ब्रिटेन में रह रही भारतीय महिला अनुष्का व्यास का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने इस वीडियो के जरिए UK और भारत में 9-5 की नौकरी करने वाले लोगों की ऑफिस के बाद की जिंदगी के बीच अंतर दिखाने की कोशिश की है। अनुष्का ने बताया कि UK में काम खत्म होने के बाद लोग परिवार, फिटनेस और अपनी निजी जिंदगी के लिए समय निकाल लेते हैं, जबकि भारत में लंबा सफर, ट्रैफिक और अतिरिक्त काम कई लोगों का बाकी समय भी ले लेते हैं।
गुरुवार शाम 5:30 बजे पार्क का दिखाया नजारा
अनुष्का ने इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए वीडियो में गुरुवार शाम करीब 5:30 बजे अपने घर के पास स्थित एक पार्क का नजारा दिखाया। उन्होंने बताया कि यह न तो वीकेंड था और न ही कोई छुट्टी का दिन। इसके बावजूद पार्क में लोग परिवार के साथ समय बिताते, पिकनिक करते और फिटनेस एक्टिविटीज में शामिल होते नजर आए।
अनुष्का ने इसी दृश्य को UK की वर्क-लाइफ बैलेंस वाली जिंदगी का उदाहरण बताया। उनके मुताबिक, नौकरी का दिन खत्म होने के बाद भी लोगों के पास अपने लिए समय बचता है।
‘काम के बाद भी जिंदगी बचती है’
अनुष्का के मुताबिक, UK में नौकरी खत्म होने के बाद शाम का पूरा समय केवल घर लौटने और थकान उतारने में नहीं निकलता। लोग परिवार के साथ बाहर जा सकते हैं, पार्क में घूम सकते हैं, एक्सरसाइज कर सकते हैं या दोस्तों से मिल सकते हैं।
हालांकि, यह अनुभव हर व्यक्ति और हर नौकरी के लिए एक जैसा हो, ऐसा जरूरी नहीं है। अलग-अलग शहरों, नौकरियों और काम के घंटों के कारण लोगों की दिनचर्या में काफी अंतर हो सकता है।
भारत में 9-5 के बाद शुरू होती है दूसरी जद्दोजहद?
अनुष्का ने भारत की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि कई लोगों के लिए ऑफिस का समय खत्म होने का मतलब दिन का काम खत्म होना नहीं होता। ऑफिस से घर तक पहुंचने में लंबा सफर और ट्रैफिक काफी समय ले सकता है।
इसके अलावा कुछ कर्मचारियों को ऑफिस के बाद अतिरिक्त काम, कॉल या मीटिंग का सामना भी करना पड़ता है। ऐसे में घर पहुंचते-पहुंचते शाम काफी आगे बढ़ जाती है और परिवार या खुद के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है।
वीकेंड भी बन जाता है आराम का दिन
अनुष्का ने यह भी बताया कि पूरे हफ्ते की थकान के बाद कई लोग वीकेंड का इस्तेमाल सिर्फ आराम करने में कर देते हैं। इससे परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताने, दोस्तों से मिलने या फिटनेस पर ध्यान देने के लिए कम समय बचता है।
यही वजह है कि वर्क-लाइफ बैलेंस का मुद्दा केवल ऑफिस के घंटों तक सीमित नहीं है। इसमें आने-जाने का समय, काम के बाद की जिम्मेदारियां और व्यक्ति को मिलने वाला निजी समय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘सिर्फ पैसा नहीं, क्वालिटी ऑफ लाइफ भी जरूरी’
अनुष्का के मुताबिक, विदेश में रहने का फैसला करने वाले कुछ भारतीयों के लिए सिर्फ सैलरी या कमाई ही महत्वपूर्ण नहीं होती। बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस, परिवार के लिए समय, सुरक्षित माहौल और अपनी पसंद की जिंदगी जीने का अवसर भी फैसले को प्रभावित कर सकता है।
उनकी बात का मुख्य फोकस यही था कि अच्छी नौकरी के साथ-साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि व्यक्ति के पास उस कमाई और करियर के बीच अपनी जिंदगी जीने के लिए कितना समय बचता है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर बहस शुरू हो गई। कुछ यूजर्स ने UK में दिखाए गए माहौल को बेहतर बताया, जबकि कुछ लोगों ने कहा कि भारत में भी वर्क कल्चर और कर्मचारियों के निजी समय को लेकर बदलाव की जरूरत है।
कुछ यूजर्स ने UK के इस अनुभव को बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस से जोड़ा, जबकि अन्य ने इसे हर व्यक्ति पर लागू नहीं होने वाला अनुभव बताया। यानी सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर राय बंटी हुई नजर आई।
क्या UK में हर किसी की जिंदगी ऐसी ही है?
यह ध्यान रखना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर दिखाई गई कुछ तस्वीरों या वीडियो के आधार पर पूरे देश की वर्क कल्चर को परिभाषित नहीं किया जा सकता। UK में भी नौकरी, शहर, यात्रा की दूरी, काम के घंटे और पारिवारिक जिम्मेदारियों के अनुसार लोगों की जिंदगी अलग-अलग हो सकती है।
इसी तरह भारत में भी कई कंपनियां हाइब्रिड वर्क, फ्लेक्सिबल टाइमिंग और बेहतर कर्मचारी सुविधाओं पर ध्यान दे रही हैं। इसलिए UK और भारत के बीच वर्क-लाइफ बैलेंस की तुलना को एक व्यक्तिगत अनुभव के तौर पर देखना ज्यादा उचित है।
निष्कर्ष
अनुष्का व्यास का वीडियो एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठाता है—9-5 की नौकरी के बाद क्या किसी व्यक्ति के पास अपनी जिंदगी के लिए पर्याप्त समय बचता है? करियर और कमाई जरूरी हैं, लेकिन परिवार, स्वास्थ्य, आराम और निजी जिंदगी के लिए समय भी जीवन की गुणवत्ता का अहम हिस्सा है। यही वजह है कि उनके वीडियो ने सोशल मीडिया पर वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर चर्चा छेड़ दी है।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूजर द्वारा शेयर किए गए कंटेंट और उनके दावों पर आधारित है। NewsJagran इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।


