अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक ट्रेड नीति एक बार फिर वैश्विक व्यापार समीकरणों को प्रभावित करती दिख रही है। इसी बीच आर्थिक थिंक टैंक GTRI ने इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (IPEF) की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा अमेरिकी व्यापार रणनीति इस बहुपक्षीय समूह को कमजोर कर रही है और लंबे समय में इसका सबसे बड़ा लाभ चीन को मिल सकता है।
IPEF में भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया सहित कुल 14 देश शामिल हैं, और इसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सप्लाई चेन, डिजिटल ट्रेड और क्लीन एनर्जी सहयोग को मजबूत करना था। लेकिन बदलते वैश्विक हालात में इस फ्रेमवर्क की भूमिका अब अनिश्चित होती जा रही है।
IPEF क्या है और क्यों बनाया गया था?
IPEF यानी Indo-Pacific Economic Framework की शुरुआत 23 मई 2023 को जापान के टोक्यो में की गई थी। इसे अमेरिका और उसके प्रमुख हिंद-प्रशांत साझेदार देशों ने मिलकर लॉन्च किया था।
यह समूह वैश्विक GDP का लगभग 40% और वैश्विक व्यापार का करीब 28% हिस्सा प्रतिनिधित्व करता है। इसका उद्देश्य पारंपरिक मुक्त व्यापार समझौतों की बजाय एक आधुनिक आर्थिक सहयोग मॉडल तैयार करना था।
IPEF चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित है:
- ट्रेड पिलर: डिजिटल ट्रेड, लेबर स्टैंडर्ड और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क
- सप्लाई चेन रेजिलिएंस: वैश्विक सप्लाई चेन को मजबूत और विविध बनाना
- क्लीन इकोनॉमी: ग्रीन एनर्जी और क्लाइमेट टेक्नोलॉजी सहयोग
- फेयर इकोनॉमी: कर पारदर्शिता और भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था
भारत इसमें तीन पिलर (सप्लाई चेन, क्लीन इकोनॉमी और फेयर इकोनॉमी) का हिस्सा है, जबकि डिजिटल ट्रेड से जुड़े मुद्दों पर सहमति न बनने के कारण वह ट्रेड पिलर से बाहर है।
ट्रंप की ट्रेड रणनीति और बदलता वैश्विक परिदृश्य
GTRI का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी व्यापार नीति अधिकतर टैरिफ-आधारित और द्विपक्षीय समझौतों पर केंद्रित हो गई है। यह IPEF जैसी बहुपक्षीय और गैर-बाध्यकारी संरचनाओं से सीधे टकराव में है।
ट्रंप प्रशासन का फोकस सेक्शन 301 जांच, उच्च टैरिफ और त्वरित द्विपक्षीय डील्स पर रहा है। इस दृष्टिकोण ने वैश्विक व्यापार में सहयोग आधारित मॉडल को कमजोर किया है। विश्लेषकों के अनुसार, इस बदलाव से IPEF जैसे फ्रेमवर्क की व्यावहारिक उपयोगिता सीमित होती जा रही है।
सप्लाई चेन और चीन की रणनीतिक स्थिति
IPEF का एक मुख्य उद्देश्य चीन पर निर्भरता कम करना और सप्लाई चेन को विविध बनाना था। लेकिन वास्तविकता में यह लक्ष्य अब जटिल होता दिख रहा है। कई वैश्विक कंपनियां “China +1” रणनीति अपना रही हैं, लेकिन इसका मतलब चीन से पूरी तरह बाहर निकलना नहीं है। बल्कि कंपनियां जोखिम को विभिन्न देशों में बांट रही हैं। इससे चीन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता पर सीधा असर कम पड़ा है और वह अभी भी वैश्विक सप्लाई चेन का केंद्र बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यही स्थिति चीन को रणनीतिक रूप से मजबूत बनाए रखती है, जबकि IPEF का प्रभाव सीमित रह जाता है।
भारत के लिए अवसर और चुनौतियां
भारत IPEF को एक अवसर के रूप में देखता है, खासकर मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन के संदर्भ में। लेकिन GTRI का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि वास्तविक लाभ केवल अंतरराष्ट्रीय समझौतों से नहीं आएगा। भारत की घरेलू क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा इस दिशा में ज्यादा निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत खुद को एक वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करना चाहता है, तो उसे नीति और उत्पादन स्तर पर बड़े सुधार करने होंगे।
IPEF की वास्तविक चुनौती
IPEF की सबसे बड़ी चुनौती इसकी संरचना है। यह बाध्यकारी व्यापार समझौता नहीं है, बल्कि एक सहयोग आधारित फ्रेमवर्क है। इसी कारण इसमें ठोस प्रवर्तन तंत्र की कमी है।
दूसरी ओर, अमेरिका की बदलती व्यापार नीति और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता ने इस फ्रेमवर्क की गति को धीमा कर दिया है।
निष्कर्ष: क्या IPEF भविष्य में टिक पाएगा?
IPEF एक महत्वाकांक्षी प्रयास जरूर है, लेकिन मौजूदा वैश्विक व्यापार परिस्थितियों में इसकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ-केंद्रित रणनीति और चीन की मजबूत सप्लाई चेन स्थिति के बीच यह फ्रेमवर्क अभी भी एक संक्रमण काल में है।
अंततः इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सदस्य देश इसे केवल कूटनीतिक मंच मानते हैं या वास्तविक आर्थिक सहयोग मॉडल में बदलते हैं।
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