Gandhari Film Review: तापसी पन्नू की नई फिल्म ‘गांधारी’ नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुकी है। फिल्म में वह एक ऐसी मां का किरदार निभा रही हैं, जिसकी छोटी बेटी अचानक गायब हो जाती है। बेटी की तलाश में वह पश्चिम बंगाल के जॉयपुरा की उस अंधेरी दुनिया तक पहुंचती है, जहां अपराध, हिंसा और रहस्य उसका इंतजार कर रहे होते हैं। देवाशीष मखीजा के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक्शन के साथ-साथ मां और बेटी के रिश्ते की भावनात्मक ताकत को भी सामने रखती है।
फिल्म: गांधारी
कलाकार: तापसी पन्नू, इश्वाक सिंह, छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी, मीता वशिष्ठ, जतिन सरना, प्रशांत नारायणन, चंदन रॉय, विश्वनाथ चटर्जी, प्रीति श्रॉफ, मायरा शिवन, शुभम बसु
निर्देशक: देवाशीष मखीजा
प्रोड्यूसर: कनिका ढिल्लों
प्लेटफॉर्म: नेटफ्लिक्स
अवधि: करीब 1 घंटा 55 मिनट
रेटिंग: 3.5/5
मां की ममता जब बन जाती है जुनून
मां और बच्चे का रिश्ता सिर्फ भावनाओं तक सीमित नहीं होता। जरूरत पड़ने पर यही रिश्ता एक मां को ऐसी ताकत दे सकता है, जिसके सामने बड़े से बड़ा खतरा भी छोटा लगने लगता है। ‘गांधारी’ इसी विचार को एक रॉ और तनावपूर्ण एक्शन-थ्रिलर के रूप में पेश करती है।
फिल्म की कहानी बानी के इर्द-गिर्द घूमती है। उसकी छोटी बेटी मिष्टी अचानक गायब हो जाती है। पुलिस और परिस्थितियों के भरोसे बैठने के बजाय बानी खुद अपनी बेटी को खोजने निकल पड़ती है। यह तलाश उसे धीरे-धीरे जॉयपुरा के अपराध की ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां हर कदम पर खतरा है।
फिल्म की खास बात यह है कि यहां एक्शन सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है। बानी की लड़ाई के पीछे उसकी बेटी को वापस पाने की बेचैनी है और यही भावनात्मक आधार फिल्म को मजबूती देता है।
क्या है ‘गांधारी’ की कहानी?
कहानी की शुरुआत बानी, उसके पति गोकुल और उनकी छोटी बेटी मिष्टी की ट्रेन यात्रा से होती है। परिवार पश्चिम बंगाल के एक छोटे स्टेशन जॉयपुरा पहुंचता है। ट्रेन के रुकने पर गोकुल कुछ सामान लेने के लिए नीचे उतर जाता है। इसी दौरान बानी अपनी बेटी के साथ कोच के टॉयलेट के पास जाती है।
कुछ ही पलों में उसकी दुनिया बदल जाती है।
मिष्टी अचानक गायब हो जाती है। बानी घबराकर ट्रेन में उसे खोजती है। तभी उसे खिड़की से बाहर एक महिला दिखाई देती है, जो उसकी बेटी को लेकर भाग रही होती है। बानी अपनी बेटी को बचाने के लिए ट्रेन से नीचे कूद जाती है और उस महिला का पीछा करती है।
लेकिन पीछा करते समय उसके सिर पर जोरदार चोट लगती है और वह बेहोश हो जाती है।
जब बानी को होश आता है, तब तक मिष्टी वहां नहीं होती। चोट के कारण उसकी आंखों पर भी असर पड़ता है और डॉक्टर उसे आंखों पर पट्टी बांधकर रखने की सलाह देते हैं। मगर बेटी को खोने का डर और उसे वापस पाने की चाह बानी को आराम करने नहीं देती।
यहीं से फिल्म की असली कहानी शुरू होती है।
बानी एक-एक सुराग जोड़ते हुए उस दुनिया तक पहुंचने की कोशिश करती है, जहां उसकी बेटी को रखा गया है। रास्ते में उसे अपराधियों, हिंसा और कई खतरनाक लोगों का सामना करना पड़ता है।
फिल्म का शीर्षक भी कहानी के एक महत्वपूर्ण प्रतीक से जुड़ा है। महाभारत की गांधारी ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधी थी। फिल्म में बानी की आंखों पर बंधी पट्टी उसके संघर्ष और बेटी के लिए किए जा रहे त्याग का प्रतीक बन जाती है।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, सवाल बढ़ते जाते हैं। मिष्टी को किसने अगवा किया? इसके पीछे कौन लोग हैं? जॉयपुरा में चल रहे अपराध के नेटवर्क का सच क्या है? और क्या बानी अपनी बेटी को सुरक्षित वापस ला पाएगी?
फिल्म इन सवालों के जवाब धीरे-धीरे सामने लाती है।
तापसी पन्नू ने संभाली फिल्म की कमान
‘गांधारी’ की सबसे बड़ी ताकत तापसी पन्नू हैं। बानी के किरदार में वह शुरुआत में एक परेशान और बेबस मां के रूप में दिखाई देती हैं। बेटी के गायब होने के बाद उनके चेहरे पर डर, बेचैनी और असहायता साफ नजर आती है।
लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ बानी का दूसरा रूप सामने आता है। वह डरने के बजाय खतरे का सामना करने लगती है। बेटी को बचाने के लिए वह शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर संघर्ष करती है।
तापसी ने इस बदलाव को काफी प्रभावी तरीके से निभाया है। खासकर एक्शन और तनावपूर्ण दृश्यों में उनका अभिनय फिल्म को संभालता है।
सपोर्टिंग कास्ट भी रही मजबूत
इश्वाक सिंह ने गोकुल के किरदार में संतुलित अभिनय किया है। जतिन सरना भी अपनी भूमिका में प्रभाव छोड़ते हैं। वहीं छाया कदम, स्वस्तिका मुखर्जी और मीता वशिष्ठ जैसे अनुभवी कलाकार कहानी को अतिरिक्त वजन देते हैं।
इन कलाकारों को हर जगह लंबा स्क्रीन टाइम नहीं मिलता, लेकिन उनकी मौजूदगी कहानी के माहौल को मजबूत करती है।
मिष्टी के किरदार में मायरा शिवन भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पूरी कहानी का भावनात्मक केंद्र उनका गायब होना ही है।
देवाशीष मखीजा का रॉ अंदाज
निर्देशक देवाशीष मखीजा ने ‘गांधारी’ को जरूरत से ज्यादा चमकदार एक्शन फिल्म बनाने की कोशिश नहीं की है। फिल्म का माहौल काफी कच्चा, अंधेरा और वास्तविक रखा गया है।
एक्शन दृश्यों में भी अत्यधिक स्टाइलाइजेशन के बजाय जमीन से जुड़ी हिंसा दिखाई देती है। इससे बानी का संघर्ष ज्यादा वास्तविक महसूस होता है।
निर्देशन की एक और खासियत यह है कि फिल्म सिर्फ एक्शन पर निर्भर नहीं रहती। कहानी में मां की भावनात्मक स्थिति और उसकी मानसिक उथल-पुथल को भी पर्याप्त जगह दी गई है।
यही वजह है कि ‘गांधारी’ एक सामान्य रिवेंज या एक्शन थ्रिलर से कुछ अलग महसूस होती है।
कहानी और पटकथा में क्या अच्छा है?
फिल्म की शुरुआत दर्शकों को जल्दी कहानी से जोड़ देती है। बेटी का अचानक गायब होना और उसके बाद बानी का उसे तलाशना कहानी में तुरंत तनाव पैदा करता है।
जॉयपुरा की पृष्ठभूमि भी फिल्म के माहौल को डरावना बनाने में मदद करती है। अपराध की दुनिया को बहुत ज्यादा ग्लैमरस बनाने के बजाय उसे अंधेरे और खतरनाक रूप में पेश किया गया है।
हालांकि, कहानी के आगे बढ़ने के साथ कुछ घटनाओं का अनुमान दर्शक पहले लगा सकते हैं। खासकर इंटरवल के बाद पटकथा के कुछ हिस्सों में रहस्य का प्रभाव थोड़ा कम होता है।
इसके बावजूद फिल्म अपनी मुख्य कहानी से बहुत ज्यादा भटकती नहीं है।
बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन असरदार
‘गांधारी’ के तकनीकी पक्ष में बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन खास तौर पर ध्यान खींचते हैं। कई दृश्यों में संगीत से ज्यादा आसपास की आवाजों का इस्तेमाल तनाव पैदा करता है।
बानी की बेचैनी और डर को सिर्फ संवादों से नहीं, बल्कि साउंड के जरिए भी महसूस कराया गया है। इससे फिल्म का अंधेरा और असहज माहौल और प्रभावी बनता है।
करीब 1 घंटा 55 मिनट की लंबाई भी फिल्म के लिए अच्छी है। कहानी बहुत ज्यादा खिंचती नहीं है और एडिटिंग इसे अपेक्षाकृत चुस्त बनाए रखती है।
क्या ‘गांधारी’ देखनी चाहिए?
अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जिनमें मां-बेटी का भावनात्मक रिश्ता, अपराध की दुनिया, रॉ एक्शन और सस्पेंस एक साथ देखने को मिले, तो ‘गांधारी’ आपके लिए एक अच्छा ओटीटी विकल्प हो सकती है।
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी तापसी पन्नू का अभिनय और देवाशीष मखीजा का रॉ निर्देशन है। कहानी में कुछ ऐसे मोड़ भी हैं जिन्हें दर्शक पहले भांप सकते हैं, लेकिन फिल्म का भावनात्मक आधार और लगातार बना रहने वाला तनाव इसकी कमियों को काफी हद तक संभाल लेता है।
हमारी रेटिंग: 3.5/5
कुल मिलाकर, ‘गांधारी’ सिर्फ मारधाड़ और बदले की कहानी नहीं है। यह एक ऐसी मां की कहानी है, जो अपनी बेटी को वापस पाने के लिए अपने डर, दर्द और सीमाओं से आगे निकल जाती है। तापसी पन्नू का दमदार और खौफनाक अवतार इस फिल्म को एक बार देखने लायक बनाता है।


