?
ETF से जुड़े ये बदलाव 7 सितंबर 2026 से लागू किए गए हैं।
इन नियमों को पहले 1 सितंबर से लागू किया जाना था, लेकिन एक्सचेंजों को सिस्टम और तकनीकी तैयारियां पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया। इसके बाद नई व्यवस्था को 7 सितंबर से लागू किया गया।
वहीं, 1 अप्रैल 2027 से बेस प्राइस निर्धारित करने के लिए पिछले दिन की क्लोजिंग NAV को आधार बनाने की व्यवस्था लागू होने की बात कही गई है।
ETF निवेशकों पर क्या होगा इसका असर?
नए नियमों का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि ETF की एक्सचेंज कीमत को उसकी वास्तविक वैल्यू के साथ ज्यादा बेहतर तरीके से जोड़ने में मदद मिले।
पहले पुरानी NAV के आधार पर प्राइस बैंड तय होने से कुछ परिस्थितियों में ETF की कीमत और उसकी वास्तविक वैल्यू के बीच अंतर बढ़ सकता था। अब पिछले दिन के कारोबार के आधार पर बेस प्राइस तय होने से यह अंतर कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ETF में उतार-चढ़ाव खत्म हो जाएगा। खासकर गोल्ड और सिल्वर ETF में अंतरराष्ट्रीय बाजार के कारण कीमतों में तेज बदलाव देखने को मिल सकता है।
निवेश करते समय इन 3 बातों का रखें ध्यान
iNAV जरूर चेक करें
ETF खरीदने या बेचने से पहले उसकी Indicative NAV यानी iNAV पर नजर डालना उपयोगी रहेगा। इससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि ETF का बाजार भाव उसकी अनुमानित वास्तविक वैल्यू के मुकाबले कितना ऊपर या नीचे चल रहा है।
बाजार खुलते ही मार्केट ऑर्डर देने से बचें
खासकर गोल्ड और सिल्वर ETF में बाजार खुलने के समय तेजी से बदलाव हो सकता है। ऐसे में निवेशकों को बिना सोचे-समझे मार्केट ऑर्डर देने के बजाय लिमिट ऑर्डर का इस्तेमाल करने पर विचार करना चाहिए।
लिमिट ऑर्डर में निवेशक वह अधिकतम खरीद या न्यूनतम बिक्री कीमत तय कर सकता है जिस पर वह सौदा करना चाहता है।
ट्रेडिंग रुकने पर घबराएं नहीं
अगर अत्यधिक उतार-चढ़ाव के दौरान ETF में कुछ समय के लिए ट्रेडिंग रुकती है, तो यह जरूरी नहीं कि कोई तकनीकी समस्या हो। प्राइस बैंड और कूलिंग-ऑफ व्यवस्था का उद्देश्य ही बाजार में अचानक आई असामान्य हलचल को संभालना है।
इसलिए निवेशकों को ऐसे समय में जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय बाजार की स्थिति और ETF की iNAV को देखना चाहिए।
क्या नए नियम ETF निवेशकों के लिए फायदेमंद हैं?
कुल मिलाकर सेबी के नए ETF नियमों का फोकस बेहतर प्राइस डिस्कवरी और ETF की कीमत को उसकी वास्तविक वैल्यू के करीब लाने पर है।
बेस प्राइस के लिए ज्यादा ताजा बाजार डेटा का इस्तेमाल, अलग-अलग ETF के लिए अलग प्राइस बैंड और गोल्ड-सिल्वर ETF में प्री-ओपन ऑक्शन जैसे बदलाव ट्रेडिंग व्यवस्था को ज्यादा व्यवस्थित बनाने की दिशा में कदम हैं।
हालांकि, निवेशकों को यह समझना जरूरी है कि नए नियम बाजार जोखिम को खत्म नहीं करते। ETF की कीमत में उतार-चढ़ाव बना रहेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़े ETF में यह जोखिम ज्यादा हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सूचना के उद्देश्य से है। शेयर बाजार और ETF में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेश से पहले अपनी वित्तीय स्थिति, जोखिम क्षमता और निवेश उद्देश्य को ध्यान में रखें तथा जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार से सलाह लें। NewsJagran.in किसी भी सिक्योरिटी में निवेश की सलाह नहीं देता।


