Tukaram Mundhe: बॉम्बे हाई कोर्ट ने चर्चित IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे की अगुवाई वाले महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के काम करने के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताई है। शनिवार, 29 अगस्त को दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने FDA की कार्रवाई और अपनाई गई प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट की टिप्पणियों के बाद FDA को मुंबई के MCA परिसर में चल रहे पांच रेस्टोरेंट के खिलाफ कार्रवाई वापस लेने के साथ-साथ पुणे में सिप्ला की एक फैसिलिटी के लाइसेंस रद्द करने का आदेश भी वापस लेना पड़ा।
अदालत ने FDA पर कुछ मामलों में जल्दबाजी में फैसला लेने और कानून का पर्याप्त विश्लेषण नहीं करने का आरोप लगाया। एक मामले में कोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं होने पर भी सवाल उठाया।
MCA के पांच रेस्टोरेंट मामले में कोर्ट ने लगाई फटकार
बॉम्बे हाई कोर्ट में सबसे तीखी टिप्पणी मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्थित मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (MCA) परिसर में चल रहे पांच रेस्टोरेंट से जुड़े मामले में सामने आई।
एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखाड की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान यह बताया गया कि नए निरीक्षण में इन रेस्टोरेंट ने फूड सेफ्टी नियमों का करीब 88 फीसदी पालन किया था।
FDA के रवैये पर सवाल उठाते हुए अदालत ने पूछा, “क्या आपको लगता है कि आप भगवान हैं? आप कुछ भी कर सकते हैं?”
कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि विभाग बार-बार बिना पर्याप्त विचार किए जल्दबाजी में कार्रवाई क्यों करता है।
अदालत ने कहा कि वह पहले भी FDA को मामलों में व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दे चुकी है। इसके बावजूद विभाग ने कथित तौर पर कानून की व्यावहारिक व्याख्या करने के बजाय किताबी रवैया अपनाया।
‘अधिकारियों को फटकार लगाते-लगाते थक चुके हैं’
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने FDA के अधिकारियों के रवैये पर बेहद सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि वह लगातार विभाग और अधिकारियों को फटकार लगाकर थक चुकी है और अब जरूरत पड़ने पर कड़े आदेश जारी किए जाएंगे।
पीठ ने अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी देते हुए अधिकारियों से जवाब मांगा। अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारियों को अपने फैसले की वजह समझानी होगी।
इस सख्त रुख के बाद FDA ने कोर्ट को बताया कि वह MCA परिसर के पांच रेस्टोरेंट का संचालन रोकने का आदेश वापस लेगा।
रेस्टोरेंट फिर से खोलने की मिली अनुमति
विवाद की एक बड़ी वजह यह थी कि संबंधित फूड लाइसेंस MCA के नाम पर जारी किए गए थे, जबकि परिसर में रेस्टोरेंट का संचालन M/s शिर्के इंफ्रास्ट्रक्चर कर रही थी।
FDA ने इसी आधार पर कार्रवाई की थी। हालांकि अदालत ने सवाल उठाया कि क्या कानून वास्तव में ऐसी व्यवस्था को प्रतिबंधित करता है।
कोर्ट ने कहा कि विभाग को कानून की व्यावहारिक व्याख्या करनी चाहिए और हर मामले में अत्यधिक कठोर कदम उठाना उचित नहीं है।
इसी संदर्भ में पीठ ने मशहूर उदाहरण देते हुए कहा, “मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल न करें।”
इसके बाद FDA ने MCA को नया नोटिस जारी करने और उसे M/s शिर्के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ हुए कॉन्ट्रैक्ट के बारे में अपना पक्ष रखने का अवसर देने पर सहमति जताई।
चूंकि नए निरीक्षण में रेस्टोरेंट फूड सेफ्टी नियमों का पालन करते पाए गए थे, इसलिए कोर्ट ने संचालन रोकने वाले आदेश को वापस लेने के फैसले को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही रेस्टोरेंट के दोबारा खुलने का रास्ता साफ हो गया।
सिप्ला के मामले में भी FDA को पीछे हटना पड़ा
दूसरा मामला पुणे के वाडकी स्थित सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड की कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग फैसिलिटी से जुड़ा था।
‘रिएक्टिन प्लस’ टैबलेट की पैकेजिंग और उसके रिकॉल से संबंधित फॉलो-अप जांच के दौरान कथित नियम उल्लंघन सामने आने के बाद FDA ने 27 अगस्त से संबंधित दवा बिक्री लाइसेंस रद्द कर दिए थे।
मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने FDA द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए।
छुट्टी के दिन सुनवाई के लिए बुलाने पर भी सवाल
कोर्ट के सामने यह बात भी आई कि FDA ने कंपनी के प्रतिनिधि को उस दिन सुनवाई के लिए बुलाने के संबंध में ईमेल भेजा था, जिस दिन राज्य सरकार की ओर से सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया था।
अदालत ने इस प्रक्रिया पर नाराजगी जताते हुए FDA से कहा कि वह अपने काम में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन उसे अपनी सीमाओं का भी ध्यान रखना चाहिए।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह पहली बार नहीं है जब विभाग की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। अदालत के मुताबिक इस मामले में FDA से गलती हुई और अब उसे इसे ठीक करना होगा।
इसके बाद FDA को सिप्ला की संबंधित फैसिलिटी के लाइसेंस रद्द करने का अपना फैसला वापस लेने की दिशा में कदम उठाना पड़ा।
तुकाराम मुंढे क्यों हैं चर्चा में?
IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे महाराष्ट्र में अपनी सख्त प्रशासनिक कार्यशैली के लिए लंबे समय से चर्चित रहे हैं। हाल के दिनों में FDA की मुंबई में खाद्य और पेय पदार्थों से जुड़े प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई के कारण उनका नाम फिर सुर्खियों में आया।
FDA की ओर से की गई कार्रवाई को लेकर कुछ मामलों में कानूनी चुनौती भी सामने आई। वहीं, विभाग का कहना रहा है कि खाद्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई तथ्यों, निरीक्षण और फूड सेफ्टी नियमों के अनुपालन की जरूरतों के आधार पर की गई।
हालांकि, ताजा मामलों में बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणियों ने FDA की कार्रवाई की प्रक्रिया और उसके फैसले लेने के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, दोनों मामलों में अदालत का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि नियामक संस्थाओं को कानून लागू करते समय प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और व्यावहारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए। सिर्फ नियमों की कठोर व्याख्या के आधार पर किसी प्रतिष्ठान के खिलाफ बड़ा कदम उठाना उचित नहीं हो सकता।
MCA मामले में रेस्टोरेंट के दोबारा खुलने और सिप्ला मामले में लाइसेंस रद्द करने के फैसले पर पीछे हटने से यह साफ है कि कोर्ट ने FDA की कार्रवाई में प्रक्रिया संबंधी कमियों को गंभीरता से लिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि खाद्य और दवा सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में नियामकीय सख्ती और व्यावहारिक प्रशासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।


