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Reading: Trump Russia Sanctions: रूस पर ट्रंप का बड़ा एक्शन, 100% टैरिफ वाले कानून पर साइन; भारत-चीन के लिए क्या बदलेगा?
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Trump Russia Sanctions: रूस पर ट्रंप का बड़ा एक्शन, 100% टैरिफ वाले कानून पर साइन; भारत-चीन के लिए क्या बदलेगा?

Namam Sharma
Last updated: 2026/09/19 at 8:57 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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12 Min Read
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Russia Sanctions Bill: अमेरिका और रूस के बीच बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने वाले नए कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस कानून से अमेरिकी प्रशासन को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है। भारत और चीन दुनिया के बड़े रूसी तेल खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए नए कानून ने दोनों देशों के लिए व्यापार और ऊर्जा के मोर्चे पर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है।

Contents
ट्रंप ने किस कानून पर हस्ताक्षर किए?100% टैरिफ का प्रावधान क्या है?भारत पर क्यों बढ़ा दबाव?चीन पर भी पड़ सकता है असरभारत के लिए तेल महंगा हुआ तो क्या होगा?भारत ने पहले ही जताई चिंताक्या भारत पर तुरंत 100% टैरिफ लगेगा?कानून कब प्रभावी होगा?शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा से पहले बढ़ा दबावभारत-अमेरिका व्यापार पर क्या असर पड़ेगा?रूस पर क्या है अमेरिकी रणनीति?आगे क्या देखना होगा?

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि कानून पर हस्ताक्षर होने का मतलब यह नहीं है कि भारत या चीन से आने वाले सभी सामान पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया गया है। कानून राष्ट्रपति को यह कार्रवाई करने की शक्ति देता है और वास्तविक दर तथा उसके इस्तेमाल का फैसला अमेरिकी प्रशासन करेगा।

ट्रंप ने किस कानून पर हस्ताक्षर किए?

अमेरिकी राष्ट्रपति ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पर 18 सितंबर को हस्ताक्षर किए। यह कानून रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र, रूसी अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों तथा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले नेटवर्क पर दबाव बढ़ाता है।

कानून में रूस के तेल कारोबार से जुड़े उन जहाजों और नेटवर्क को भी निशाना बनाया गया है जिन्हें मौजूदा पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे जहाजों के नेटवर्क को आम तौर पर ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है।

अमेरिकी संसद के प्रतिनिधि सभा ने इस विधेयक को 262-159 के वोट से पारित किया था। इससे पहले सीनेट में भी इसे मंजूरी मिल चुकी थी।

100% टैरिफ का प्रावधान क्या है?

नए कानून का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों से जुड़ा है। इसके तहत राष्ट्रपति को रूस के कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े खरीदार देशों से अमेरिका में आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है।

इसके अलावा रूस के तेल से जुड़े प्रतिबंधों को दरकिनार करने में मदद करने वाले प्रमुख देशों या संस्थाओं के खिलाफ भी टैरिफ संबंधी कार्रवाई का प्रावधान है। कानून में रूस से आने वाले कुछ सामानों पर इससे भी अधिक, 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान मौजूद है।

इसलिए headline में भले ही ‘100% टैरिफ’ की बात हो, लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह प्रावधान मुख्य रूप से रूस के ऊर्जा कारोबार और उससे जुड़े देशों पर अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ाने का एक उपकरण है।

भारत पर क्यों बढ़ा दबाव?

भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। S&P Global के आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में भारत ने रूस से लगभग 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा था, जो उस समय प्रमुख रूसी तेल खरीदारों में भारत को सबसे आगे रखता था। चीन की खरीद लगभग 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन थी।

यही वजह है कि नए अमेरिकी कानून का भारत के लिए महत्व काफी बढ़ गया है।

यदि अमेरिकी प्रशासन भारत पर इस प्रावधान के तहत ऊंचा टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिका में भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है। इसका असर उन भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है जिनका बड़ा कारोबार अमेरिकी बाजार पर निर्भर है।

हालांकि, फिलहाल भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होने की घोषणा नहीं हुई है। कानून राष्ट्रपति को कार्रवाई का अधिकार देता है और आगे अमेरिकी प्रशासन के फैसले महत्वपूर्ण होंगे।

चीन पर भी पड़ सकता है असर

चीन भी रूस से तेल और गैस खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में शामिल है। इसलिए वह भी इस कानून के दायरे में आ सकता है।

अमेरिका यदि चीन पर टैरिफ बढ़ाता है तो पहले से चल रहे अमेरिका-चीन व्यापार तनाव में एक नया मोर्चा जुड़ सकता है। चीन के लिए स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रूसी ऊर्जा उसकी बड़ी ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा है।

इसका असर केवल अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तक सीमित नहीं रह सकता। यदि बड़े खरीदार रूसी तेल की खरीद घटाते हैं, तो वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति और कीमतों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

भारत के लिए तेल महंगा हुआ तो क्या होगा?

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की कीमत बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी दाम वाले कच्चे तेल की खरीद में बड़ी कमी आती है और उसकी जगह महंगा तेल लेना पड़ता है, तो आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है।

इसका असर आगे चलकर कई क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत, एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स और पेट्रोकेमिकल उद्योग पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रुपये-डॉलर विनिमय दर और भारत की खरीद रणनीति समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।

भारत ने पहले ही जताई चिंता

भारत ने पहले ही संकेत दिया है कि रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिकी कदमों का द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है। नई दिल्ली का रुख रहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न स्रोतों से तेल खरीदना जरूरी है।

यानी भारत के सामने एक तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को संभालने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ अपनी ऊर्जा जरूरतों और कच्चे तेल की लागत को नियंत्रित रखने की आवश्यकता है।

क्या भारत पर तुरंत 100% टैरिफ लगेगा?

नहीं। इस बिंदु को लेकर सबसे ज्यादा भ्रम है।

कानून पर ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद अमेरिका को ऐसा टैरिफ लगाने का अधिकार मिला है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत से आने वाले सामान पर उसी समय 100 प्रतिशत शुल्क लगा दिया गया है।

रिपोर्टों के मुताबिक कानून राष्ट्रपति को आगे की कार्रवाई के लिए व्यापक अधिकार देता है। इसलिए आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन यह तय कर सकता है कि किस देश पर कार्रवाई करनी है, किस स्तर का टैरिफ लगाना है और किन परिस्थितियों में छूट या राहत दी जा सकती है।

कानून कब प्रभावी होगा?

कानून के प्रावधानों के अनुसार संबंधित टैरिफ व्यवस्था को लागू करने की प्रक्रिया राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद निर्धारित समयसीमा के भीतर शुरू हो सकती है। इसमें रूसी तेल और गैस के प्रमुख खरीदारों को लेकर पिछले 12 महीनों के आयात आंकड़ों को आधार बनाया गया है।

प्रावधानों में प्राकृतिक गैस से जुड़े कुछ मामलों में अपवाद भी दिए गए हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी देश का रूसी गैस आयात निर्धारित सीमा से कम रहा हो और उसने रूस से आयात कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हों, तो कुछ परिस्थितियों में उसे गैस संबंधी टैरिफ से छूट मिल सकती है।

शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा से पहले बढ़ा दबाव

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तथा रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत जारी है। ऐसे में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी टैरिफ की नई शक्ति अमेरिका-चीन संबंधों में भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है।

चीन के लिए यह मामला केवल व्यापार का नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और रूस के साथ उसके आर्थिक संबंधों से भी जुड़ा है। वहीं अमेरिका के लिए रूसी ऊर्जा से होने वाली आय को सीमित करना रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।

भारत-अमेरिका व्यापार पर क्या असर पड़ेगा?

यदि भविष्य में भारत के खिलाफ इस कानून के तहत ऊंचा टैरिफ इस्तेमाल किया जाता है, तो अमेरिका को निर्यात करने वाले भारतीय उद्योगों पर इसका असर पड़ सकता है। जिन क्षेत्रों में अमेरिकी बाजार पर निर्भरता अधिक है, वहां कंपनियों की लागत और प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बदल सकती है।

इसके अलावा दोनों देशों के बीच पहले से चल रही व्यापार वार्ताओं पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन भारत के खिलाफ इस अधिकार का इस्तेमाल करता है या नहीं और यदि करता है तो टैरिफ की दर कितनी रखी जाती है।

रूस पर क्या है अमेरिकी रणनीति?

इस कानून का व्यापक उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय और उससे जुड़े आर्थिक नेटवर्क पर दबाव बढ़ाना है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश लंबे समय से यह कोशिश कर रहे हैं कि रूस के तेल कारोबार से मिलने वाले राजस्व को सीमित किया जाए।

नए कानून में रूसी ऊर्जा क्षेत्र के साथ-साथ उन जहाजों और नेटवर्क पर भी कार्रवाई का प्रावधान है जो मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं। इससे रूस के लिए अपने तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की लागत और जोखिम बढ़ाने की कोशिश की गई है।

आगे क्या देखना होगा?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ट्रंप प्रशासन इस नए अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है। भारत और चीन पर 100 प्रतिशत टैरिफ की संभावना कानून में मौजूद है, लेकिन अभी इसे वास्तविक टैरिफ के रूप में लागू किया जाना बाकी है।

भारत के लिए आगे तीन चीजें खास तौर पर महत्वपूर्ण रहेंगी—रूस से कच्चे तेल की खरीद का स्तर, अमेरिका की टैरिफ नीति और दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता। साथ ही वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला बदलाव भी भारत की ऊर्जा लागत को प्रभावित करेगा।

कुल मिलाकर, ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद रूस पर अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ा है और भारत तथा चीन के लिए भी नई व्यापारिक अनिश्चितता पैदा हुई है। लेकिन इस समय सबसे अहम अंतर यही है कि 100% टैरिफ का अधिकार मिलना और 100% टैरिफ का वास्तव में लागू होना दो अलग-अलग बातें हैं।

Source: Reuters, India Today, S&P Global और अन्य रिपोर्टों पर आधारित।

डिस्क्लेमर: यह लेख अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजार से जुड़े घटनाक्रम की जानकारी देता है। टैरिफ, कच्चे तेल की कीमत और विदेशी व्यापार से जुड़े वास्तविक प्रभाव भविष्य के नीतिगत फैसलों तथा बाजार परिस्थितियों पर निर्भर कर सकते हैं।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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