नई दिल्ली। देश में थोक स्तर पर महंगाई का दबाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर बढ़कर 9.68 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अप्रैल 2026 में यह दर 8.26 प्रतिशत थी। लगातार दूसरे महीने आई इस तेजी का सबसे बड़ा कारण ईंधन, बिजली और मिनरल ऑयल की कीमतों में उछाल बताया जा रहा है।
इस बार जारी आंकड़ों की एक और बड़ी खासियत यह है कि सरकार ने WPI की नई सीरीज लागू कर दी है। अब थोक मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 2011-12 की जगह 2022-23 कर दिया गया है। सरकार का मानना है कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान संरचना को अधिक सटीक रूप से दर्शाया जा सकेगा।
मई 2026 में कितनी रही थोक महंगाई?
DPIIT की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार मई 2026 में सालाना WPI महंगाई दर 9.68 प्रतिशत दर्ज की गई। अप्रैल में यह 8.26 प्रतिशत थी। यानी एक महीने में करीब 1.42 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है।
थोक महंगाई में बढ़ोतरी का मुख्य कारण ऊर्जा क्षेत्र में कीमतों का तेज उछाल रहा। खासकर कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और बिजली उत्पादन लागत में वृद्धि का असर व्यापक रूप से देखने को मिला।
मई 2026 में प्रमुख समूहों की महंगाई दर इस प्रकार रही:
| समूह | महंगाई दर (YoY) |
|---|---|
| सभी वस्तुएं | 9.68% |
| प्राथमिक वस्तुएं | 4.99% |
| ईंधन एवं बिजली | 30.33% |
| विनिर्मित उत्पाद | 7.48% |
| खाद्य सूचकांक | 4.49% |
आंकड़े बताते हैं कि ईंधन और बिजली समूह में महंगाई 30 प्रतिशत से अधिक पहुंच चुकी है, जो उद्योगों और परिवहन क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
ईंधन और बिजली क्यों बने महंगाई के सबसे बड़े कारण?
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और घरेलू उत्पादन लागत बढ़ने से बिजली तथा ईंधन की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
जब ईंधन महंगा होता है तो उसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों, निर्माण सामग्री, उपभोक्ता वस्तुओं और औद्योगिक उत्पादों की कीमतों पर भी असर पड़ता है।
यही कारण है कि थोक स्तर पर महंगाई बढ़ने के बाद आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई (CPI) पर भी दबाव देखने को मिल सकता है।
नई WPI सीरीज में क्या-क्या बदला?
भारत सरकार ने अर्थव्यवस्था के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए WPI बास्केट में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं।
नई सीरीज में वस्तुओं की कुल संख्या 697 से बढ़ाकर 957 कर दी गई है। इससे सूचकांक अब पहले की तुलना में अधिक व्यापक और प्रतिनिधिक माना जा रहा है।
इसके अलावा पहली बार सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु बिजली जैसे आधुनिक ऊर्जा स्रोतों को भी बिजली समूह में शामिल किया गया है। सरकार का मानना है कि भारत की ऊर्जा संरचना तेजी से बदल रही है और नई सीरीज उसी बदलाव को दर्शाती है।
एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को प्राथमिक वस्तुओं की श्रेणी से हटाकर ईंधन एवं बिजली समूह में शामिल कर दिया गया है।
GVO आधारित वेटेज से क्या होगा फायदा?
नई WPI सीरीज में वस्तुओं के वेटेज तय करने के लिए अब Gross Value of Output (GVO) का उपयोग किया गया है।
पहले की प्रणाली में कई बार उद्योगों के वास्तविक योगदान का सही प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता था। GVO आधारित वेटेज से घरेलू उत्पादन संरचना और आर्थिक गतिविधियों की बेहतर तस्वीर सामने आएगी।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इससे नीति निर्माताओं को अधिक सटीक आंकड़े मिलेंगे और आर्थिक निर्णय लेने में मदद मिलेगी।
भारत अब PPI सिस्टम की ओर बढ़ रहा
वैश्विक मानकों के अनुरूप भारत अब Producer Price Index (PPI) लागू करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य वैश्विक संस्थाएं लंबे समय से सदस्य देशों को PPI आधारित मूल्य सूचकांक अपनाने की सलाह देती रही हैं। PPI उत्पादकों को मिलने वाली कीमतों में बदलाव को मापता है और इसे महंगाई का अधिक आधुनिक संकेतक माना जाता है।
सरकार ने घोषणा की है कि अगले पांच वर्षों तक WPI और PPI दोनों सूचकांक समानांतर रूप से जारी किए जाएंगे। इसके बाद धीरे-धीरे WPI को समाप्त किया जा सकता है।
किन सेवाओं के लिए शुरू हुआ Service PPI?
PPI के पहले चरण में सात प्रमुख सेवा क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
इनमें बैंकिंग, बीमा, दूरसंचार, रेलवे, विमानन यात्री सेवाएं और अन्य प्रमुख सेवा क्षेत्र शामिल हैं। इससे पहली बार सेवा क्षेत्र में लागत और मूल्य परिवर्तनों को व्यवस्थित रूप से मापा जा सकेगा।
भारत की GDP में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में Service PPI को भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
उद्योगों और आम लोगों पर क्या होगा असर?
थोक महंगाई बढ़ने का सीधा असर उद्योगों की लागत पर पड़ता है। जब उत्पादन लागत बढ़ती है तो कंपनियां धीरे-धीरे उसका बोझ उपभोक्ताओं पर डालती हैं।
यदि आने वाले महीनों में ईंधन और बिजली की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो उपभोक्ता वस्तुओं, निर्माण सामग्री, परिवहन और लॉजिस्टिक्स सेवाओं की लागत बढ़ सकती है।
हालांकि खाद्य महंगाई फिलहाल 4.49 प्रतिशत पर बनी हुई है, जो अपेक्षाकृत नियंत्रित स्तर माना जा रहा है। लेकिन ऊर्जा कीमतों में तेजी बनी रही तो इसका असर खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर भी दिखाई दे सकता है।
आगे क्या देख रहे हैं अर्थशास्त्री?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें और घरेलू ऊर्जा लागत WPI की दिशा तय करेंगी। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो थोक महंगाई और बढ़ सकती है।
दूसरी ओर यदि ऊर्जा कीमतों में स्थिरता आती है तो महंगाई दबाव धीरे-धीरे कम हो सकता है। फिलहाल मई 2026 के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि भारत में उत्पादन लागत पर दबाव बढ़ रहा है और नीति निर्माताओं को इस पर करीबी नजर रखनी होगी।


