2 करोड़ रुपये को 10 करोड़ रुपये में बदलना सुनने में भले ही आसान लगे, लेकिन जैसे-जैसे निवेश का पोर्टफोलियो बड़ा होता है, जोखिम भी उसी अनुपात में बढ़ने लगता है। फाइनेंशियल एडवाइजर कपिल जैन के मुताबिक, बड़े पोर्टफोलियो में सिर्फ ज्यादा रिटर्न कमाना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि समय के साथ कमाई हुई संपत्ति को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।
हर निवेशक चाहता है कि उसका पैसा तेजी से बढ़े और कंपाउंडिंग की ताकत से छोटी रकम समय के साथ बड़ा कॉर्पस बन जाए। इसके लिए निवेशकों को अक्सर लंबे समय तक बाजार में बने रहने, नियमित निवेश करने और बाजार के उतार-चढ़ाव को नजरअंदाज करने की सलाह दी जाती है। शुरुआती दौर में यह रणनीति काफी कारगर भी साबित हो सकती है।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब निवेश का पोर्टफोलियो कुछ लाख या कुछ करोड़ रुपये से बढ़कर कई करोड़ रुपये का हो जाता है। उस समय बाजार में होने वाली छोटी प्रतिशत की गिरावट भी वास्तविक रुपये में बहुत बड़ा नुकसान पैदा कर सकती है। यही वजह है कि 2 करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये तक पहुंचने के सफर में सिर्फ निवेश करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय के साथ निवेश की रणनीति बदलना भी जरूरी है।
फाइनेंशियल एडवाइजर कपिल जैन ने 45 साल के एक निवेशक का उदाहरण देते हुए बताया है कि अगर किसी व्यक्ति के पास 2 करोड़ रुपये हैं और वह अगले 10 साल में इसे 10 करोड़ रुपये तक पहुंचाना चाहता है, तो उसे अपने पोर्टफोलियो के आकार के साथ अपनी रणनीति पर भी दोबारा विचार करना चाहिए।
शुरुआत में कंपाउंडिंग और SIP बनाती है रफ्तार
निवेश के शुरुआती दौर में नियमित निवेश और इक्विटी जैसे ग्रोथ एसेट्स पोर्टफोलियो को तेजी से बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। अगर निवेशक लंबी अवधि के लिए बाजार में बना रहता है और बीच की गिरावट के दौरान घबराकर निवेश बंद नहीं करता, तो कंपाउंडिंग का फायदा मिलने की संभावना बढ़ती है।
यही वजह है कि शुरुआती वर्षों में SIP को निवेश की एक मजबूत रणनीति माना जाता है। निवेशक नियमित अंतराल पर पैसा लगाता रहता है और बाजार की लंबी अवधि की ग्रोथ का फायदा लेने की कोशिश करता है।
लेकिन यहां सबसे बड़ी गलती यह हो सकती है कि निवेशक शुरुआती रणनीति को ही हमेशा के लिए अपना नियम मान ले। जब पोर्टफोलियो छोटा होता है, तब बाजार की गिरावट रुपये के लिहाज से अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। लेकिन पोर्टफोलियो के करोड़ों रुपये तक पहुंचने के बाद यही प्रतिशत गिरावट बड़ी रकम में बदल जाती है।
इसलिए 2 करोड़ रुपये के पोर्टफोलियो और 10 करोड़ रुपये के पोर्टफोलियो के लिए एक जैसी रणनीति अपनाना जरूरी नहीं है।
5 करोड़ रुपये के पोर्टफोलियो में 25% गिरावट का मतलब समझिए
मान लीजिए किसी निवेशक का पोर्टफोलियो बढ़कर 5 करोड़ रुपये हो गया है। अगर बाजार में 25 फीसदी की गिरावट आती है और पोर्टफोलियो भी लगभग उतनी ही गिरावट झेलता है, तो उसकी वैल्यू करीब 1.25 करोड़ रुपये कम हो सकती है।
यानी 5 करोड़ रुपये का पोर्टफोलियो गिरकर लगभग 3.75 करोड़ रुपये रह सकता है।
प्रतिशत के लिहाज से 25 फीसदी गिरावट बाजार में असामान्य घटना नहीं है। लेकिन 5 करोड़ रुपये के निवेशक के लिए इसका असर 1.25 करोड़ रुपये का हो सकता है। अब इस नुकसान की भरपाई सिर्फ कुछ महीनों की SIP से करना आसान नहीं होगा।
यही वह चरण है जहां निवेशक को समझना चाहिए कि पोर्टफोलियो जितना बड़ा होता जाता है, पूंजी की सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण होती जाती है।
10 करोड़ रुपये पर 25% गिरावट कितनी बड़ी होगी?
अब इसी उदाहरण को 10 करोड़ रुपये के पोर्टफोलियो पर लागू करके देखिए।
अगर बाजार 25 फीसदी गिरता है, तो 10 करोड़ रुपये के पोर्टफोलियो की वैल्यू करीब 2.5 करोड़ रुपये तक कम हो सकती है। यानी निवेशक के पास 7.5 करोड़ रुपये की वैल्यू रह सकती है, बशर्ते पोर्टफोलियो बाजार के अनुरूप समान गिरावट दर्ज करे।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिशत गिरावट वही है, लेकिन रुपये में नुकसान दोगुना हो गया।
यही कारण है कि बड़े पोर्टफोलियो वाले निवेशकों के लिए सिर्फ अधिकतम रिटर्न हासिल करने की कोशिश करना हमेशा सही रणनीति नहीं हो सकती। उन्हें यह भी देखना होता है कि किसी बड़े बाजार करेक्शन की स्थिति में उनकी संपत्ति कितनी सुरक्षित रह सकती है।
2 करोड़ से 10 करोड़ का सफर सिर्फ कंपाउंडिंग का खेल नहीं
अगर कोई निवेशक 2 करोड़ रुपये को 10 करोड़ रुपये बनाना चाहता है, तो उसे लंबी अवधि में मजबूत रिटर्न की जरूरत होगी। लेकिन केवल अनुमानित रिटर्न देखकर लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं है।
निवेशक को यह भी समझना होगा कि बाजार सीधी रेखा में ऊपर नहीं जाता। रास्ते में तेज गिरावट, करेक्शन, आर्थिक अनिश्चितता, ब्याज दरों में बदलाव और अलग-अलग सेक्टर के प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
इसलिए 2 करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये की यात्रा में निवेशक को तीन चीजों पर लगातार ध्यान देना चाहिए—ग्रोथ, जोखिम और पूंजी की सुरक्षा।
शुरुआती वर्षों में ग्रोथ पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है, लेकिन लक्ष्य के करीब पहुंचने पर जोखिम को नियंत्रित करने की जरूरत बढ़ सकती है।
‘एक ही रणनीति हमेशा काम नहीं करती’
कपिल जैन के मुताबिक निवेशकों की एक बड़ी गलती यह है कि वे पोर्टफोलियो के आकार में बदलाव के बावजूद अपनी रणनीति नहीं बदलते।
उदाहरण के लिए, जिस निवेशक ने 2 करोड़ रुपये से शुरुआत की है, उसके लिए बाजार में अधिक ग्रोथ हासिल करने की कोशिश स्वाभाविक हो सकती है। लेकिन जब वही पोर्टफोलियो 8-10 करोड़ रुपये के करीब पहुंचने लगे, तो निवेशक को यह सवाल भी पूछना चाहिए कि अगर बाजार में बड़ी गिरावट आती है तो क्या वह अपने लक्ष्य से बहुत पीछे चला जाएगा?
इस स्थिति में पोर्टफोलियो की नियमित समीक्षा और रीबैलेंसिंग महत्वपूर्ण हो जाती है।
रीबैलेंसिंग का मतलब है कि निवेशक समय-समय पर अपने अलग-अलग एसेट क्लास के वजन की समीक्षा करे और जरूरत के मुताबिक पोर्टफोलियो में बदलाव करे। इसका उद्देश्य बाजार का हर उतार-चढ़ाव पकड़ना नहीं, बल्कि निवेश को अपने जोखिम और लक्ष्य के अनुरूप बनाए रखना है।
लक्ष्य के करीब पहुंचने पर पूंजी बचाना भी जरूरी
मान लीजिए किसी निवेशक का लक्ष्य 10 करोड़ रुपये है और उसका पोर्टफोलियो पहले ही 8-9 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इस समय सिर्फ ज्यादा रिटर्न के लिए अत्यधिक जोखिम लेना उल्टा भी पड़ सकता है।
अगर बाजार में बड़ी गिरावट आती है, तो निवेशक अपने लक्ष्य से कई साल पीछे जा सकता है। इसलिए लक्ष्य के करीब पहुंचने पर निवेशक को अपनी जोखिम क्षमता, समयसीमा और वित्तीय जरूरतों की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए।
इसका मतलब यह नहीं है कि निवेशक को पूरी तरह बाजार से बाहर निकल जाना चाहिए। बल्कि जरूरी यह है कि पोर्टफोलियो में मौजूद जोखिम को उसके लक्ष्य और समयसीमा के हिसाब से समझदारी से मैनेज किया जाए।
निवेशकों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
2 करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये तक का सफर लंबी अवधि का वित्तीय लक्ष्य है। इसमें किसी एक फॉर्मूले की गारंटी नहीं होती। बाजार का भविष्य निश्चित रूप से बताना संभव नहीं है। ऐसे में निवेशक को अपनी रणनीति को लचीला रखना चाहिए।
पहला, पोर्टफोलियो की समय-समय पर समीक्षा करें और देखें कि मौजूदा निवेश आपके लक्ष्य के अनुरूप हैं या नहीं।
दूसरा, अलग-अलग एसेट क्लास और निवेश साधनों में उचित डायवर्सिफिकेशन पर ध्यान दें। एक ही सेक्टर, स्टॉक या एसेट में अत्यधिक पैसा लगाने से जोखिम बढ़ सकता है।
तीसरा, बाजार में तेज गिरावट आने पर घबराकर फैसले लेने से बचें। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में निवेश बनाए रखना ही सही है। निवेशक को अपनी वित्तीय स्थिति और लक्ष्य के आधार पर फैसला लेना चाहिए।
चौथा, जैसे-जैसे पोर्टफोलियो बड़ा होता जाए, पूंजी संरक्षण को भी रणनीति का हिस्सा बनाएं।
पांचवां, लक्ष्य के करीब पहुंचने पर जोखिम और एसेट एलोकेशन की समीक्षा करें। जरूरत पड़ने पर वित्तीय सलाहकार से व्यक्तिगत सलाह ली जा सकती है।
निष्कर्ष: पैसा बढ़ाना जितना जरूरी, उसे बचाना भी उतना ही जरूरी
2 करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये तक पहुंचने का लक्ष्य असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए लंबी अवधि, अनुशासन और उचित जोखिम प्रबंधन की जरूरत होती है। निवेशक की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ पोर्टफोलियो को बढ़ाना नहीं, बल्कि बढ़ते पोर्टफोलियो को बड़े बाजार उतार-चढ़ाव से संभालना भी है।
कपिल जैन के उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि एक ही निवेश रणनीति को हर चरण में लागू करना सही नहीं हो सकता। 2 करोड़ रुपये के पोर्टफोलियो पर जो जोखिम स्वीकार्य लग सकता है, वही जोखिम 8-10 करोड़ रुपये के पोर्टफोलियो में बहुत बड़ा हो सकता है।
इसलिए जैसे-जैसे संपत्ति बढ़ती है, निवेशक को अपनी रणनीति, एसेट एलोकेशन और जोखिम क्षमता की समीक्षा करते रहना चाहिए। आखिरकार, 10 करोड़ रुपये तक पहुंचना केवल पैसा कमाने की कहानी नहीं है; उस पैसे को सही समय तक सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। इसमें दिए गए उदाहरण किसी व्यक्ति विशेष के लिए निवेश सलाह नहीं हैं। म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार और अन्य बाजार आधारित निवेश में जोखिम रहता है। निवेश से पहले अपनी वित्तीय स्थिति, जोखिम क्षमता और निवेश लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए योग्य वित्तीय सलाहकार से सलाह लें।


