नई दिल्ली। भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) की लोकप्रियता और लोगों के भरोसे को बनाए रखने के लिए प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) ढांचे को तर्कसंगत बनाना जरूरी है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे की एक रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, UPI पर शुल्क लगाने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे डिजिटल भुगतान की सुविधा प्रभावित न हो और इसके विस्तार के लिए जरूरी राजस्व जुटाने का रास्ता भी बना रहे।
UPI देश में डिजिटल लेनदेन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारियों तक, इसका इस्तेमाल भुगतान स्वीकार करने के लिए किया जाता है। इसकी आसान प्रक्रिया और व्यापक स्वीकार्यता ने ग्राहकों के लिए लेनदेन को सुविधाजनक बनाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि UPI जैसे सार्वजनिक डिजिटल बुनियादी ढांचे से अर्थव्यवस्था की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली है और इसके दीर्घकालिक आर्थिक लाभ व्यापारियों से शुल्क के रूप में मिलने वाली अतिरिक्त आय से कहीं अधिक हो सकते हैं।
क्या है MDR और UPI के लिए क्यों अहम है यह व्यवस्था?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर व्यापारी से लिया जा सकता है। भुगतान व्यवस्था में इस शुल्क का इस्तेमाल लेनदेन से जुड़ी सेवाओं और बुनियादी ढांचे की लागत को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, UPI के मामले में शुल्क की व्यवस्था तय करना एक महत्वपूर्ण नीतिगत विषय है, क्योंकि इसका असर कारोबारियों के साथ-साथ ग्राहकों की भुगतान संबंधी आदतों पर भी पड़ सकता है।
IIT बॉम्बे की रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यदि प्रस्तावित MDR ढांचे को मौजूदा स्वरूप में लागू किया जाता है, तो UPI को लेकर लोगों की धारणा प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, शुल्क संबंधी नीतियां बनाते समय इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि यूजर को डिजिटल भुगतान के इस्तेमाल में अनावश्यक बाधाओं का सामना न करना पड़े।
50 करोड़ रुपये के कारोबार वाले व्यापारियों पर हो फोकस
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सालाना 50 करोड़ रुपये या उससे अधिक का कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए UPI को भुगतान स्वीकार करने के अनिवार्य साधन के रूप में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके साथ ही, MDR लागू करने के दायरे को भी इस कारोबार सीमा के आधार पर तर्कसंगत बनाने की बात कही गई है।
रिपोर्ट का तर्क है कि यदि MDR केवल 50 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक कारोबार वाले व्यापारियों पर लागू किया जाता है, तो प्रस्तावित राजस्व का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा जुटाया जा सकता है। इस तरह अपेक्षाकृत छोटे कारोबारियों पर शुल्क का बोझ डालने से बचते हुए राजस्व जुटाने का एक विकल्प तैयार हो सकता है।
यह सुझाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि छोटे व्यापारियों के लिए भुगतान संबंधी अतिरिक्त लागत कारोबार की लाभप्रदता को प्रभावित कर सकती है। वहीं, बड़े कारोबारियों के लिए डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ी लागत और शुल्क की संरचना को अलग तरीके से निर्धारित करने पर विचार किया जा सकता है।
राजस्व और डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता के बीच संतुलन जरूरी
IIT बॉम्बे की रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि MDR ढांचे में बदलाव करते समय दो प्रमुख उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए। पहला, UPI के बुनियादी ढांचे और उसके विस्तार के लिए आवश्यक राजस्व जुटाना और दूसरा, आम लोगों तथा कारोबारियों के बीच इसकी सुलभता और स्वीकार्यता बनाए रखना।
UPI की सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण इसका आसान इस्तेमाल और व्यापक पहुंच है। ऐसे में शुल्क संबंधी किसी भी प्रस्ताव का असर केवल भुगतान सेवा प्रदाताओं या व्यापारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे डिजिटल भुगतान के पूरे इकोसिस्टम पर प्रभाव पड़ सकता है।
रिपोर्ट के सुझावों के अनुसार, MDR की व्यवस्था इस तरह तैयार की जानी चाहिए कि बड़े कारोबारियों से राजस्व जुटाने की संभावनाओं का इस्तेमाल किया जा सके, जबकि छोटे व्यापारियों और आम यूजर्स के लिए डिजिटल भुगतान को सुविधाजनक बनाए रखने का प्रयास जारी रहे।
फिलहाल, रिपोर्ट में दिए गए सुझावों को प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था पर विचार के लिए नीतिगत सिफारिशों के रूप में देखा जाना चाहिए। इन्हें अपने आप लागू हो चुका नियम नहीं माना जाना चाहिए। MDR से जुड़े किसी भी अंतिम निर्णय के लिए संबंधित आधिकारिक घोषणा और लागू दिशानिर्देशों की पुष्टि जरूरी होगी।
Source: समाचार एजेंसी PTI की रिपोर्ट पर आधारित।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी रिपोर्ट में बताए गए सुझावों पर आधारित है। MDR से जुड़े नियमों और उनके लागू होने की स्थिति के लिए संबंधित आधिकारिक अधिसूचनाओं को प्राथमिकता दें।


